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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

११८. वट्टक जातक (२)

वट्टक ] ३३
११८. वट्टक जातक (२)
“नाचिन्तयन्तो पुरिसो....” यह गाथा शास्ता ने जेतवन में विहार
करते समय उत्तर नाम के श्रेष्ठि के पुत्र के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
श्रावस्ती में उत्तर श्रेष्ठि महाधनवान था। उसकी भार्या की कोख में
एक बालक पैदा हुआ। वह पुण्यवान् था, ब्रह्मलोक से च्युत होकर यहाँ जन्म
ग्रहण किया था। बडा होने पर वह ब्रह्मा की तरह सुन्दर वर्ण का हुआ।
एक दिन श्रावस्ती में कार्तिक महोत्सव की घोषणा होने पर सभी लोग
उत्सव मनाने मे मस्त थे। उस तरुण के मित्रो—सभी दूसरे श्रेष्ठि-पुत्रो की
पत्नियां थी। उत्तर श्रेष्ठि पुत्र बहुत समय तक ब्रह्मलोक में रहा था, इसलिए
उसकी कामभोग में आसक्ति न थी।
उसके मित्रो ने सोचा कि उत्तर श्रेष्ठि पुत्र के लिए भी एक स्त्री लाकर
उत्सव मनाएगे। वे उसके पास जाकर बोले “सौम्य ! इस नगर में कार्तिक
रात्रि का उत्सव घोषित हुआ है। तुम्हारे लिए भी एक स्त्री लाकर उत्सव
मनाएं ?”
'मुझे स्त्री की आवश्यकता नही हैं' कहने पर भी बार बार आग्रह करके
स्वीकार करवा लिया। तब एक वेश्या को सब अलकारो से सजा, उसके घर
ले जाकर उसे श्रेष्ठिपुत्र का सोने का कमरा दिखाकर कहा कि तू श्रेष्ठिपुत्र
के पास जा। उसे कमरा दिखा वे स्वय चले गए।
उसके शयनागार मे प्रविष्ट होने पर भी श्रेष्ठिपुत्र ने न उसकी ओर देखा,
न बातचीत की। उसने सोचा यह मेरे जैसी सुन्दर उत्तम विलास-युक्त स्त्री
की ओर न देखता है, न बातचीत करता है। इसे अब स्त्री-लीला से देखने
पर मजबूर करूँगी। तब वह स्त्री-लीला दिखाते हुए प्रसन्न-मुख की भाँति
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आगे के दांत निकालकर मुस्कराई। श्रेष्ठिपुत्र ने देखा, तो दांतो की हड्डियां
उसके लिए ध्यान का विषय हो गईं। उसमें अस्थि-सञ्ज्ञा पैदा हुई। उसे
वह सारा शरीर हड्डियों के पञ्जर की तरह मालूम देने लगा। उसकी मजदूरी
दे, उसने कहा 'जाओ'।
उसने घर से निकलने पर बीच-बाजार में खड़ा देख एक ऐश्वर्यशाली आदमी
उसे खर्चा दे अपने घर ले गया। सप्ताह बीतने पर उत्सव समाप्त हुआ।
वेश्या की माता ने जब देखा कि लडकी नहीं आई तो वह श्रेष्ठिपुत्रों के पास गई
और पूछा कि वह कहाँ है? उन्होने उत्तर श्रेष्ठिपुत्र के यहाँ जाकर पूछा कि
वह कहाँ है। उसने कहा "उसी समय खर्चा देकर विदा कर दिया।" उसकी
माँ रोने लगी। 'मैं अपनी लडकी को नहीं देखती। मेरी लडकी लाओ'
कहते हुए वह उत्तर-श्रेष्ठि-पुत्र को ले राजा के पास गई।
राजा ने मुकद्दमे का फैसला करते हुए पूछा-
"इन श्रेष्ठिपुत्रों ने तुम्हे वेश्या लाकर दी ?"
"देव ! हाँ।"
"अब वह कहाँ है ?"
"नहीं जानता हूँ। उसी समय उसे विदा कर दिया था।"
"अब उसे लिया आ सकता है ?"
"देव ! नहीं सकता हूँ।"
"यदि नहीं ला सकता है, तो इसे राज-दण्ड दो।"
उसके हाथ पीछे की तरफ बाँध राज-दण्ड देने के लिए उसे पकडकर ले
गए। वेश्या को न ला सकने के कारण राजा श्रेष्ठिपुत्र को राज-दण्ड दे रहा है,
सुन सारे नगर मे हल्ला मच गया। लोग छाती पर हाथ रखकर 'स्वामी !
यह क्या आपके योग्य है ?' कहते हुए रोने लगे। सेठ भी रोता पीटता
पुत्र के पीछे पीछे जा रहा था। श्रेष्ठिपुत्र सोचने लगा, 'यह जो मुझे इस प्रकार
का दुख हुआ, यह घर में रहन के ही कारण हुआ, यदि मैं इससे मुक्त हुआ
तो गोतम सम्यक सम्बुद्ध के पास प्रब्रजित होऊँगा।'
वेश्या ने हल्ला सुना तो पूछा यह क्या हल्ला है? समाचार मालूम
होने पर वह जल्दी से उतर "स्वामी ! हटो हटो" मुझे राज पुरुषो को देखने दें
कहती हुई राज-पुरुषो के पास पहुँची। राज-पुरुषो ने उसे देख माता को सौंपा

