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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। मैं उस समय

घंतासन ] ८३
इस प्रकार बोधिसत्त्व इस गाथा से धर्मोपदेश कर धर्मानुसार राज्य कर
दानादि पुण्य करते हुए कर्मानुसार परलोक गए।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। मैं उस समय
तक्षशिला जाकर राज्य प्राप्त करनेवाला कुमार था।
१३३. घतासन जातक
“खेम योंह...” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय एक भिक्षु
के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
वह भिक्षु बुद्ध से कर्मस्थान ग्रहण कर प्रत्यन्त देश में जा एक गाँव के
पास एक आरण्यक निवासस्थान में रहने लगा। पहले ही महीने में जब वह
भिक्षा माँगने गया था, उसकी पर्णकुटी में आग लग गई। निवासस्थान के
अभाव में कष्ट पाते हुए उसने उपस्थायको से कहा। वे बोले—'अच्छा,
भन्ते पर्णशाला बनाएँगे। अभी तो हल जोत रहे हैं। अभी बो रहे हैं,
इस प्रकार कहते कहते उन्होंने तीन महीने बिता दिए।'
निवासस्थान की अनुकूलता न होने से वह भिक्षु कर्मस्थान को पूरा नहीं
कर सका। उसे निमित्त¹ तक प्राप्त नहीं हुआ। वर्षावास की समाप्ति पर
वह जेतवन गया और वहाँ शास्ता को प्रणाम कर एक ओर बैठा। शास्ता ने
उसके साथ बातचीत करते हुए पूछा—क्या भिक्षु ! तेरा कर्मस्थान सफल
¹ ध्यान के विषय (object) का आंख बन्द कर लेने पर दिखाई
देने वाला आकार।

८२ [ १.१४.१३२
गाने बजाने के शब्द से सारा राजभवन ऐसा गूंज गया जैसे मेघ के शब्द से
महासमुद्र की कोख भर जाए।
तब बोधिसत्व को विचार हुआ—यदि मैं उन यक्षिणियो के बनाए हुए
दिव्य रूप को देखता तो मैं मृत्यु को प्राप्त होता और मुझे यह वैभव न देखना
मिलता। प्रत्येक-बुद्धो के उपदेशानुसार चलने से मुझे इसकी प्राप्ति हुई।
इस प्रकार सोच उल्लास-वाक्य कहते हुए यह गाथा कही—
कुसलूपदेसे धितिया दळ्हाय च
अवत्थितत्ताभयभीरुताय च,
न रक्खसीन वसमगमिरम्हा
स सोत्थिभावो महता भयेन मे ॥
[ सदुपदेश पर दृढता पूर्वक स्थिर रहने से, तथा भय भीरुता को मन मे
स्थान न देने से हम राक्षसियो के वश में नही आए। में बडे भारी भय से
बच गया (सकुशल रहा)।]

कुसलूपदेसे; समर्थ लोगो के उपदेश से, प्रत्येक-बुद्धो के उपदेशानुसार
(चलकर)। धितिया दळ्हाय च, दृढ धृति से या स्थिर अखण्डित वीर्य्य से।
अवत्थितत्ताभयभीरुताय च, भय-भीरुता को मन में स्थान न देने से, भय
कहते हे चित्त का डर मात्र और भीरुता शरीर को कँपा देनेवाला भय। यह
दोनो बोधिसत्व को यह देखकर भी कि यक्षिणियां मनुष्यो को खा जाती हैं—
इस भय के कारण के उत्पन होने पर भी नही हुए। इसी लिए कहा है अवत्थि-
तत्ताभयभीरुताय च। भयभीरुता के न होने से अर्थात् भयभीरुता का कारण
उपस्थित होने पर भी पीछे न लौटने से। नरक्खसीन वसमगमिरम्हा, यक्ष-
कान्तार में उन राक्षसियो के वश में नही आया। क्योकि सदुपदेश में हमारी
स्थिति स्थिर और दृढ थी। भयभीरुता के न होने से पीछे न लौटने वाले हुए,
इसलिए राक्षसियो के वश में नही आए--यही भाव है। स सोत्थि भावो
महता भयेन मे सो आज मुझयह बडे भारी भय से, राक्षसियो से प्राप्त होनेवाले
दु ख दोर्मनस्य से छुटकारा मिला, कल्याण हुआ, प्रीतिसौमनस्य-भाव पैदा हुआ।