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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

३४४ [ २.७.२१३

करने वाला कोई नहीं है। इसलिए राजा को रिश्वत दे आश्रम के लिए जगह
लेंगे।
यह सलाह कर उपस्थापकों से माग राजा को लाख दे कहा—महाराज !
हम जेतवन में तैर्थिक-आश्रम बनाएँगे। यदि भिक्षु तुम्हें कहें कि हम बनाने
नहीं देंगे तो उनकी बात 'स्वीकार न करना।
राजा ने रिश्वत के लोभ से 'अच्छा' यह स्वीकार किया। तैर्थिकों ने
राजा को मिला बड़इयों को बुलवा काम शुरू किया। बड़ा शोर हुआ।
शास्ता ने पूछा—आनन्द ! यह हल्ला करने वाले, शोर मचाने वाले कौन हैं ?
“भन्ते ! अन्य तैर्थिक जेतवन में तैर्थिक-आश्रम बनवा रहे हैं। वही यह
शोर हो रहा है।”
“आनन्द ! यह स्थान तैर्थिकों के योग्य नहीं है। तैर्थिक शोर-प्रिय होते
हैं। उनके साथ रहना नहीं हो सकता।”
शास्ता ने भिक्षु-संघ को एकत्र कर कहा—भिक्षुओ, जाओ राजा को कह
कर तैर्थिक-आश्रम का बनवाना रुकवाओ।
भिक्षु जाकर राजा के प्रवेशद्वार पर खड़े हुए। राजा ने यह सुना कि
भिक्षु आए हैं तो यह समझ कर कि तैर्थिकों के आश्रम के ही बारे में आए
होंगे रिश्वत लिए रहने के कारण कहलवा दिया कि राजा घर में नहीं है।
भिक्षुओं ने जाकर शास्ता से कहा। शास्ता ने 'रिश्वत के कारण ऐसा करता
हैं' सोच दोनों प्रधान शिष्यों को भेजा। राजा ने उनका भी आना सुन वैसे ही
कहलवा दिया। उन्होंने भी आकर शास्ता से कहा।
‘सारिपुत्र ! अब राजा को घर में बैठना न मिलेगा, बाहर निकलना ही
होगा' कह शास्ता अगले दिन पूर्वाह्ण समय पहन कर, पात्र चीवर ले पांच सौ
भिक्षुओं के साथ राजा के प्रवेशद्वार पर पहुँचे। राजा ने सुना तो वह महल से
उतर पात्र ले शास्ता को (अन्दर) लिवा भिक्षुसंघ को, जिसमें मुख्य बुद्ध थे
यवागू-खाद्य दे शास्ता को प्रणाम कर एक ओर बैठा। शास्ता ने राजा को
एक तरह का धर्मोपदेश करते हुए कहा—महाराज ! पुराने राजाओं ने रिश्वत
ले शीलवानों में परस्पर झगड़ा कराया। वे अपने देश के स्वामी नहीं रहे और
महान् विनाश को प्राप्त हुए।
उसके प्रार्थना करने पर शास्ता ने पूर्व-जन्म की कथा कही—

ख. अतीत कथा

भरु ] ३४५
ख. अतीत कथा
पूर्व काल में भरु राष्ट्र में भरु राजा राज्य करता था। उस समय बोधि-
सत्व पाँच अभिज्ञा तथा आठ समापत्ति प्राप्त थे। वे गण-शास्ता तपस्वी हो,
हिमालय प्रदेश में चिरकाल तक रह नमक खटाई खाने के लिए पाँच सौ
तपस्वियो को साथ ले हिमवन्त से उतरे। क्रमश भरु नगर पहुँच, वहाँ भिक्षा
माँग, नगर से निकल उत्तर-द्वार पर टहनी-टहनो वाले वट वृक्ष के नीचे बैठ
भोजन कर वही रहने लगे। इस प्रकार जब उस ऋषि-समूह को वहाँ रहते
आधा महीना हुआ, एक दूसरा गण-शास्ता पाँच सौ तपस्वियो सहित आ, नगर
में भिक्षा माँग, नगर से निकल दक्षिण-द्वार पर उसी वट वृक्ष के नीचे बैठ,
भोजन कर वही रहने लगा। वे दोनो ऋषि-समूह वहाँ यथारुचि रह कर
हिमालय चले गए। उनके चले जाने पर दक्षिण-द्वार का वट वृक्ष सूख गया।
अगली बार आने पर दक्षिण-द्वार के वट-वृक्ष के नीचे रहने वालो ने पहले पहुँच
जब यह देखा कि उनका वट-वृक्ष सूख गया है, तो वे भिक्षा माँग, नगर से निकल,
उत्तर-द्वार पर वट-वृक्ष के नीचे जा, भोजन कर वही रहने लगे। दूसरे ऋषि
पीछे आकर, नगर में भिक्षा माँग, अपने वृक्ष के नीचे पहुँच भोजन कर वहाँ
रहने लग।
उन दोनो में 'यह तुम्हारा वृक्ष है' 'यह हमारा वृक्ष है' करके झगडा हो
गया। झगडा बढ गया। एक पक्ष ने कहा कि हम यहाँ रहने थे, इसलिए इस
स्थान पर तुम्हारा अधिकार नही। दूसरे ने कहा कि इस बार हम यहाँ पहले
आए, इसलिए तुम्हारा अधिकार नही। इस प्रकार वे दोनो 'हम स्वामी'
'हम स्वामी' करके वृक्ष के नीचे की जगह के लिए झगडा करते हुए राज-कुल
गए। राजा ने पहले रहे ऋषि-समूह को ही स्वामी बनाया। दूसरो ने कहा
अब हम यह नही कहलाएँगे कि इनसे हार गए। उन्होने दिव्य-चक्षु से चक्रवर्ती
राजा के योग्य एक रथ का चौखटा देख, ला, राजा को रिश्वत दे कहा—
महाराज ! हमें भी (उस स्थान का) स्वामी बनाएँ।
राजा ने रिश्वत ले दोनो समूह रहें (कह) दोनो को स्वामी बनाया।
दूसरे ऋषियो ने उस रथ के चौखटे के रत्नो के पहिए लाकर रिश्वत दे कहा—
महाराज ! हमें ही स्वामी करें।

