जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें' मच्छ ] ३५३
क. वर्तमान कथा
शास्ता ने उसे पूछा—भिक्षु ! क्या तू सचमुच उत्कण्ठित है ? “भन्ते,
सचमुच” कहने पर शास्ता ने पूछा—“किसने उत्कण्ठित किया ?” जवाब
दिया—पूर्व-भार्या ने । शास्ता ने “भिक्षु ! यह स्त्री तेरा अनर्थ करने वाली
है। पहले भी तू इसके कारण कांटे से बींधा जाकर, अङ्गारो पर पकाया जाकर
खाया जाने वाला था। पण्डित की सहायता से जान बची” कह पूर्व-जन्म की
कथा कही।
ख. अतीत कथा
पूर्वकाल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
उसके पुरोहित हुए। एक दिन मछुए जाल में फँसे मच्छ को निकाल कर,
गर्म-बालू पर डाल, ‘उसे अङ्गारो में पकाकर खाएँगे’ सोच शूल तराशने लगे।
मच्छ ने मछली के बारे में रोने हुए यह गाथा कही—
न मायमग्गि तपति न सूलो साधु तच्छितो,
यञ्च मं मञ्जति मच्छी अञ्ज सो रतिया गतो ॥
सो मं दहति रागग्गि चित्तं बूपतपेति मं,
जालिनो मुञ्चयथिरं मं न कामे हञ्जते क्वचि ॥
[न मुझे, अग्नि तपाती है, न अच्छी तरह से छीला हुआ शूल ही। यह जो
मुझे मछली समझेगी कि रति के कारण यह दूसरी मछली के पास चला गया—
इसीका मुझे शोक है। मुझे वह रागाग्नि जला रही है। मेर चित्त को तपाती
है। हे मछुओ, मुझे छोड़ दो। कामी कही नही मारा जाता ।]
न मायमग्गि तपति, न मुझे यह आग जलाती है, न तपाती है, अर्थ है
शोक नही है। न सूलो यह शूल भी साधुतच्छितो न मुझे ताप देता है, न
शोक उत्पन्न करता है। यञ्च मं मञ्जति, जो मुझे मछली ऐसा कहेगी कि
वह पञ्च कामगुणो से प्रेरित हो दूसरी मछली के पास चला गया, यही मुझे
तपाता है, यही शोक उत्पन्न करता है।
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