जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
१५२. सिगाल जातक
१४४ [ २ । १५२
१५२. सिगाल जातक
“असमेक्खित कम्मन्त....” यह शास्ता ने कूटागार शाला में रहते
समय वैशाली निवासी एक नाई के लड़के के बारे में कही—
क. वर्तमान कथा
उसका पिता राजाओ, रानियो, राजकुमारो तथा राजकुमारियो की
हजामत बनाता, केश ठीक करता, शतरज¹ बिछाता तथा और भी सभी
कार्य्य करता था। वह श्रद्धावान था। उसने बुद्ध धर्म तथा सघ की शरण
गही थी। वह पञ्चशीलो की रक्षा करता था। बीच बीच में वह शास्ता का
धर्मोपदेश सुनता हुआ, अपना समय व्यतीत करता था।
एक दिन वह राजा के यहाँ काम करने जाते समय अपने पुत्र को साथ ले
गया। पुत्र ने वहाँ एक देवप्सरा सदृश सजी हुई लिच्छवि कुमारी को देखा।
वह उस पर आसक्त हो गया। पिता के साथ राजभवन से लौटने पर उसने
कहा कि यह कुमारी मिलेगी तो बचूँगा, नही तो यही मेरा मरण होगा। इतना
कह वह खाना पीना छोड़ चारपाई पर पड रहा।
उसके पिता ने पास आकर कहा—तात ¹ अनधिकार इच्छा मत
कर। तू नाई का लडका है। तेरी जाति छोटी है। लिच्छवि कुमारी क्षत्री
की लडकी है। ऊँची जाति वाली। वह तेरे लिए योग्य नही है। तेरे लिए तेरी
समान जाति और गोत्र की कोई दूसरी लडकी ला दूँगा।
उसने पिता का कहना नहीं माना। उसके माता, भाई, बहन, चाची, चाचा
¹ दोनो ओर आठ आठ मोहरों के स्थान होने से शतरंज का पुराना नाम
अट्ठपद है।
सिगाल ] १४५
सभी रिश्तेदारो तथा मित्रो आदि ने समझाने की कोशिश की । वे नही समझा
सके । वह वही सूख सूख कर मर गया ।
उसका पिता शरीर का दाह-कर्म आदि कृत्य करके जब शोक कम हुआ तो
शास्ता की वन्दना करने की इच्छा से बहुत सा गन्ध-माला-लेप आदि ले महावन
पहुँच शास्ता की पूजा कर, प्रणाम कर एक ओर बैठा । शास्ता ने पूछा—
“उपासक ! क्यो इन दिनो दिखाई नही देता ?”
उसने वह हाल कहा ।
शास्ता बोले—“उपासक ! तेरा लडका केवल अभी अनधिकार इच्छा
करके विनाश को प्राप्त नही हुआ, पहले भी हुआ है ।”
उपासक के प्रार्थना करने पर शास्ता ने पूर्व जन्म की बात कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व काल मे वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
हिमालय-प्रदेश मे सिंह होकर पैदा हुए । उनसे छोटे छ भाई थे और एक बहन
थी । सभी काञ्चन-गुफा में रहते थे ।
उस गुफा से थोडी ही दूर रजत पर्वत पर एक स्फटिक गुफा थी । उसमें
एक सियार रहता था । समय गुजरने पर उन सिंहो के माता पिता मर गए ।
वह अपनी बहन सिंह बच्ची को गुफा में छोड जाते और स्वय शिकार के लिए
बाहर निकल मास ला कर उसे देते । वह सियार उस सिंह बच्ची को देखकर
उस पर आसक्त हो गया । उसके माता पिता जब थे, तब तो उसे अवसर न
मिलता था । अब इन सातो जनों के शिकार के लिए चले जाने पर स्फटिक
गुफा से उतर काञ्चन-गुफा के द्वार पर जा सिंह बच्ची के सामने इस प्रकार
कुछ लौकिक ढंग की गुप्त बातचीत कहता—
‘सिंह की बच्ची ! में भी चौपाया हूँ। तू भी चौपाया है । तू मेरी
भार्या बन । मे तेरा पति बनूंगा । हम मिलकर प्रसन्नता पूर्वक रहेंगे । अब
से तू मेरी प्रेमिका हो जा ।”
वह उसकी बातचीत सुन सोचने लगी—
“यह सियार चौपायो म सबसे निचले दर्जे का निकृष्ट प्राणी है, वैसे ही
जैसे चाण्डाल । हम उत्तम राजकुल के है। यह मुझसे असभ्य अनुचित बात
१०
१४६ [ २.१.१५२
चीत करता है। मैं इस प्रकार की बात चीत सुनकर जीकर ही क्या करूंगी ?
