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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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३६२ [ २.७.२१६
बानरो ने जब सुना कि बोधिसत्त्व आया है, तो उसे देखने के लिए महान्
शिला-तल पर इकट्ठे हुए। उन्होने बोधिसत्त्व से कुशल-समाचार की बात
कर पूछा—"मित्र, इतने दिन तक कहाँ रहे ?"
"वाराणसी मे, राजभवन में।"
"कैसे छूटे ?"
"राजा ने मुझे खेल करने वाला बन्दर बना, मेरे करतबो से प्रसन्न हो
मुझे छोड दिया।"
"आप मनुष्य लोको का बरताव जानते हैं। हमें भी कहें। हम सुनना
चाहते हैं।"
"मनुष्यो की करनी मुझसे मत पूछो।"
"कहें। हम सुनना चाहते हैं।"
बोधिसत्व ने, "मनुष्य चाहे क्षत्रिय हो, चाहे ब्राह्मण हो, सभी मेरा मेरा
करते हैं। वस्तुएँ अस्तित्व में आकर विनष्ट हो जाती हैं, इस अनित्यता को वे
नही जानते। अब उन अन्धे मूर्खों की बात सुनो" कह यह गाथाएँ कही—
हिरञ्जम्मे सुवण्णम्मे ऐसा रत्तिन्दिवा कथा,
दुम्मेधानं मनुस्सानं अरियधम्मं अपस्सतं ॥
द्वे द्वे गहपतयो गेहे एको तत्थ अमस्सुको,
लम्बत्थनो वेणिकतो अथो अङ्कितकण्णको;
कीतो धनेन बहुना सो तं वितुदते जनं ॥
[ प्रार्यधर्म को न जानने वाले मूर्ख मनुष्य दिन रात यही बातचीत करते
रहते हैं—मेरा हिरण्य, मेरा सोना।
घर में दो दो जने रहते हैं। एक को मूंछ नही होती। उसके लम्बे
स्तन होते हैं, वेणि होती है और कानो में छेद होते हैं। उसे बहुत धन से खरीदा
होता है। वह सब जनो को कष्ट देता है।]
हिरञ्जम्मे सुवण्णम्मे, यह दीपकमात्र है। इन दो पदो से दसो तरह के
रत्न, अगली-पिछली फसल, सब द्विपद तथा चतुष्पदो का ग्रहण कर 'यह मेरा
यह मेरा' कहा गया है। ऐसा रत्तिन्दिवा कथा, मनुष्य-लोग रात दिन यही