जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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तो इसमें तुम्हारा क्या ?'' कहने की इच्छा से उस लकड़ी को जहाँ से
पकड़ा था छोड़ दिया। वह खुले आँगन में गिर दो टुकड़े हो गया। एक
शोर हुआ—कछुवा खुले आँगन में गिर दो टुकड़े हो गया।
अमात्यों से घिरे हुए राजा ने बोधिसत्त्व को साथ ले उस जगह पहुँच,
कछुवे को देख पूछा—पण्डित ! यह कैसे गिरा ?
बोधिसत्त्व ने सोचा—मै बड़ी देर से राजा को उपदेश देने की इच्छा से
किसी उपाय की खोज में घूमता हूँ। इस कछुवे की हंसों के साथ दोस्ती हुई
होगी। वे 'इसे हिमवन्त ले चलेंगे' सोच लकड़ी मुंह में दे आकाश में उड़े होंगे।
इसने किसी की बात सुन जबान पर काबू न होने से कुछ कहने की इच्छा से
डण्डा छोड़ दिया होगा। इस प्रकार आकाश से गिर कर मरा होगा। यह
बोला—"हाँ ! महाराज ! जो वाचाल होते हैं, जिनके वचन की सीमा नही
होती वे इस प्रकार दुःख को प्राप्त होते हैं।" इतना कह यह गाथाएँ कही—
अवधी वत अत्तान कच्छपो व्याहरं गिरं,
सुग्गहीतस्मि कट्ठस्मि वाचाय सकिया वधि ॥
एतम्पि दिस्वा नरविरिय सेट्ठ !
वाच पमुञ्चे कुसलं नातिवेलं;
पस्ससि बहुभाणेन कच्छप व्यसनं गतं ॥
[कछुवे ने वाणी का प्रयोग करके अपने को मार डाला। अच्छी तरह
लकड़ी को पकड़े हुए अपनी वाणी के कारण (उसे छोड़ कर) अपने को मारा।
नरवीर्य श्रेष्ठ ! इसे भी देख कर (आदमी को) कुशल वाणी ही बोलनी
चाहिए और वह भी समय (की सीमा) लांघ कर नही। देखते ही हो, अधिक
बोलने से कछुआ मर गया।]
अवधी वत घात किया। व्याहर व्यवहार करते हुए। सुग्गहीतस्मि
कट्ठस्मि मुख से अच्छी तरह लकड़ी को पकड़े हुए। वाचाय सकिया वधि
वाचाल होने से अनुचित समय पर बोल कर पकड़ी हुई जगह को छोड़ अपनी
उस वाणी के कारण अपने को मार डाला। इस प्रकार यह मरा। किसी दूसरे
कारण से नही।