सांस रोक कर मर जाऊँगी।"
फिर उसने सोचा—
"मेरा इस प्रकार यूँ ही मरना ठीक नही। मेरे भाई आते हैं। उन्हें
कहकर मरूँगी।"
सियार को भी जब उसकी ओर से कोई उत्तर न मिला तो उसने सोचा
यह मुझसे सम्बन्ध नही करेगी। वह अफसोस करता हुआ स्फटिक गुफा में
जाकर पड रहा।
एक सिंह बच्चा भैस वा हाथो में से किसी को मार मास खा, बहन का
हिस्सा लाकर बोला—"मांस खा।"
"भाई ! में मांस नही खाऊँगी। में मरूँगी।"
"क्यो ?"
उसने वह हाल कहा।
"अब वह सियार कहाँ है ?"
उसने स्फटिक गुफा में पड़े हुए सियार को आकाश में हूँ समझा और
बोली—"भाई ! क्या नही देखते हो ? यह रजत पर्वत पर आकाश में
स्थित है।"
सिंह बच्चा नही जानता था कि वह स्फटिक गुफा में लेटा है। उसने उसे
आकाश में लेटा हुआ समझ सोचा "इसे मारूँगा" घोर सिंह-वेग के साथ उछल
कर, स्फटिक गुफा पर छाती से चोट की। उसका हृदय फट जाने से वह मर कर
वही गिर पड़ा।
तब दूसरा आया। उसने उसे भी वैसा ही कहा। उसने भी वैसा ही किया
और मरकर पर्वत के नीचे गिर पड़ा। इस प्रकार छओ भाइयो के मरने पर
सबसे अन्त में बोधिसत्त्व आए। उसने उन्हें भी वह हाल कहा और यह
पूछने पर कि अब वह कहाँ है बताया कि यह रजत पर्वत पर आकाश में
लेटा है।
बोधिसत्त्व ने सोचा—सियार आकाश में नहीं ठहर सकते। यह स्फटिक
गुफा में पड़ा होगा। वे पर्वत के नीचे उतरे तो देखा कि छओ भाई मरे पड़े हैं।
वे समझ गए कि अपनी मूर्खता के कारण विचार न कर सकने के कारण स्फिटल-
सिगाल ] १४७
गुफा न जानने से उसी से हृदय टकराकर मरे होगे । 'बिना विचारे जल्दबाजी
करने वालो का काम ऐसा ही होता है' कह पहली गाथा कही—
असमेक्खितकम्मन्तं तुरिताभिनिपातिनं,
सानि कम्मानि तप्पेन्ति उन्हं बज्झोहितं मुखे ॥
[जो आदमी बिना विचारे जल्दबाजी में काम करता है, उसके वह काम ही
उसे तपाते हैं; जैसे मुंह मे डाला हुया गर्म भोजन ।]
असमेक्खितकम्मन्तं तुरिताभिनिपातिनं, जो आदमी जिस काम को करना
चाहता है, यदि वह उसके दोषो का ख्याल न कर, उन पर विचार न कर जल्दबाज
होकर जल्दी मे ही उस काम को करने को तैयार होता है, कूद पडता है, लग
जाता है, उस बिना विचारे जल्दबाजी में काम करने वाले को वे इस प्रकार किए
गए सानि कम्मानि तप्पेन्ति, सोच में डाल देते हैं कष्ट देते हैं । कैसे ? उन्हं
