पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 253, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृप्तिदीपप्रकरणम् २३३
संसारासक्तचित्तः संश्चिदाभासः कदाचन ।
स्वयंप्रकाशकूटस्थं स्वतत्त्वं नैव वेत्ययम् ॥२९॥
यह विचारा चिदाभास, संसार अर्थात् विषयोपार्जन के
ध्यान में मस्त हुआ हुआ, अपने स्वयं प्रकाश कूटस्थ आत्मतत्व
को कभी पहचानता ही नहीं [वह तो दिन रात शरीर आदि
की चाकरी में लगा रहता है, उसे आत्मतत्व को पहचानने की
फुर्सत ही नहीं है । वह अपने आत्मतत्व की बात को एक
अप्रासंगिक (बे मौक़े) बात समझता है । बात चीत चलने
पर वह आत्मतत्व को खूब ही फटकारता है, बस यही उस की
अज्ञान नाम की पहली अवस्था कहाती है]
न भाति नास्ति कूटस्थ इति वक्ति प्रसङ्गतः ।
कर्ता भोक्ताहमस्मीति विक्षेपं प्रतिपद्यते ॥३०॥
चिदात्मा के विषय की जब बात चीत चलती है तब सदा
यही कहता है कि महाशय कूटस्थ का न तो मुझे भान ही
होता है और न वह है ही [यही अज्ञान की की हुई आवरण
नाम की दूसरी अवस्था कहाती है] इसी से आत्मा को यह
कहने लगता है कि 'मैं कर्ता हूँ' 'मैं भोक्ता हूँ' यही विक्षेप नाम
की तीसरी अवस्था होने लगती है ।
अस्ति कूटस्थ इत्यादौ परोक्षं वेत्ति वार्तया ।
पश्चात् कूटस्थ एवास्मीत्येवं वेत्ति विचारतः ॥३१॥
बात चीत में जब कोई समझाता है तब उसे परोक्षज्ञान नाम
की चौथी अवस्था आ जाती है कि 'कूटस्थ है' [श्रवणादि का
जब परिपाक हो जाता है तब] पीछे से वह यह प्रत्यक्ष रूप से
१५