जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
पृष्ठ 368, कुल 479 में से
संदर्भ में पढ़ेंकच्छप ] : ३४५
इस प्रकार राजा ने दूसरे पत्र में लिख बोधिसत्व के पास भेजा। उसने
पत्र बाँच 'राजा मुझे देखना चाहता है' यह दूसरी गाथा लिखी—
यतो मं सरती राजा वायसम्पित पेहेतवे,
हंसा क्रोञ्चा मयूरा च असतिम्येव पापिया ॥
[ जब राजा कौवे का मांस पाकर भी मुझे भेजना याद रखता है, तो हंस,
क्रोञ्च और मयूर की तो बात ही क्या ? याद न आना ही बुरा है। ]
यतो मं सरति राजा वायसम्पित पहेतवे जब राजा कौवे का मास पाकर
भी मुझे उसे भेजना याद रखता है। हंसा क्रोञ्चामयूरा च, जब इसके लिए
इस आदि लाए जाएँगे, यह हंसमांस आदि पाएगा, तब मुझे क्यो न याद करेगा ?
अट्ठकथा मे हंसारोञ्चमयूरानं पाठ है। यह सुन्दरतर है। अर्थ यही है कि
इन हंस आदि का मास पाकर मुझे क्यो न याद करेगा ? असतिम्येव पापिया
यह या वह मिलने पर याद आना ही अच्छा है। दुनिया मे याद न आना ही
बुरा है, याद न करना ही हीन है, खराब है। यह हमारे राजा में नहीं है।
राजा मुझे याद करता है। मेरे आने की प्रतीक्षा करता है। इसलिए जाऊँगा।
गाड़ी जुड़वा, जाकर राजा को देखा। राजा ने सन्तुष्ट हो पुरोहित का
ही पद दिया।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय राजा
आनन्द था। पुरोहित मैं ही था।
२१५. कच्छप जातक
"अवधी वत अत्तानं.." यह शास्ता ने जेतवन मे रहने समय कोकालिय
के बारे में कही।