३४६ [ २.७.२१३
राजा ने वैसा ही किया।
ऋषियो ने सोचा कि हम काम-भोगो को छोड प्रव्रजित हुए। फिर वृक्ष
के नीचे की जगह के लिए झगडते हुए रिश्वत देने लगे। हमने यह अनुचित
किया। इस प्रकार पश्चात्ताप कर वे जल्दी से भाग कर हिमालय ही चले गए।
सकल भरु राष्ट्रवासी देवताओ ने एकत्र हो कर कहा—राजा ने शील-
बानो में झगडा पैदा करके अच्छा नही किया। उन्होने क्रोधित हो तीन सौ
योजन के भरु राष्ट्र को समुद्र मे तूफान लाकर नष्ट कर दिया। इस प्रकार एक
भरु राजाओ के कारण सारा राष्ट्र विनाश को प्राप्त हुआ (यह) शास्ता ने
यह पूर्व-जन्म की कथा ला अभिसम्बुद्ध होने पर यह गाथाएँ कही—
इसीनमन्तर कत्वा भरूराजाति मे सुत,
उच्छिन्नो सहराट्ठेन स राजा विभव गतो ॥
तस्मा हि छन्दागमन नप्पसंसन्ति पण्डिता,
अदुट्ठचित्तो भासेय्य गिर सञ्चूपसंहित ॥
[ ऐसा मैने सुना कि ऋषियों में भेद करके भरु राजा अपने राष्ट्र सहित
विनाश को प्राप्त हुआ। इसलिए पण्डित लोग पक्षपात की प्रशंसा नही करते।
द्वेषरहित चित्त से सच्ची बात कह देनी चाहिए। ]
अन्तर कत्वा, पक्षपात के कारण भेद करके। भरु राजा भरु राष्ट्र का
राजा। इति मे सुत ऐसा मैने पहले सुना। तस्मा हि छन्दागमन, क्योकि
पक्षपात करके भरु राजा राष्ट्र सहित नष्ट हुआ इसलिए पण्डित पक्षपात
की प्रशंसा नही करते। अदुट्ठचित्तो, विकारो से मलिन चित्त न हो। भासेय्य
गिरं सञ्चूपसहित यथार्थ, अर्थयुक्त, सकारण वाणी ही बोले।
जिन्होने भरु राजा के रिश्वत लेते समय 'यह उचित नही हैं' कह
निन्दा करते हुए सच्ची बात कही, वे जहाँ खडे थे वहाँ नारियल के द्वीप में
आज भी हज़ारो दीपक (जलते) दिखाई देते हैं।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला 'महाराज, पक्षपात नहीं करना चाहिए,
प्रव्रजितो में झगडा नही कराना चाहिए' कह जातक का मेल बैठाया।

२१४. पुण्णनदी जातक

पुण्णनदी ] ३४७
मैं उस समय में ज्येष्ठ ऋषि था।
राजा ने तथागत के भोजन करके चले जाने पर आदमियों को भेज कर
तैर्थिकों का आश्रम विध्वंस करा दिया। तैर्थिक अप्रतिष्ठित हो गए।
२१४. पुण्णनदी जातक
"पुण्णं नदि...." यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय प्रज्ञा
पारमिता के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
एक दिन धर्मसभा में भिक्षुओं ने तथागत की प्रज्ञा के बारे में बातचीत
चलाई—आयुष्मन्तो ! सम्यक् सम्बुद्ध महाप्रज्ञा हैं, विस्तृतप्रज्ञा हैं, प्रसन्न-
प्रज्ञा हैं, क्षिप्र-प्रज्ञा हैं, तीक्ष्ण प्रज्ञा हैं, उनकी प्रज्ञा बींधने वाली है, वे उपाय-
कुशल हैं। शास्ता ने आकर पूछा—भिक्षुओ ! यहाँ बैठे क्या बातचीत कर
रहे हो ? 'अमुक बातचीत' कहने पर 'भिक्षुओ, तथागत केवल अभी प्रज्ञावान्
तथा उपायकुशल नहीं हैं, पहले भी थे' कह पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व काल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
पुरोहित-कुल में पैदा हुए। बड़े होने पर तक्षशिला जा सब शिल्प सीख पिता
के मरने पर पुरोहित का पद पा राजा के अर्थधर्मानुशासक हुए।
आगे चलकर राजा ने चुगली करने वालों की बात का विश्वास कर
क्रोधित हो बोधिसत्त्व को 'मेरे पास मत रह' कह निकाल दिया। बोधिसत्त्व
स्त्री-बच्चों को ले काशी के एक गामड़े में रहने लगे। फिर राजा को बोधि-

