सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

ख. अतीत कथा

४१८ [ २.६.२३५
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
एक निगम-ग्राम में किसी ब्राह्मण कुल में पैदा हुए। बड़े होने पर ऋषियो
के प्रव्रज्या-क्रम से प्रव्रजित हो हिमालय में रहने लगे। वहाँ चिरकाल तक
रहकर नमक-खटाई खाने के लिए वाराणसी पहुँच, राजा के बाग में रह,
अगले दिन वाराणसी मे प्रवेश किया। वाराणसी का सेठ उनकी चालढाल
से प्रसन्न हुआ। उसने उन्हें घर ले जाकर भोजन खिलाया। फिर उद्यान में
रहने का वचन ले सेवा करते हुए उद्यान में बसाया। उनमें परस्पर स्नेह पैदा
हो गया ।
बोधिसत्त्व के प्रति प्रेम और विश्वास होने के कारण वाराणसी-सेठ एक
दिन इस प्रकार सोचने लगा—प्रव्रजित रहना दुष्कर है। मैं अपने मित्र
वच्छनख परिव्राजक को गृहस्थ बना सारा धन बीच में से आधा आधा बाँट
कर उसे दे दूँ। दोनो मिलकर रहें। उसने एक दिन भोजन के अनन्तर उसके
साथ मधुर बातचीत करते हुए कहा—'भन्ते वच्छनख ! प्रव्रजित रहना दु ख
है। गृहस्थ रहने में सुख है। आएं दोनो मिलकर विषयो का भोग करते हुए
रहें।' यह कह पहली गाथा कही—
सुखा घरा वच्छनख सहिरञ्जा सभोजना,
यत्थ भुत्वा च पीत्वा च सयेय्याय अनुस्सुको ॥
[ वच्छनख ! सोने और खाद्य पदार्थों से भरपूर घर सुख-कर हैं, जहाँ
खा पीकर आदमी निश्चिन्त सोता है।]
सहिरञ्जा सात रत्नो से युक्त। सभोजना बहुत खाद्य भोज्य पदार्थों
से युक्त। यत्थ भुत्वा च पीत्वा च जिन सोने और भोजनो से युक्त घरो में
नाना प्रकार के बढ़िया भोजन खाकर और नाना प्रकार के पान पीकर ।
सयेय्याय अनुस्सुको जिन (घरो) में अलंकृत शयनासनो पर निश्चित होकर
सोएगा, उससे घर बहुत ही सुखकर हैं।

वच्छनख ] ४१६
उसकी बात सुन बोधिसत्त्व ने कहा—सेठ ! तू अज्ञान के कारण काम-
भोगों में आसक्त होकर गृहस्थी का गुण और प्रव्रज्या का अवगुण कह रहा
है। अब तू सुन, मैं गृहस्थी के दोष बताता हूँ। यह कह दूसरी गाथा कही—
घरा नानीहमानस्स घरा नाभणतो मुसा,
घरा नाछिन्नदण्डस्स परेसं अनिकुब्बतो;
एव छिद्दं दुरभिभवं को घरं पटिपज्जति ॥
[ (नित्य) मेहनत न करने वाले की गृहस्थी नहीं चलती। झूठ न बोलने
वाले की गृहस्थी नहीं चलती। दूसरा को न ठगते हुए की गृहस्थी नहीं
चलती। दण्डत्यागी की गृहस्थी नहीं चलती। इस प्रकार की छिद्रों से पूर्ण,
मुश्किल से चलने वाली गृहस्थी को कौन करता है।]
घरा नानीहमानस्स नित्य कृषि गोरक्षा आदि करने में परिश्रम न करने
वाले की गृहस्थी नहीं (चलती)। गृहस्थी स्थिर नहीं होती। घरा नाभणतो
मुसा खेत, वस्तु, हिरण्य, स्वर्ण आदि के लिए झूठ न बोलने वाले की भी गृहस्थी
नहीं। घरा नाछिन्नदण्डस्स परेसं अनिकुब्बतो जिसने दण्ड नहीं लिया, जिसने
दण्ड ग्रहण नहीं किया, जिसने दण्ड रख दिया वैसे दूसरा को न ठगने वाले
की भी गृहस्थी नहीं। जो दण्डधारी होकर दूसरों के दासों तथा नौकर चाकर
आदि को उस उस अपराध के लिए अपराध के अनुसार वध करना, बाँधना,
(अङ्ग-) छेद करना, ताडना आदि करता है उसीकी गृहस्थी ठहरती है।
एव छिद्दं दुरभिभवं को घरं पटिपज्जति सो अब इस प्रकार डाग आदि के न
करने पर अनेक हानियां होने के कारण छिद्रपूर्ण, करने पर नित्य ही करना
पड़ने के कारण कठिन, मुश्किल से निभने वाली, नित्य करने पर भी दुरभि-
सम्भव तथा मुश्किल से पूरा पडने वाले घर को मैं चिन्ता-रहित होकर
करूँगा ? (ऐसा बोलकर) गृहस्थी को कौन करे ?
इस प्रकार बोधिसत्त्व गृहस्थी के दोष कह उद्यान ही चले गए। शास्ता
ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया।
उस समय बाराणसी-सेठ रोजमल्ल था। वच्छनख परिव्राजक तो मैं
ही था।