जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
नाश किया है' कह पूर्व-जन्म की कथा कही—
सञ्जीव ] १३७
हत्या करके श्रोतापत्ति फल से हाथ धोया। देवदत्त ने राजा का नाश कर दिया।
शास्ता ने आकर पूछा—भिक्षुओ, यहाँ बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ?
'अमुक बातचीत' कहने पर 'भिक्षुओ, केवल अभी अजातशत्रु दुष्ट का सम्मान
करके विनाश को प्राप्त नहीं हुआ पहले भी इसने दुष्ट का आदर कर अपना
नाश किया है' कह पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्व
महा सम्पत्तिशाली ब्राह्मण कुल में पैदा हुए। बड़े होने पर तक्षशिला जाकर
सब शिल्प सीख आए। फिर वाराणसी में प्रसिद्ध आचार्य्य हो पाँच सौ
विद्यार्थियो को विद्या सिखाने लगे।
- उन विद्यार्थियो मे एक सञ्जीव नाम का विद्यार्थी था। बोधिसत्त्व ने उसे
मुर्दे को जिलाने का मन्त्र सिखाया। उसने मुर्दे को जिलाने का ही मन्त्र सीखा,
फिर सुलाने का नही सीखा। एक दिन विद्यार्थियो के साथ जब वह लकडी
बटोरने जगल गया तो उसने एक मृत-व्याघ्र को देखा। उसने अपने साथियो
से कहा—मै इस मृत-व्याघ्र को जिलाऊँगा।
विद्यार्थी—"नही जिला सकेगा।"
सञ्जीवक—"तुम लोगो के देखते ही देखते जिलाऊँगा।"
विद्यार्थी—"यदि जिला सकता है तो जिला।"
इतना कहकर वे विद्यार्थी वृक्ष पर चढ गए। सञ्जीवक ने मन्त्र पढकर मृत-
व्याघ्र पर ककर फेंके। व्याघ्र उठकर जल्दी से आया और सञ्जीवक का गला
काट उसे मार स्वय भी वही गिर पडा। सञ्जीवक भी वही गिर पडा। दोनो
एक ही स्थान पर मुर्दे हो गए।
विद्यार्थियो ने लकडी ले आकर आचार्य्य को वह समाचार सुनाया।
आचार्य्य ने विद्यार्थियो को बुलाकर कहा—तात ! दुष्ट को बडप्पन देनेवाले,
जहाँ सम्मान नही करना चाहिए, वहाँ सम्मान प्रदर्शित करनेवाले इस प्रकार
के दुख को अवश्य प्राप्त होते हैं। इतना कह यह गाथा कही—
असन्तं यो पगण्हाति असन्तञ्चुपसेवति,
तमेव घास कुरुते व्यग्घो सञ्जीविको यथा ॥
१३८ [ १.१५.१५०
[जो दुश्चरित्र को बड़प्पन देता है, जो दुराचारी की संगत करता है,
उसे वह दुराचारी वैसे ही खा जाता है जैसे जीवन-प्राप्तं व्याघ्र ।]
असन्तं—तीन प्रकार¹ के दुश्चरित्र से युक्त, दुश्शील, पापी। यो पग्गण्हाति,
क्षत्रिय आदि में जो कोई इस प्रकार के दुराचारी प्रव्रजित को चीवर
आदि देकर अथवा गृहस्थ को उपराज वा सेनापति आदि का पद देकर बड़प्पन
देता है, सत्कार तथा सम्मान प्रदर्शित करता है। असन्तञ्चुपसेवति, जो
इस प्रकार के दुश्शील की संगति करता है। तमेव घासं कुरुते, उसी दुष्ट आदमी
को, बड़प्पन देनेवाले को वह दुराचारी खा जाता है, नष्ट करता है। कैसे ?
व्यग्घो सञ्जीविको यथा, जैसे सञ्जीवक नाम के विद्यार्थी ने मृत-व्याघ्र को मन्त्र
पढ़कर जिलाया, जीवन-दान दे आदृत किया। उसने उस जीवन-दान देनेवाले
सञ्जीवक का ही प्राण ले लिया। इस प्रकार जो कोई भी दुष्ट आदमी का आदर
करता है, वह दुष्ट अपना आदर करनेवाले ही को नष्ट करता है ! इस तरह
दुष्टो को बड़प्पन देनेवाले नाश को प्राप्त होते हैं।
बोधिसत्त्व इस गाथा द्वारा विद्यार्थियो को उपदेश दे दानादि पुण्य करके
कर्मानुसार परलोक सिधारे। शास्ता ने भी यह धर्म-देशना ला जातक का
मेल बैठाया ।
उस समय मृत-व्याघ्र को जिलानेवाला विद्यार्थी अजातशत्रु था। चारो
दिशाओ में प्रसिद्ध आचार्य्य तो मैं ही था।
¹ काय, वाक् तथा मन के पाप-कर्म ।