३४८ [ २.७.२१४
सत्य के गुणो की याद आई। उसने सोचा कि किसीको भेजकर मेरे लिए
आचाय्यं को बुलाना ठीक नही। एक गाथा रच, पत्र लिख, कौवे का मास
पकवा, सफेद वस्त्र से लपेट, राजकीय मोहर लगाकर भेजूंगा। यदि पण्डित
होगा, पत्र पढ कर कौवे के मास का भाव समझ कर चला आएगा। नहीं,
तो नही आएगा। उसने यह गाथा पत्र में लिखी—
पुण्णं नदि येन च पेय्यमाहु,
जातं यवं येन च गुह्यमाहु ॥
दूरं गतं येन च अब्भपन्ति,
सो त्यागतो हन्द च भुञ्ज ब्राह्मण ॥
[ जिसके पीने योग्य होने से नदी पूर्ण समझी जाती है, जिसको छिपा
रखने योग्य होने से जौ उत्पन्न हुए समझे जाते हैं; जिसके बोलने से दूर गए
आने वाले समझे जाते हैं; वह तेरे लिए आया है। ब्राह्मण ! इसे खा।]
पुण्ण नदि येन च पेय्यामाहु, 'काकपेय्य नदी' कहते हुए पूर्ण नदी को ही
पेय्य कहते है। अपूर्ण नदी काकपेय्य नदी नही कहलाती; जब नदी किनारे
खड़े हो गरदन पसार कर कौआ पी सकता है, तभी उसे काकपेय्य कहते हैं।
जातं यवं येन च गुह्यमाहु, जो शीर्षक मात्र है। यहाँ सभी पैदा हुई, उत्पन्न
हुई, तरुण खेती से मतलब है। वह जब अन्दर दाखिल हुए कौवे को छिपा
सकती है तभी गोपन करने वाली होने से गुह्य कहलाती है। किसे छिपाती
है ? कौवे को। इस प्रकार कौवे को छिपाने से काकगुह्य। काक-गुह्य कहने
वाले (लोग) गुह्य-वचन का कारण कौवा होता है इसलिए काक-गुह्य कहते हैं।
इसीलिए कहा है—येन च गुह्यमाहु । दूरं गतं येन च अब्भहन्ति दूर गया हुआ
प्रवासी प्रिय जन होने पर; जिसके आकर बैठने पर (लोग) कहते हैं कि यदि
अमुक नाम का व्यक्ति आने वाला है तो कौवे बोल अथवा जिसके बोलने पर
लोग समझते हे क्योकि कौवा बोलता है, इसलिए अमुक नाम का व्यक्ति
आएगा; इस तरह कहने वाले जिसके कारण कहते हैं, विचार करते हैं,
व्यक्त करते हैं। सो त्यागतो वह तेरे लिए लाया गया है। हन्द च भुञ्ज
ब्राह्मण, ब्राह्मण ग्रहण कर, खा ! मतलब इस कौवे के मास को खा।

कच्छप ] : ३४५
इस प्रकार राजा ने दूसरे पत्र में लिख बोधिसत्व के पास भेजा। उसने
पत्र बाँच 'राजा मुझे देखना चाहता है' यह दूसरी गाथा लिखी—
यतो मं सरती राजा वायसम्पित पेहेतवे,
हंसा क्रोञ्चा मयूरा च असतिम्येव पापिया ॥
[ जब राजा कौवे का मांस पाकर भी मुझे भेजना याद रखता है, तो हंस,
क्रोञ्च और मयूर की तो बात ही क्या ? याद न आना ही बुरा है। ]
यतो मं सरति राजा वायसम्पित पहेतवे जब राजा कौवे का मास पाकर
भी मुझे उसे भेजना याद रखता है। हंसा क्रोञ्चामयूरा च, जब इसके लिए
इस आदि लाए जाएँगे, यह हंसमांस आदि पाएगा, तब मुझे क्यो न याद करेगा ?
अट्ठकथा मे हंसारोञ्चमयूरानं पाठ है। यह सुन्दरतर है। अर्थ यही है कि
इन हंस आदि का मास पाकर मुझे क्यो न याद करेगा ? असतिम्येव पापिया
यह या वह मिलने पर याद आना ही अच्छा है। दुनिया मे याद न आना ही
बुरा है, याद न करना ही हीन है, खराब है। यह हमारे राजा में नहीं है।
राजा मुझे याद करता है। मेरे आने की प्रतीक्षा करता है। इसलिए जाऊँगा।
गाड़ी जुड़वा, जाकर राजा को देखा। राजा ने सन्तुष्ट हो पुरोहित का
ही पद दिया।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय राजा
आनन्द था। पुरोहित मैं ही था।

२१५. कच्छप जातक
"अवधी वत अत्तानं.." यह शास्ता ने जेतवन मे रहने समय कोकालिय
के बारे में कही।

क. वर्तमान कथा

३५० [ २७ २१५
क. वर्तमान कथा
यह कथा महातक्कारि¹ जातक में आएगी। उस समय शास्ता ने कहा—
भिक्षुओ, कोकालिक केवल अभी अपनी वाणी से नही मारा गया, पहले भी
मारा गया। यह कह पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
'पूर्व काल, में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करते समय बोधिसत्व अमात्य-
कुल में पैदा हो, बडे होने पर उसके अर्थधर्मानुशासक हुए। वह राजा बहुत
बोलने वाला था। वह बोलता तो दूसरो को बोलने का मौका न मिलता।
बोधिसत्त्व उसकी वाचालता हटाने का कोई उपाय सोचते हुए घूमते थे।
उस समय हिमालय-प्रदेश के किसी तालाब में एक कछुआ रहता था।
दो हस-बच्चो ने शिकार के लिए घूमते हुए उससे दोस्ती कर ली। उसके
प्रति दृढ-विश्वासी हो एक दिन हस-बच्चो ने कछुवे से कहा—दोस्त कछुवे !
हमारे हिमवन्त में चित्रकूट पर्वत के नीचे कञ्चन गुफा में रहने का रमणीक
स्थान है। हमारे साथ चलेगा ?
"मै कैसे चलूंगा ?"
"हम तुझे लेकर चलेंगे, यदि तू अपने मुंह पर काबू रख सकेगा, किसी को
कुछ न कहेगा।"
"स्वामी ! काबू रखूंगा। मुझे लेकर चलें।'
उन्होने 'अच्छा' कह स्वीकार किया। एक लकडी को कछुवे के मुंह म
दे, उसके दोनो सिरो को अपने मुंह में ले वे आकाश में उडे। उसे इस प्रकार
हसो द्वारा लिए जाते देख गांव के लडको ने कहा—दो हस कछुवे को डडे पर
लिए जाते हैं।
हसो की गति तेज होने के कारण वे बाराणसी नगर के राजमहल के
ऊपर आ पहुँचे थे। कछुवे ने "दुष्ट चेटको ! यदि मेरे मित्र मुझे ले जाते है
¹ महातक्कारि जातक (४८१)