वट्टक ] ३५
और श्रेष्ठिपुत्र को मुक्त कर चले गए।
श्रेष्ठिपुत्र मित्रो रोहिणी नदी पर गया। यहाँ सिर से स्नान कर, घर जा,
प्रातराश कर, माता पिता को प्रव्रज्या की बात जना, चीवर-वस्त्र ले बड़ी
भारी मण्डली के साथ बुद्ध के पास जा प्रणाम कर प्रव्रज्या की याचना की।
प्राज्या तथा उपसम्पदा प्राप्त कर वह योगाभ्यास में लग विपश्यना की वृद्धि
कर थोड़ी ही देर में अर्हत्व मे प्रतिष्ठित हुआ।
एक दिन धर्म-सभा मे इकट्ठे हुए भिक्षु श्रेष्ठिपुत्र की प्रशंसा कर रहे थे—
“आयुष्मानो ! श्रेष्ठिपुत्र अपने पर आई आपत्ति देख बुद्ध-शासन की
महिमा जान 'इस दुःख से मुक्त होने पर प्रव्रजित होऊँगा' सोच, उस सुचिन्तन
के फलस्वरूप मुक्त हो, प्रव्रजित हो अर्हत्व में प्रतिष्ठित हुआ। शास्ता ने
आकर पूछा—'भिक्षुओ, इस समय बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ?'
"अमुक बातचीत ।"
"भिक्षुओ ! केवल श्रेष्ठिपुत्र ही अपने पर आपत्ति पड़ने पर इस उपाय
से इस दुःख से मुक्त होऊँगा" सोच मृत्यु भय से मुक्त नहीं हुआ, पूर्व समय में
बुद्धिमान लोग भी अपने पर आपत्ति पड़ने पर 'इस उपाय से इस दुःख से मुक्त
होग' सोच मृत्यु-भय के दुःख से मुक्त हुए। (यह कह) पूर्व-जन्म की
कथा कही।
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय जन्म मरण
के चक्कर में पड़े हुए बोधिसत्त्व एक बार बटेरे के जन्म में पैदा हुए।
उस समय बटेरो का एक शिकारी जगल से बहुत से बटेर पकड़ ले जाकर,
घर में रख उन्हें दाना खिला, खरीदारो से मूल्य ले उनके हाथ बेच अपनी
जीविका चलाता था। वह एक दिन बहुत से बटेरो के साथ बोधिसत्त्व को भी
पकड़ लाया। बोधिसत्व ने सोचा—यदि में इसका दिया हुआ चोगा खाऊँगा
पीऊँगा तो यह मुझे आये हुए मनुष्यो के हाथ बेच देगा। यदि नही खाऊँगा
तो मै कुम्हला जाऊँगा। मुझे कुम्हलाया हुआ देख कर मनुष्य नही खरीदेगे;
इस प्रकार मेरा कल्याण होगा। में यही उपाय करूँगा।
उसने वैसा ही किया, जिससे वह सूखकर केवल हड्डी और चमड़ी मात्र

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रह गया। मनुष्य उसे देखकर नहीं खरीदते थे। बोधिसत्त्व को छोड़ शेष
बटेरों के समाप्त हो जाने पर, चिड़ीमार पिंजरे को ला दरवाजे पर रख (उसमें
से) बोधिसत्त्व को हाथ पर ले देखने लगा कि इस बटेर को क्या हुआ ? उसे
असावधान देख बोधिसत्त्व ने पर फैलाए और उड़कर जंगल जा पहुँचा।
बटेरों ने बोधिसत्त्व को देखकर पूछा—"पता नहीं रहा कि कहाँ गए थे ?"
"मुझे चिड़ीमार ने पकड़ लिया था।" "कैसे मुक्त हुए ?" पूछने पर
बोधिसत्त्व ने कहा मैंने उसका दिया हुआ दाना-पानी नहीं ग्रहण किया, और
मुक्त होने का तरीका सोचकर छूट गया। (इतना कह) यह गाथा कही—
नाचिन्तयन्तो पुरिसो विसेसमधिगच्छति,
चिन्तितस्स फलं पस्स मुत्तोस्मि वधबन्धना ॥
[जो आदमी विचार नहीं करता, वह विशेष (=मोक्ष) को प्राप्त नहीं
होता। विचार करने के फल को देखो मैं मरण-बन्धन से मुक्त हो गया ।]
सारांश यह है। पुरिसो, दुःख में पड़कर मैं इस उपाय से मुक्त होऊँगा,
इस प्रकार न विचार करनेवाला अपने दुःख से मुक्ति स्वरूप विसेस नाधि
गच्छति । अब मैंने जो विचार से काम लिया, उसके फल को देखो। उसी
उपाय से मैं मुत्तोस्मि वधबन्धना, मैं मरण से तथा बन्धन से मुक्त हुआ।
इस प्रकार बोधिसत्त्व ने अपनी कृति का वखान किया।
शास्ता ने इस धर्मदेशना को ला जातक का मेल बैठाया। उस समय मरने
से मुक्त हुआ बटेर मैं ही था।