जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
१६१. इन्दसमानगोत्त जातक
दूसरा परिच्छेद
२. सन्थव वर्ग
१६१. इन्दसमानगोत्त जातक
“न सन्थयं कापुरिसेन कयिरा ००” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते
समय एक ऐसे भिक्षु के बारे में कही जो किसी की बात न मानता था।
क. वर्तमान कथा
उसकी कथा नौवें परिच्छेद में गिज्झ जातक¹ में आएगी। शास्ता ने
उस भिक्षु को कहा—हे भिक्षु ! तूने पहले भी किसी की बात न मानने वाला
होने से पण्डितों का कहना न माना और मस्त हाथी के पैरो से रौंदा जाकर
चूर चूर हुआ। इतना कह पूर्व जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
ब्राह्मणकुल में पैदा हुए। बड़े होने पर घर बार छोड़ ऋषियों के ढंग की प्रव्रज्या
ग्रहण कर पाँच सौ ऋषियों के दल का नेता बन हिमालय प्रदेश में रहने लगे।
उन तपस्वियों में एक इन्दसगोत्त नाम का तपस्वी था—किसी की बात न
मानता था, किसी का कहना न करता था।
उसने एक हाथी-बच्चा पाल रक्खा था। बोधिसत्त्व ने सुना तो उसे
बुलाकर पूछा—‘सचमुच ! तू हाथी-बच्चे को पाल-पोस रहा है ?’
¹ गिज्झ जातक (४२७)
१८६ [ २.२.१६१
'सचमुच आचार्य ! एक हाथी-बच्चा है, जिसकी माँ मर गई है, उसे '
पोस रहा हूँ।'
'हाथी बड़े होने पर पालन-पोषण करने वाले को ही मारते हैं, तू उसे
मत पोस।'
'आचार्य ! उसके बिना नहीं रह सकता।'
'अच्छा ! तो पता लगेगा।'
उससे पोसा जाकर वह हाथी-बच्चा आगे चलकर बड़े भारी शरीर वाला
हो गया।
एक समय वे ऋषिगण जंगल से फल-मूल लाने के लिए दूर चले गए
और कुछ दिन वहीं रहे। हाथी को श्रेष्ठ दक्षिण हवा लगी तो उसका मद
फूट पड़ा। उसने उस तपस्वी की पर्णकुटी नष्ट कर डाली। पानी का घड़ा
फोड़ दिया। पत्थर का तख्ता फेंक दिया। आलम्बन-तख्ता' नोच डाला।
फिर उस तापस्वी को मार डालकर ही जाने के विचार से एक घनी जगह में
छिपकर उसके आने के रास्ते की ओर देखता हुआ खड़ा रहा।
इन्दसगोत्त अपना फल-मूल ले, सबके आगे आगे आ रहा था। उसे देख
वह साधारण स्वभाव से ही उसके पास गया।
हाथी ने घनी जगह से निकल, उसे सूण्ड से पकड़, जमीन पर गिरा, सिर
पैर से दबा मार डाला। फिर उसे मसलता हुआ क्रौञ्चनाद करके जंगल में
चला गया। शेष तपस्वियो ने बोधिसत्व से यह समाचार कहा। बोधिसत्त्व
ने यह कहते हुए कि बुरे आदमी से दोस्ती नहीं करनी चाहिए, यह गाथा कही—
न सन्थवं पापपुरिसेन कयिरा
अरियो अनरियेन पजानमत्थं
चिरानुवुत्थो पि करोति पापं
गजो यथा इन्दसमानगोत्तं ॥
यं ह्येव जञ्जा सदिसो मर्म
सीलेन पञ्ञाय सुतेन चापि
' जिसके सहारे से बैठ सकें।
इन्दसमानगोत्त ] १८७
तेनेव मेत्तिं कयिराथ सद्धिं
सुखावहो सप्पुरिसेन सङ्गमो ॥
[ श्रेष्ठ आदमी अर्थ-अनर्थ को जानता हुआ बुरे आदमी से दोस्ती न करे।
चिरकाल तक साथ रह कर भी बुरा आदमी बुराई करता है, जैसे हाथी ने
इन्द्रसमान गोत्र की बुराई की।
जिसके सदाचार, प्रज्ञा तथा ज्ञान को अपने बराबर का समझे, उसीके
साथ मैत्री करे। सत्पुरुष के साथ की गई मैत्री सुख को देने वाली होती है।]
न मन्थय कापुरिसेन कयिरा, घृणित क्रोधी आदमी के साथ आसक्ति
वा मैत्री न करे। अरियो अनरियेन पजानमत्थ; आर्य चार प्रकार के होते
हे (१) आचार आर्य, (२) लिङ्ग-आर्य, (३) दर्शन आर्य, (४) प्रतिवेध-
आर्य। इनमें यहाँ आचार्यार्य आर्य से मतलब है। जो अर्थ को जानता है
अर्थ को पहचानता है, आचार में स्थित है—ऐसा आर्य-पुद्गल, अनार्य,
निर्लज्ज, दुश्शील के साथ मैत्री न कर। क्या ? चिरानुवुत्थोपि करोति पापं,
क्योंकि अनार्य चिरकाल तक एक साथ रहकर भी, उस एक साथ रहने का
ख्याल न कर पाप, पाप-कर्म, बुरा-कर्म करता है। जैसे क्या ? गजो यथा
इन्दसमामगोत्त जैसे उस हाथी ने इन्द्रसमानगोत्र को मार कर पाप किया।
यं त्वेव जञ्जा सदिसो मम, इत्यादि में जिस आदमी को जाने कि यह
आदमी शील आदि में मेरे समान है, उसीके साथ मैत्री करे। सत्पुरुष के
साथ मेल जोल सुखदायी होता है।
इस प्रकार बोधिसत्त्व ने उपदेश दिया कि बात न मानने वाला नही होना
चाहिए, कहना मानने वाला होना चाहिए। यूँ ऋषिगण को उपदेश दे इन्द्र
समान गोत्र का शरीर-कृत्य करवा ब्रह्म विहारों की भावना करते हुए वह
ब्रह्म लोकगामी हुए।
शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया।
उस समय इन्दसमानगोत्त यह बात न मानने वाला भिक्षु था। ऋषि-
गण का शास्ता मे ही था।