[Header] कच्छप ] ३५१

तो इसमें तुम्हारा क्या ?'' कहने की इच्छा से उस लकड़ी को जहाँ से
पकड़ा था छोड़ दिया। वह खुले आँगन में गिर दो टुकड़े हो गया। एक
शोर हुआ—कछुवा खुले आँगन में गिर दो टुकड़े हो गया।
अमात्यों से घिरे हुए राजा ने बोधिसत्त्व को साथ ले उस जगह पहुँच,
कछुवे को देख पूछा—पण्डित ! यह कैसे गिरा ?
बोधिसत्त्व ने सोचा—मै बड़ी देर से राजा को उपदेश देने की इच्छा से
किसी उपाय की खोज में घूमता हूँ। इस कछुवे की हंसों के साथ दोस्ती हुई
होगी। वे 'इसे हिमवन्त ले चलेंगे' सोच लकड़ी मुंह में दे आकाश में उड़े होंगे।
इसने किसी की बात सुन जबान पर काबू न होने से कुछ कहने की इच्छा से
डण्डा छोड़ दिया होगा। इस प्रकार आकाश से गिर कर मरा होगा। यह
बोला—"हाँ ! महाराज ! जो वाचाल होते हैं, जिनके वचन की सीमा नही
होती वे इस प्रकार दुःख को प्राप्त होते हैं।" इतना कह यह गाथाएँ कही—
अवधी वत अत्तान कच्छपो व्याहरं गिरं,
सुग्गहीतस्मि कट्ठस्मि वाचाय सकिया वधि ॥
एतम्पि दिस्वा नरविरिय सेट्ठ !
वाच पमुञ्चे कुसलं नातिवेलं;
पस्ससि बहुभाणेन कच्छप व्यसनं गतं ॥
[कछुवे ने वाणी का प्रयोग करके अपने को मार डाला। अच्छी तरह
लकड़ी को पकड़े हुए अपनी वाणी के कारण (उसे छोड़ कर) अपने को मारा।
नरवीर्य श्रेष्ठ ! इसे भी देख कर (आदमी को) कुशल वाणी ही बोलनी
चाहिए और वह भी समय (की सीमा) लांघ कर नही। देखते ही हो, अधिक
बोलने से कछुआ मर गया।]
अवधी वत घात किया। व्याहर व्यवहार करते हुए। सुग्गहीतस्मि
कट्ठस्मि मुख से अच्छी तरह लकड़ी को पकड़े हुए। वाचाय सकिया वधि
वाचाल होने से अनुचित समय पर बोल कर पकड़ी हुई जगह को छोड़ अपनी
उस वाणी के कारण अपने को मार डाला। इस प्रकार यह मरा। किसी दूसरे
कारण से नही।

३५२ [ २७.२१६

एतम्पि दिस्वा यह बात भी देखकर मरुविरिय रोद्ध नरो में श्रेष्ठ-वीर्य्यं ।
उत्तसवीर्य्यं राजवर ! वाचं पमुञ्चे कुसलं नातियेतं सत्यादि से युक्त कुशल
वाणी ही पण्डित आदमी बोले; वह भी हियाकर समयानुकूल । समय (की
सीमा) लांघ कर असीम वाणी न बोले। पस्ससि प्रत्यक्ष देखना है बहुभानेन
अधिक बोलने से कच्छपं व्यसनं गतं, यह कछुआ मर गया ।


'राजा ने 'मेरे लिए यह कहा है' सोच पूछा—पण्डित ! मेरे बारे में कह
रहा है ?
बोधिसत्त्व—महाराज ! चाहे आप हो, चाहे कोई और हो, जो कोई
सीमा लांघ कर बोलता है वह इसी प्रकार दु ख भोगता है। यह स्पष्ट करके
कहा ।
उस समय से राजा संयम कर मितभाषी हो गया । शास्ता ने यह धर्म-
देशना ला जातक का मेल बैठाया ।
उस समय कछुवा कोकालिक था। दो हंस-बच्चे दो महास्थविर ।
राजा आनन्द । अमात्य पण्डित तो मैं ही था।

२१६. मच्छ जातक¹
"न मायमग्गि तपित " यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय
पूर्व-भार्या के आकर्षण के बारे में कही।


¹देखो मच्छ जातक (१. ४. ३४)

