जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
पूर्व-जन्म की कथा कही ।
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तू नरक मे पैदा हुआ । अब फिर तू उसे ही क्यो चाहता है ?” इतना कह
पूर्व-जन्म की कथा कही ।
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
आकाश-स्थित देवता हुए ।
वाराणसी में कार्तिक मास की रात्रि का उत्सव हुआ । नगर देवनगर की
तरह सजाया गया । सब लोग उत्सव मनाने में मस्त थे ।
एक दरिद्र आदमी के पास केवल एक ही मोटे कपड़े का जोड़ा था । उसने
उसे अच्छी तरह धुलवाकर स्त्री कराके उसमें सैकडो, हजारो चुनन देकर
रक्खा था ।
उसकी भार्या बोली—“स्वामी ! मेरी इच्छा है कि केसर के रंग का
एक वस्त्र पहन तेरे गले से लग कार्तिक रात्रि के उत्सव में विचरूँ ।”
स्वामी बोला—“भद्रे ! हम दरिद्रो के पास केसर कहाँ से आएगा ?
शुद्ध वस्त्र पहन कर खेल ।”
“केसर रंग न मिलने पर उत्सव न खेलूँगी । तू दूसरी स्त्री लेकर खेल ।”
“भद्रे ! मुझे क्यो कष्ट देती है ? हम दरिद्रो के पास केसर कहाँ ?”
“स्वामी ! पुरुष की इच्छा हो तो क्या नही है ? क्या राजा के केसर-
बाग में बहुत केसर नही है ?”
“भद्रे ! वह स्थान राक्षसो से सुरक्षित तालाब की तरह बहुत बलवान
आदमियो से सुरक्षित है । वहाँ नही जा सकता । तू उसकी इच्छा मत कर ।
जो है उसी से सन्तुष्ट रह ।”
“स्वामी ! रात को अन्धकार होने पर क्या कोई ऐसी जगह है जहाँ आदमी
नही जा सकता ।”
उसके बार बार कहने से आसक्ति होने के कारण उसने उसकी बात स्वीकार
कर कहा—“अच्छा, भद्रे ! चिन्ता मत कर ।”
इस प्रकार उसे आश्वासन दे, रात को, जीवन का मोह छोड़ नगर से निकल
राजा के केसर-बाग पर जा वहाँ बाड को तोड़ बाग में दाखिल हुआ । पहरे-
दारो ने बाड के शब्द को सुन ‘चोर है’ समझ घेर कर पकड़ लिया । फिर गसी
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दे, पीट, बांधकर दिन होने पर राजा के पास ले गए । राजा ने आज्ञा दी—
जाओ इसे सूली पर चढ़ा दो ।
वे उसकी बाहो को पीछे बांध बध्य-भेरी के बजते हुए उसे नगर से बाहर
ले गए और वहाँ सूली पर चढ़ा दिया । बड़ी वेदना हुई । कौवे सिर पर बैठ
कर बर्छी की नोक सदृश चोंच से उसकी आँखें निकालने लगे । वैसे कष्ट को भी
भूलकर वह यही सोचता रहा—'ओह ! मैं घने पुष्प के रंग से रंगे वस्त्र पहने,
गले मे दोनो हाथ डाले उस स्त्री के साथ कार्तिक रात्रि के उत्सव में न घूम सका ।"
इस प्रकार चिन्ता करते हुए यह गाथा कही—
नयिदं दुक्खं अदु दुक्खं यं मं तुदति वायसो,
यं सामा पुप्फरत्तेन कत्तिकं नानुभोस्सति ॥
[ न मैं इसे ही दुःख समझता हूँ, न उसे ही जो कि कौआ मुझे ठोगे मारता
है । मुझे दुःख है तो यह है कि मेरी श्यामा फूल के रंगे वस्त्र से कार्तिक के उत्सव
का आनन्द न ले सकेगी । ]
नयिद दुक्खं अदु दुक्खं य मं तुदति वायसो, यह जो सूली पर चढ़ने का
शारीरिक और मानसिक दुःख है और यह जो लोहे जैसी चोंच से कौआ मुझे
ठोगे मारता है, यह सब मेरे लिए दुःख नहीं है । केवल वही दुःख मेरे लिए
दुःख है । कौनसा ? यं सामा पुप्फ रत्तेन कत्तिक नानुभोस्सति, जो वह प्रियङ्गु
श्यामा मेरी भार्य्या एक केसरी वस्त्र पहन, एक ओढ, इस प्रकार घने रंगीन लाल
वस्त्र जोड़े को धारण कर मुझे गल लगा कार्तिक रात्रि के उत्सव का आनन्द
न ले सकेगी । यही मेरा दुःख है । यही मुझे कष्ट देता है ।
यह इस प्रकार उस स्त्री के बारे में विलाप करता हुआ ही मरकर नरक में
पैदा हुआ ।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया । उस समय के
पति पत्नी इस समय के पति-पत्नी । उस बात को प्रत्यक्ष देखनेवाला आकाश-
देवता मै ही था ।