सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय के

कुण्डकपूव ] १७
इस प्रकार बोधिसत्व ने सीखनेयोग्य शिल्पो (के सीखने) का माहात्म्य
कहा।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय के
पति-पत्नी ही अब के पति-पत्नी। पण्डित अमात्य तो मैं ही था।
१०६. कुण्डकपूव जातक
“ययन्नो पुरिसो होति” यह शास्ता ने श्रावस्ती में रहते समय, एक
महा दरिद्र (मनुष्य) के सम्बन्ध से कही।
क. वर्तमान कथा
श्रावस्ती म कभी एक ही परिवार बुद्ध तथा उनके सघ को दान देता,
कभी तीन चार परिवार एक मे मिलकर, कभी एक गण, कभी एक गली के
लोग, कभी सारे नगर के लोग मिलकर। उस समय एक गली के लोग
मिलकर दान दे रहे थे। मनुष्य बुद्ध तथा सघ को यवागु परोसकर कहने लगे
“खाजा लाभो।”
उस गली में रहनेवाले, दूसरो की मजदूरी करके जीनेवाल, एक दरिद्र
मनुष्य ने सोचा—"में यवागू नही दे सकता। खाजा दूँगा।" (यह सोच)
उसने चावल की बहुत बारीक कनखी ले, छाज से फटक कर पानी से भिगो,
आक के पत्तो में रख, भाग मे पकाया। फिर 'यह बुद्ध को दूंगा' सोच उसे ले
जाकर शास्ता के सामने खडा हुआ। (लोगो ने) 'खाजा लाभो' पहली बार
कहा ही था कि उसने सबसे पहले जाकर शास्ता के सामने वह पूडा रख दिया।
शास्ता ने औरो के दिये हुए खाजो को अस्वीकार कर उसी पूडे-खाजे को ग्रहण
किया। उसी समय सारे नगर में एक शोर मच गया कि सम्यक् सम्बुद्ध ने उस
महादरिद्र का खाना बिना घृणा के खाया।
२

१८ [ १.११.१०६
राजा, राजा के महामन्त्री आदि, और तो और द्वारपाल तक आकर
शास्ता को प्रणाम कर उस महादरिद्री से कहने लगे—"भो ! सौ लेकर, दो सौ
लेकर या पांच सौ लेकर हमारा भी हिस्सा रक्खो ।" उसने 'शास्ता से पूछकर
जाऊंगा' सोच शास्ता के पास जाकर यह बात कही । शास्ता ने उत्तर दिया
"धन लेकर या बिना लिये जैसे भी हो सब प्राणियो को हिस्सेदार बनाओ ।
उसने धन लेना प्रारम्भ किया। मनुष्यो ने दुगुना, चौगुना, आठ गुना आदि
दे देकर नौ करोड सोना दिया । शास्ता दानानुमोदन कर विहार चले गये ।
फिर भिक्षुओं के अपना अपना कर्त्तव्य करने पर शास्ता ने उन्हें उपदेश दे
गन्धकुटी मे प्रवेश किया ।
शाम को राजा ने उस महादरिद्री को बुलवाया और श्रेष्ठी बना उसका
सत्कार किया। धर्म-सभा मे भिक्षुओ ने बातचीत चलाई—"आयुष्मानो !
महान् दरिद्री के दिये हुए पूए, शास्ता ने बिना घृणा प्रगट किये ऐसे खाये
जैसे अमृत । महान् दरिद्री भी बहुत सा धन और सेठ का पद प्राप्त कर
बहुत सम्पत्तिशाली हो गया । शास्ता ने आकर पूछा—"भिक्षुओ ! बैठे
क्या बातचीत कर रहे हो ?"
"अमुक बातचीत" कहने पर 'भिक्षुओ ! न केवल अभी मैने बिना
घृणा दिखाये उसके पूए खाये बल्कि पहले जब मै वृक्ष-देवता था तब भी खाये
थे" कह पूर्व-जन्म की कथा कही—

ख. अतीत कथा

पूर्व समय म वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य के समय बोधिसत्व अरण्डी
के एक वृक्ष पर वृक्ष-देवता होकर पैदा हुए । उस गांवडे के मनुष्य तब देवता-
विश्वासी¹ थे । एक त्योहार आने पर उन्होने अपने अपने वृक्ष-देवताओ को
बलि दी । एक दरिद्री मनुष्य ने लोगो को वृक्ष-देवताओ की सेवा करते देख
स्वय एक अरण्ड-वृक्ष की सेवा की । मनुष्य अपने अपने देवताओ के लिये

¹देवता मङ्गलिका, जिनका विश्वास हो कि देवताओ की पूजा करने
से कल्याण होगा ।

कुण्डकपूव ] १६
नाना प्रकार के माला, गन्ध, लेपन आदि और खाद्य-भोज्य लेकर गये ।
लेकिन यह ले गया भूरे के पूए और कड्छी में पानी। अरण्ड-वृक्ष के समीप
पहुँचा तो सोचने लगा—"देवता दिव्य-भोजन करते हैं। मेरे देवता यह
घूरे का पूआ नहीं खायेंगे। इसे व्यर्थ क्यों नष्ट करें ? मैं ही इसे खा लूँगा।"
यह सोच वहीं से लौट पड़ा।
बोधिसत्त्व ने वृक्ष की शाखा पर खड़े होकर कहा—"भो ! यदि तुम
धनी होते तो मुझे मधुर खाजा देते, लेकिन तुम दरिद्र हो। मैं तुम्हारा पूआ
न खाकर और क्या खाऊँगा ? मेरे हिस्से को नष्ट न करो।"
इतना कह यह गाथा कही—
ययन्नो पुरिसो होति तथन्ना तस्स देवता,
आहरेतं फणं पूर्व मा मे भागं विनासय ॥
[ जैसा आदमी, वैसा देवता । इस घूरे के पूए को ला । मेरे हिस्से
को नष्ट मत कर।]
───
ययन्नो, जैसा भोजन, तथन्ना, उस आदमी का देवता भी वैसे ही भोजन
का खानेवाला होता है। आहरेत फणं पूवं—इस घूरे के पके पूए को ला ।
मेरे हिस्से को नष्ट न कर ।
उसने वापिस लौट बोधिसत्त्व को देख बलि दी। बोधिसत्त्व ने उसमें से
सार ग्रहणकर पूछा—"भले आदमी ! तू किस लिये मेरी सेवा करता है ?"
"स्वामी ! मैं दरिद्र हूँ। चाहता हूँ कि दरिद्रता से मुक्त हो जाऊँ ।
इसी लिये सेवा करता हूँ।"
"भले आदमी ! चिन्ता मत कर। तूने जो सेवा की है वह कृतज्ञ की,
कृत-उपकार को न भूलनेवाले की की है। इस अरण्ड के चारो ओर खजाने से
भरे घडे गर्दन से गर्दन मिलाकर रक्खे हैं। तू राजाको कह, गाड़ियों में धन
लदवाकर राजाङ्गण में डलवा। राजा प्रसन्न होकर तुझे श्रेष्ठी का पद दे
देगा।"
यह कहकर बोधिसत्त्व अन्तर्धान हो गये। उसने वैसा ही किया। राजा