क. वर्तमान कथा

' मच्छ ] ३५३
क. वर्तमान कथा
शास्ता ने उसे पूछा—भिक्षु ! क्या तू सचमुच उत्कण्ठित है ? “भन्ते,
सचमुच” कहने पर शास्ता ने पूछा—“किसने उत्कण्ठित किया ?” जवाब
दिया—पूर्व-भार्या ने । शास्ता ने “भिक्षु ! यह स्त्री तेरा अनर्थ करने वाली
है। पहले भी तू इसके कारण कांटे से बींधा जाकर, अङ्गारो पर पकाया जाकर
खाया जाने वाला था। पण्डित की सहायता से जान बची” कह पूर्व-जन्म की
कथा कही।
ख. अतीत कथा
पूर्वकाल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
उसके पुरोहित हुए। एक दिन मछुए जाल में फँसे मच्छ को निकाल कर,
गर्म-बालू पर डाल, ‘उसे अङ्गारो में पकाकर खाएँगे’ सोच शूल तराशने लगे।
मच्छ ने मछली के बारे में रोने हुए यह गाथा कही—
न मायमग्गि तपति न सूलो साधु तच्छितो,
यञ्च मं मञ्जति मच्छी अञ्ज सो रतिया गतो ॥
सो मं दहति रागग्गि चित्तं बूपतपेति मं,
जालिनो मुञ्चयथिरं मं न कामे हञ्जते क्वचि ॥
[न मुझे, अग्नि तपाती है, न अच्छी तरह से छीला हुआ शूल ही। यह जो
मुझे मछली समझेगी कि रति के कारण यह दूसरी मछली के पास चला गया—
इसीका मुझे शोक है। मुझे वह रागाग्नि जला रही है। मेर चित्त को तपाती
है। हे मछुओ, मुझे छोड़ दो। कामी कही नही मारा जाता ।]
न मायमग्गि तपति, न मुझे यह आग जलाती है, न तपाती है, अर्थ है
शोक नही है। न सूलो यह शूल भी साधुतच्छितो न मुझे ताप देता है, न
शोक उत्पन्न करता है। यञ्च मं मञ्जति, जो मुझे मछली ऐसा कहेगी कि
वह पञ्च कामगुणो से प्रेरित हो दूसरी मछली के पास चला गया, यही मुझे
तपाता है, यही शोक उत्पन्न करता है।
२३

३५४ [ २.७२१७
सो मं दहति, जो यह रागाग्नि है यह मुझे जलाती है। चित्तं धूपतपेति मं,
रागयुक्त मेरा चित्त ही मुझे तपाता है, कष्ट देता है, पीडा देता है। जासिनो
कैवर्त्तो (मछुओ) को सम्बोधन करता हूँ। यह जाल के अर्थी होने से जासिनो
कहलाते हैं। मुञ्चययिरा मं, स्वामी मुझे छोड़ दें, यही याचना करता हूँ
न कामे हञ्ञते क्वचि, काम मे प्रतिष्ठित, काम में बहता हुआ प्राणी कहीं नहीं
मारा जाता; तुम्हारे जैसो को उसे मारना योग्य नहीं। अथवा कामे हेतु के
अर्थ में सप्तमी का प्रयोग है। काम-हेतु से मछली के पीछे पीछे चलने वाला
वही भी तुम्हारे जैसो से नहीं मारा जाता।
उसी समय बोधिसत्त्व ने नदी किनारे जा उस मच्छ का रोना सुन, मछुओ
के पास पहुँच उस मच्छ को छुड़ाया।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला सत्यो को प्रकाशित कर जातक का मेल
बैठाया। सत्यो का प्रकाशन समाप्त होने पर उत्कण्ठित भिक्षु स्रोतापत्ति फल
में प्रतिष्ठित हुआ।
उस समय मछली पूर्व-भार्या थी। उत्कण्ठित भिक्षु मच्छ था। पुरोहित
मैं ही था।
२१७. सेग्गु जातक
“सब्बो लोको....” यह शास्ता ने जेतवन मे विहार करते समय एक
तरकारी बेचन वाले उपासक के बारे मे कही।

क. वर्तमान कथा

सेग्गु ] ३५५
क. वर्तमान कथा
यह कथा पहले परिच्छेद में आ ही चुकी है।१ इस कथा में शास्ता ने
पूछा—उपासक ! क्यो देर करके आया है ?
"भन्ते ! मेरी लडकी सदैव हँसमुख रहती थी। मैने उसकी परीक्षा कर
उसे एक तरुण को दिया।" सो यह करने से आपके दर्शन के लिए आने का
समय नहीं मिला।"
"उपासक ! वह अब ही सदाचारिणी नही है। पहले भी सदाचारिणी
थी। तूने न केवल अभी उसकी परीक्षा की है, पहले भी की ही थी।"
इतना कह उसके प्रार्थना करने पर पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्वं काल में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
वृक्ष-देवता हुए। उस समय उसी तरकारी बेचने वाले उपासक ने लडकी की
'परीक्षा करने के लिए' उसे जगल में ले जा काम-भोग चाहने वाले की
तरह उसे हाथ से पकडा। वह रोने लगी। उसे यह पहली गाथा कही—
सब्बो लोको अत्तमना अहॉसि,
अकोविदा गामधम्मस्स सेग्गु ॥
कोमारि कोनाम तवज्ज धम्मो,
य त्व गहिता पवने परोदसि ॥
[ सारा लोक (इससे) आनन्दित (होता) है। सेग्गु तू इस ग्राम्य-धर्म
से अपरिचित है। कुमारी ! यह तेरा क्या धर्म है कि तू बन मे पकडने पर
रोती है। ]
सव्यो लोको अत्तमना अहॉसि, धम्म ! सारे प्राणी इस कामभोग के
१ पण्णिक जातक (१०२)

