जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकूटवाणिज ] ३५७
२१८. कूटवाणिज जातक
"साठस्स साठेय्यमिद...." यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय
एक कूट व्यापारी के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
कूट व्यापारी और पण्डित व्यापारी दो श्रावस्तीनिवासी व्यापारियों ने
साझा व्यापार करना आरम्भ करके, सामान की पाँच सौ गाड़ियाँ भरीं।
ये पूर्व से पश्चिम घूमते हुए व्यापार कर बहुत मुनाफा कमा श्रावस्ती लौटे।
पण्डित व्यापारी ने कूट व्यापारी को कहा—दोस्त ! सामान बाँट लें।
कूट व्यापारी ने सोचा—यह बहुत दिनों तक आराम से सोना तथा अच्छा
भोजन न मिलने के कारण थका हुआ अपने घर जाकर नाना प्रकार के अच्छे
अच्छे भोजा खाएगा, बदहजमी से मरेगा। तब यह सारा सामान मेरा ही
हो जाएगा। इस लिए वह 'आज नक्षत्र अच्छा नहीं, कल देगें', 'आज दिन
अच्छा नहीं, कल देंगे' करता हुआ समय बिताने लगा।
पण्डित व्यापारी ने उसे मजबूर कर सामान बँटवाया। फिर गन्धमाला
से शास्ता के पास जा, पूजा-वन्दना कर एक ओर बैठा। शास्ता ने पूछा—
कब आया ?
"भन्ते ! मुझे आए आधा महीना हुआ।"
"तो इस प्रकार देर करके क्यो बुद्ध की सेवा में आया है ?"
उसने यह हाल कहा। शास्ता ने 'उपासक ! यह केवल अभी ठग
व्यापारी नहीं है, पहले भी ठग व्यापारी ही था' कह उसके प्रार्थना करने पर
पूर्व-जन्म की कथा कही—