पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 428, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें४०६ पञ्चदशी
चाहा करता है। आत्मविचार के प्रभाव से जब [अपने अद्व-
यानन्द रूप को ढकने वाली] माया नष्ट हो जाती है तब वह
फिर पहले की तरह स्वयं [परमानन्दपूर्ण परमात्मा] ही शेष
रह जाता है।
अद्वयानन्दरूपस्य सद्वयत्वं च दुःखिता ।
बन्धः प्रोक्तः,स्वरूपेण स्थितिर्मुक्ति रितीर्यते ॥४॥
अद्वितीय ब्रह्म [के सच्चे बन्ध या मोक्ष का निरूपण तो
कोई कर ही नहीं सकता। इस कारण जब उस अद्वयानन्द]
को दुःखी होने का भ्रम हो जाता है तब बस यही उसका
'सद्वयपना' और यही उसका 'बन्ध' कहाता है। [उस दुःखी-
पने का हट जाना किंवा] अपने स्वरूप में पहुँच जाना ही मोक्ष
कहा जाता है।
अविचारकृतो बन्धो विचारेण निवर्तते ।
तस्माज्जीवपरात्मानौ सर्वदैव विचारयेत् ॥५॥
यह बन्धन अविचार का किया हुआ है। विचार से ही
इसकी निवृत्ति हो सकती है। इस कारण [तत्वसाक्षात्कार
होने तक] सदा ही जीव और परमात्मा का विचार करता रहे।
अहमित्यभिमन्ता यः कर्ताऽसौ, तस्य साधनम् ।
मनस्तस्य क्रिये अन्तर्बहिर्वृत्ती क्रमोत्थिते ॥६॥
[चिदाभास से युक्त] जो अहंकार देहादि में मैंपने का
अभिमान किया करता है, उसी को 'कर्ता' या जीव कहते हैं।
उस जीव [के अभिमान करने] का साधन मन कहाता है।
वह क्रमानुसार कभी अन्तर्वृत्ति और कभी 'बहिर्वृत्ति' नाम की
दो प्रकार की क्रियायें किया करता है।