३५६ [ २७.२१७
सेवन से सन्तुष्ट (होते) हैं। अकोविदो गामधम्मस्स सेग्गु, सेग्गु, उसका नाम
है। सो धम्म सेग्गु । तू इस ग्राम्य धर्म में, इस चाण्डाल-कर्म में दक्ष नही है।
कोमारि को नाम सवज्ज धम्मो, धम्म कुमारी । यह आज तेरा क्या स्वभाव
है ? य त्व गहिता पवने परोदसि, जो तू मेरे द्वारा इस वन में कामभोग के लिए
पकड़ी जाने पर रोती है। स्वीकार नहीं करती। यह तेरा क्या स्वभाव है ?
क्या तू कुमारी ही है ? —पूछता है।
इसे सुन कुमारी ने कहा—हाँ तात ! मैं कुमारी ही हूँ। मैं मैथुन धर्म को
नहीं जानती हूँ। ऐसा कह, रोती हुई दूसरी गाथा बोली—
यो दुक्खफुट्ठाय भवेय्य ताणं,
सो मे पिता दूभि वने करोति ॥
सर कस्स कन्दामि वनस्स मज्झे,
यो तायिता सो सहसा करोति ॥
अर्थ उपरोक्त प्रकार¹ से ही है।
तब वह तरकारी बेचने वाला उस लड़की की परीक्षा कर, घर ले जा,
तरुण को दे यथा-कर्म सिधारा।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला सत्यों का प्रकाशन कर जातक का मेल बैठाया।
सत्यों का प्रकाशन समाप्त होने पर तरकारी बेचने वाला श्रोतापत्ति फल में
प्रतिष्ठित हुआ।
उस समय लड़की (अब की) लड़की ही थी। पिता पिता ही हुआ।
उस बात को प्रत्यक्ष करने वाला वृक्ष देवता मैं ही था।
¹पण्णिक जातक (१०२)

२१८. कूटवाणिज जातक

कूटवाणिज ] ३५७
२१८. कूटवाणिज जातक
"साठस्स साठेय्यमिद...." यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय
एक कूट व्यापारी के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
कूट व्यापारी और पण्डित व्यापारी दो श्रावस्तीनिवासी व्यापारियों ने
साझा व्यापार करना आरम्भ करके, सामान की पाँच सौ गाड़ियाँ भरीं।
ये पूर्व से पश्चिम घूमते हुए व्यापार कर बहुत मुनाफा कमा श्रावस्ती लौटे।
पण्डित व्यापारी ने कूट व्यापारी को कहा—दोस्त ! सामान बाँट लें।
कूट व्यापारी ने सोचा—यह बहुत दिनों तक आराम से सोना तथा अच्छा
भोजन न मिलने के कारण थका हुआ अपने घर जाकर नाना प्रकार के अच्छे
अच्छे भोजा खाएगा, बदहजमी से मरेगा। तब यह सारा सामान मेरा ही
हो जाएगा। इस लिए वह 'आज नक्षत्र अच्छा नहीं, कल देगें', 'आज दिन
अच्छा नहीं, कल देंगे' करता हुआ समय बिताने लगा।
पण्डित व्यापारी ने उसे मजबूर कर सामान बँटवाया। फिर गन्धमाला
से शास्ता के पास जा, पूजा-वन्दना कर एक ओर बैठा। शास्ता ने पूछा—
कब आया ?
"भन्ते ! मुझे आए आधा महीना हुआ।"
"तो इस प्रकार देर करके क्यो बुद्ध की सेवा में आया है ?"
उसने यह हाल कहा। शास्ता ने 'उपासक ! यह केवल अभी ठग
व्यापारी नहीं है, पहले भी ठग व्यापारी ही था' कह उसके प्रार्थना करने पर
पूर्व-जन्म की कथा कही—

कूटवाणिज ] ३५१

बोधिसत्त्व ने दूसरे से पूछा—
“क्या यह सच है ?”
"स्वामी ! मैं उसे लेकर गया। चिड़िया के उसे ले जाने की बात सच
ही है।”
“क्या इस दुनिया में चिड़ियाँ बच्चो को ले जाती हैं ?”
“स्वामी ! मैं भी आपसे पूछना चाहता हूँ कि चिड़ियाँ तो बच्चों को
लेकर आकाश में नहीं उड़ सकती, तो क्या चूहे लोहे के फाल खा सकते हैं ?”
“इसका क्या मतलब है ?”
“स्वामी ! मैंने इसके घर में पाँच सौ फाल रक्खे। यह कहता है कि तेरे
फालो को चूहे खा गए और ‘यह तेरे फालो को खाने वाले चूहों की मेंगनी है’
वह मेंगनी दिखाता है। स्वामी ! यदि चूहे फालें खाते हैं, तो चिड़ियाँ भी
बच्चे ले जाती हैं। यदि नहीं खाते हैं, तो बाज तब भी नहीं ले जा सकते हैं।
यह कहता है कि तेरे फाला को चूहं खा गए। उन्होंने खाए, या नहीं खाए—
इसकी परीक्षा करें। मेरे मुकदमे का फैसला करें।”
बोधिसत्त्व ने सोचा—इसने शठ के प्रति शठता का व्यवहार करके जीतने
की बात सोची होगी। उसने कहा—तूने ठीक सोचा है। और यह गाथा
कही—
सठस्स साठेय्यमिदं सुचिन्तित,
पच्चोड्डितं पतिकूटस्स कूट ।
फालञ्चे खादेय्यु मूसिका,
कस्मा कुमारं कुलला नो हरेय्यु ॥
कूटस्स हि सन्ति कूटकूटा,
भवति चापि निकतिनो निकत्या ।
देहि पुत्तकट्ठ फालनट्ठस्स फाल,
मा ते पुत्तमहासि फालनट्ठो ॥
[ शठ के प्रति शठता, यह अच्छा सोचा है। कुटिल के प्रति कुटिलता
का जाल फैलाया है। यदि चूहे फाल खा जाएँगे, तो चिड़ियाँ बच्चे को क्यों
नहीं ले जाएँगी।

