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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का सारांश निकाला। उस समय

अम्ब ] ५५
ऐसा है यह मूर्ख। इससे क्या होगा ? अपने शिष्यो को गाथा कह, उसे खर्चा
दे विदा किया।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का सारांश निकाला। उस समय
मूर्ख विद्यार्थी लाळुदायि था। चारो दिशाओ में प्रसिद्ध आचार्य्य तो मैं ही था।
१२४. अम्ब जातक
“वायमेयेव पुरिसो” यह धर्मोपदेश बुद्ध ने जेतवन मे रहते समय एक
कर्त्तव्य-निष्ठ ब्राह्मण के सम्बन्ध में दिया।
क. वर्तमान कथा
वह श्रावस्ती निवासी तरुण बुद्ध शासन में बडी श्रद्धा से प्रव्रजित हो
बहुत कर्तव्य-परायण था। आचार्य्य, उपाध्याय की सेवा का कार्य्य; पीने
का पानी तथा खाद्य सामग्री आदि तैयार रखने का कार्य्य, उपोसथ घर¹ तथा
जन्ताघर² आदि साफ रखने का कार्य्य—सभी अच्छी तरह से करता। चौदह
बडे कर्तव्यो और अस्सी छोटे छोटे कर्तव्यो—सभी को पूरा करता। विहार में
झाडू लगाता। परिवेण मे झाडू लगाता। घूमने फिरने की जगह³ में झाडू
लगाता। विहार जाने के रास्ते को साफ रखता। मनुष्यों को पानी देता।
¹ जहां भिक्षु एकत्र होकर उपोसथ करते हैं।
² अग्नि-शाला, जिसमें आग तापकर पसीना बहाया जाता है।
³ सिंहल प्रति में 'जिक्कम-मालक' का 'वित्कममालक' है; जो अशुद्ध
प्रतीत होता है।

५६ [ १.१३.१२४
लोगो ने उसकी कर्तव्य-निष्ठा पर प्रसन्न हो, उसे पाँच सौ स्थिर निमन्त्रण
दिए। बहुत लाभ-सत्कार की प्राप्ति हुई। उसके कारण बहुता को सुख
मिला। धर्मसभा में बैठे हुए भिक्षुओ ने बात चलाई—'आयुष्मानो ! उस
भिक्षु ने अपनी कर्तव्य निष्ठा से बहुत लाभ-सत्कार प्राप्त किया। इस एक
के कारण बहुतो को सुख मिला।
शास्ता ने आकर पूछा—"भिक्षुओ, बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ?"
'यह बातचीत' कहने पर "भिक्षुओ, केवल अभी नही, पहले भी यह भिक्षु
कर्तव्य निष्ठ रहा है। इस अकेले के कारण पाँच सौ ऋषि फल-फूल के लिए
न जाकर इस एक के द्वारा मँगवाए गए फलो से ही गुजारा चलाते रहे हैं।"
यह कह पूर्वजन्म की बात कही—
ख. अतीत कथा
पूर्वकाल में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
उदीच्य ब्राह्मण कुल में पैदा हो सयाने होने पर ऋषियो के प्रव्रज्या-क्रम से
प्रव्रजित हो पाँच सौ ऋषियो के साथ पर्वत के नीचे रहने लगे। उस समय
हिमालय प्रदेश में बडी गर्मी पडी। जहाँ तहाँ पानी सूख गया। पशु पानी
न मिलने से कष्ट पाने लगे।
उन तपस्वियो में से एक तपस्वी ने उन (पशुओ) के प्यास-कष्ट को देख
एक वृक्ष काट, उसमें से एक द्रोणि बना, पानी उलीच कर द्रोणि भर, उन्हें पानी
दिया। बहुत से पशुओ के इकट्ठे होकर पानी पीने लगने पर तपस्वी को
फल-मूल लाने के लिए जाने का समय न मिला। वह निराहार रहकर भी पानी
पिलाता ही रहा।
पशुओं ने सोचा यह हमें पानी पिलाने के कारण फल-मूल के लिए जाने
का समय नही पाता। निराहार रहने के कारण बहुत कष्ट पाता है। हम लोग
एक निर्णय करें। उन्होने सलाह की कि इसके बाद जो पानी पीने आए वह
अपनी सामर्थ्य के अनुसार कुछ फल-मूल अवश्य लाए।
उसके बाद प्रत्येक पशु अपनी अपनी शक्ति के अनुसार मीठे मीठे आम,
जामुन, कटहल आदि अवश्य लाता। उसके लिए लाया हुआ फल ढाई गाडियाँ
भर होता। पाँच सौ तपस्वी उसे ही खाते। अधिक होता, छोड़ देते।

अम्ब ] ५७
बोधिसत्त्व ने यह देख कहा—एक कर्त्तव्य-निष्ठ आदमी के कारण इतने
तपस्वियों का बिना फल-मूल के लिए गए गुज़ारा चलता है। प्रयत्न करना
ही चाहिए। इतना कह यह गाथा कही—
वायमेथेव पुरिसो न निब्बिन्देय्य पण्डितो,
वायामस्स फल पस्स भुत्ता अम्बा अनीतिह ॥
[ आदमी को चाहिए कि प्रयत्न अवश्य करे। पण्डित आदमी विमुख
न हो। प्रयत्न के फल को देखो—आम प्रत्यक्ष खाने को मिले।]
संक्षिप्तार्थ—पण्डितो, अपने कर्तव्य की पूर्ति में वायमेथेव, विमुख न हो।
क्यो ? प्रयत्न के कभी निष्फल न होने के कारण। बोधिसत्त्व ने 'प्रयत्न सफल
होता ही है' ऋषियो को इस प्रकार सम्बोधन करते हुए कहा वायामस्स फल
पस्स। कैसा ? भुत्तो अम्बा अनीतिह, अम्ब, कहने के लिए है, मतलब है
नाना प्रकार के फल लाए गए, आम उनम श्रेष्ठ होने से अम्ब कहा गया।
यह जो पांच सौ ऋषियो ने स्वय जगल न जा एक के लिए आए फला को खाया,
सो यह प्रयत्न का ही फल है। ओर यह अनीतिह। इति ह (आप्त) इतिहास
से। इतिह से ही ग्रहण करना नही होता, उस फल को प्रत्यक्ष देखो।
बोधिसत्त्व ने ऋषियो को उपदेश दिया।
शास्ता ने यह धर्म-देशना ला, जातक का मेल बैठाया। उस समय का
कर्तव्य-निष्ठ तपस्वी यह भिक्षु था। गण-शास्ता में ही था।