बज्झोहितं मुखे जिस तरह खाते समय यदि इसका विचार न कर कि यह ठण्डा
है, यह गर्म है गर्म भोजन मुख में डाल दिया जाए तो मुंह भी जलता है, गला
भी जलता है और पेट भी जलता है; चिन्ता होती है तथा कष्ट होता है । इसी
प्रकार उस तरह के आदमी को वह कर्म तपाते है ।
उस सिंह ने यह गाथा कह सोचा—मेरे भाई उपाय-कुशल नहीं रहे ।
सियार को मारने जाकर वह बडे जोर से कूद कर स्वय मर गए । मैं ऐसा न कर
गुफा में पडे हुए ही सियार के हृदय को फाड डालूंगा ।
उसने सियार के चढने-उतरने के रास्ते का ख्याल कर उसके सामने खडे
हो तीन बार सिंह नाद किया । पृथ्वी सहित आकाश गूंज उठा । सियार का
हृदय स्फटिक गुफा में लेटे ही लेटे डर के मारे फट गया । वह वही मर गया ।
शास्ता ने कहा—इस प्रकार वह सियार सिंहनाद सुनकर मर गया ।
शास्ता ने बुद्धत्व प्राप्त किए रहने पर यह गाथा कही—
सीहोच सीहनादेन बद्धरं अभिनादयि
सुत्वा सीहस्स निग्घोस सिगालो दद्दरे वस
भीतो सन्तासमापादि हृदयं चस्स अप्फलि ॥
१४८ [ २.१.१५
[ सिंह ने सिंह नाद से गुफा को गुंजा दिया । गुफा मे रहने वाले सियार
जब सिंह की आवाज सुनी तो वह डर कर त्रास को प्राप्त हुआ और उसका हृद
फट गया । ] '
सीहो, सिंह चार प्रकार के होते हैं (१) तृण-सिंह (२) पाण्डु-सिंह
(३) बाळ-सिंह (४) लाल हाथ पैर वाला केसरी । उनमें से यहाँ केसरी
सिंह से ही मतलब है । दद्दरं अभिनादयि सौ बिजलियो के शब्द से भी भयानक
सिंहनाद से उस रजत पर्वत को निनादित कर दिया, गुंजा दिया । यद्वरे बसं
स्फटिक मिले रजत पर्वत पर रहते हुए । भीतो सन्तासमापादि मृत्यु-भय से
डरकर चित्त-त्रास को प्राप्त हुआ । हृदयं चस्स अप्फलि, उस भय से उसका
हृदय फट गया ।
इस प्रकार सिंह उस सियार का प्राणान्त कर, भाइयो को एक जगह छिपाकर
बहन को उनके मरने का वृत्तान्त कह, उसे दिलासा दे जन्म भर काञ्चन गुफा
में ही रह कर्मानुसार परलोक सिधारा ।
शास्ता ने यह धर्म-देशना ला आर्य-सत्यों को प्रकाशित कर जातक का
मेल बैठाया । सत्यों का प्रकाशन हो चुकने पर उपासक श्रोतापत्ति फल में
प्रतिष्ठित हुआ ।
उस समय सियार नाई का लडका था । सिंह-बच्ची लिच्छवि-कुमारी,
छ छोटे भाई कोई स्थविर हुए । ज्येष्ठ-भ्राता सिंह तो मैं ही था ।
१५३. सूकर जातक
"चतुप्पदो अहं सम्म...." यह गाथा ने जेतवन में विहर करते
समय एक बूढ़े स्थविर के बारे में कही ।