कुटिल के प्रति कुटिलता का व्यवहार करने वाले हैं। ठग को भी ठगने
वाले होते हैं। हे पुत्र-नष्ट ! जिसकी फाल खोई गई है उसकी फाल दे। तेरे
पुत्र को जिसकी फाल नष्ट हुई है, वह न ले जाए।]
सठस्स, शठता से, धोखे से कोई ढंग निकाल कर दूसरे का माल खाना
चाहिए, ऐसा समझने वाले शठ के प्रति। साठेय्यमिवं सुचिन्तितं, जो यह
शठता का व्यवहार सोचा है, सो तूने ठीक सोचा है। पच्चोड्डितं पतिकूटस्स
कूट, कुटिल आदमी के प्रति तूने कुटिलता का जाल ठीक फैलाया, उसकी चाल
का जवाब दे जाल फैलाने सा ही किया—यही अर्थ है। फालञ्चे अदेय्युं
मूसिका, यदि चूहे फाल खाएं। कस्मा कुमारं कुळला नो हरेय्युं, जब चूहे फाल
खा जाते हैं तो चिड़ियां क्यो बच्चो को नही ले जाएँगी ?
कूटस्स हि सन्ति कूटकूटा, तू समझता है कि मै ही चूहो को फाल खिला
देने वाला कुटिल पुरुष हूँ; तेरे जैसे कुटिल पुरुष के साथ कुटिलता करने वाले
इस लोक मे बहुत कुटिल है। कुटिल के (भी) कुटिल यह कुटिल के प्रति
कुटिलता करने वालो का नाम है। यही कहा गया है कि कुटिल के प्रति कुटि-
लता करने वाले है। भवन्ति चापि निकतिनो निकत्या, ठगने वाले को ठगने वाला
भी दूसरा आदमी होता है। देहि पुत्तनट्ठ फालनट्ठस्स फालं, भो पुत्र नष्ट-पुरुष !
जिसकी फाल नष्ट हुई है उसकी फाल दे। मा ते पुत्तमहासि फालनट्ठो, यदि
इसकी फाल नही देगा, तो यह तेरे पुत्र को ले जाएगा। जिससे यह न ले जाए,
इसलिए इसकी फाल दे।
“स्वामी ! मैं इसकी फाल देता हूँ। यदि यह मेरा पुत्र दे।"
“स्वामी ! मैं देता हूँ यदि यह मेरे फाल दे।”
इस प्रकार जिसका पुत्र खोया गया था उसने पुत्र पाया। जिसकी फाल
खोई गई थी उसने फाल पाई। दोनो कर्मानुसार गए।
शास्ता ने यह धर्मदेशना सुना जातक का मेल बैठाया। उस समय का
कुटिल व्यापारी ही कुटिल व्यापारी था। पण्डित व्यापारी ही पण्डित
व्यापारी था।
मुकद्दमा फैसला करने वाला अमात्य मैं ही था।

२१६. गरहित जातक

गरहित ] ३६१
२१६. गरहित जातक
“हिरञ्ञम्मे सुवण्णम्मे...” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते
समय एक भिक्षु के बारे में कही, जिसका मन बुद्ध-शासन में नहीं था, जो
उत्कण्ठित था।
क. वर्तमान कथा
इस (भिक्षु) का ध्यान किसी भी बात मे एकाग्र नही होता था। इस
अन्यमनस्क हो जीवन बिताते हुए को शास्ता के पास लाए। शास्ता ने पूछा—
क्या तू सचमुच उत्कण्ठित है ?
“हाँ, सचमुच ।”
“किस कारण से ।”
“कामासक्ति के कारण ।”
“भिक्षु, कामासक्ति की पूर्व समय में पशुओ ने भी निन्दा की है। तू
इस प्रकार के शासन में प्रव्रजित हो, जिन कामभोगो की पशुओ तक ने निन्दा
की है, उनके कारण क्यो उत्कण्ठित हुआ है ?”
इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व काल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्व
हिमालय में बानर की योनि में पैदा हुए।
एक बनचर ने उसे पकड लाकर राजा को दिया। वह चिरकाल तक
राजभवन में रहने के कारण सभ्यता सीख गया। राजा ने उसके सभ्य-व्यवहार
से प्रसन्न हो बनचर को बुलाकर आज्ञा दी—इस बानर को जहाँ से पकड़ा है,
वही छोड़ आओ। उसने वैसा ही किया।

३६२ [ २.७.२१६
बानरो ने जब सुना कि बोधिसत्त्व आया है, तो उसे देखने के लिए महान्
शिला-तल पर इकट्ठे हुए। उन्होने बोधिसत्त्व से कुशल-समाचार की बात
कर पूछा—"मित्र, इतने दिन तक कहाँ रहे ?"
"वाराणसी मे, राजभवन में।"
"कैसे छूटे ?"
"राजा ने मुझे खेल करने वाला बन्दर बना, मेरे करतबो से प्रसन्न हो
मुझे छोड दिया।"
"आप मनुष्य लोको का बरताव जानते हैं। हमें भी कहें। हम सुनना
चाहते हैं।"
"मनुष्यो की करनी मुझसे मत पूछो।"
"कहें। हम सुनना चाहते हैं।"
बोधिसत्व ने, "मनुष्य चाहे क्षत्रिय हो, चाहे ब्राह्मण हो, सभी मेरा मेरा
करते हैं। वस्तुएँ अस्तित्व में आकर विनष्ट हो जाती हैं, इस अनित्यता को वे
नही जानते। अब उन अन्धे मूर्खों की बात सुनो" कह यह गाथाएँ कही—
हिरञ्जम्मे सुवण्णम्मे ऐसा रत्तिन्दिवा कथा,
दुम्मेधानं मनुस्सानं अरियधम्मं अपस्सतं ॥
द्वे द्वे गहपतयो गेहे एको तत्थ अमस्सुको,
लम्बत्थनो वेणिकतो अथो अङ्कितकण्णको;
कीतो धनेन बहुना सो तं वितुदते जनं ॥
[ प्रार्यधर्म को न जानने वाले मूर्ख मनुष्य दिन रात यही बातचीत करते
रहते हैं—मेरा हिरण्य, मेरा सोना।
घर में दो दो जने रहते हैं। एक को मूंछ नही होती। उसके लम्बे
स्तन होते हैं, वेणि होती है और कानो में छेद होते हैं। उसे बहुत धन से खरीदा
होता है। वह सब जनो को कष्ट देता है।]
हिरञ्जम्मे सुवण्णम्मे, यह दीपकमात्र है। इन दो पदो से दसो तरह के
रत्न, अगली-पिछली फसल, सब द्विपद तथा चतुष्पदो का ग्रहण कर 'यह मेरा
यह मेरा' कहा गया है। ऐसा रत्तिन्दिवा कथा, मनुष्य-लोग रात दिन यही

गरहित ] ३६३
बातचीत करते रहते हैं। ये पञ्च स्कन्ध अनित्य हैं, उत्पन्न होकर विनष्ट
हो जाते हैं आदि नहीं जानते हैं। इस प्रकार राने हुए भटकते हैं। दुम्मेधानं
अज्ञानियों की अरियधम्म अपस्सतं, बुद्धादि आर्य्यों के धर्म को न देखते हुए
लोगो की अथवा नौ प्रकार के निर्दोष लोकोत्तर आर्य धर्म¹ को न देखते हुए
लोगों की यही बातचीत होती है, अन्य अनित्यता या दुख की बातचीत उनकी
नहीं होती।
गहपतयो घर के मालिक। एको तत्थ उन दो घर के मालिकों में से एक
अर्थात् स्त्री। वेणिकतो कृतवेणि, नाना प्रकार से जिसने अपने बालों को
क्रम से गठिया रक्खा है। अथो भञ्जितकण्णको, वह ही बिंधे हुए कानो वाला,
या छिदे हुए कानो वाला। लम्बे कानो के बारे में कहा। कीतो धनेन बहुना,
यह मूछ विरहित, लम्बे स्तन वाला, वेणियारी, छिदे कान वाला माना पिता
को बहुत धन देकर खरीदा गया, सजा कर, गहने पहना कर, गाडी में बिठा
बडी शान-शौकत से घर में लाया गया। सो तं वितुदते जन, यह गृहस्वामी
(स्वामिनी) जिस समय रो आता है उस समय से दासो, मजदूरा आदि को
'अरे दुष्ट दास यह नहीं करता है, अरी दुष्ट दासी यह नहीं करती हैं' आदि
वचन-रूपी मुखशक्ति से बीधता है। स्वामी की तरह से व्यवहार करता है।
इस प्रकार मनुष्यलोक में बहुत अनुचित है—मनुष्यलोक की निन्दा की।
यह सुन सभी बन्दरो ने दोनो हाथो से अपने कान जोर से बन्द कर लिए—
मत कहें। मत कहे। न सुनने योग्य बात हमने सुनी। इस स्थान पर हमने
अनुचित बात सुनी। इसलिए उस स्थान की भी निन्दा कर अन्यत्र चले गए।
उस पाषाण-शिला का नाम निन्दित-पाषाण शिला हो गया।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला सत्यों को प्रकाशित कर जातक का मेल बैठाया।
सत्यों के प्रकाशन के अन्त में वह भिक्षु सोतापत्तिफल में प्रतिष्ठित हुआ।
उस समय के बानर-गण बुद्ध परिषद थी। बानरेन्द्र तो मैं ही था।
¹ चार लोकोत्तर मार्ग + चार लोकोत्तर फल + निर्वाण ।

१२०. धम्मद्ध जातक

३६४ [ २७.२२०
१२०. धम्मद्ध जातक
“सुख जीवितरुप्पोसि,....” यह शास्ता ने वेणुवन में विहार करते
समय बध का प्रयत्न करने के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
शास्ता ने ‘भिक्षुओ, न केवल अभी देवदत्त ने मेरे बध के लिए प्रयत्न
किया है, पहले भी किया है, लेकिन त्रासमात्र भी पैदा नहीं कर सका’ कह
पूर्व-जन्म की कथा कही।
ख. अतीत कथा
पूर्व काल में बाराणसी में पायासिपाणी नामका राजा राज्य करता था।
काळक नाम का उसका सेनापति था। उस समय बोधिसत्त्व उसीके पुरोहित
थे। नाम था धम्मध्वज। राजा के सिर को अलङ्कृत करने वाले नाई का
नाम था छत्तपाणी।
राजा धर्म-पूर्वक राज्य करता था, लेकिन उसका सेनापति मुकद्दमा का
फैसला करता हुआ रिश्वत खाता था। चुगल-खोर रिश्वत लेकर स्वामी को
अस्वामी कर देता था।
एक दिन मुकद्दमे में हारे हुए आदमी ने बाहें पकड कर रोते हुए, अदालत
से निकल राज-सेवा में जात हुए बोधिसत्त्व को देखा। उसने उसके पाँव में
गिरकर कहा—‘स्वामी ! तुम्हारे सदृश राजा के अर्थधर्मानुशासक के होते हुए
काळक सेनापति रिश्वत लेकर अस्वामी को स्वामी बना देता है, और अपने
मुकद्दमे हारने की बात कही।