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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

क. वर्तमान कथा .

सुसीम ] १६१
क. वर्तमान कथा .
श्रावस्ती में कभी एक ही परिवार भिक्षुसघ को जिसमें बुद्ध मुख्य रहते
थे दान देता था, कभी बहुत से लोग एक साथ इकट्ठे हो दल बना कर दान
देते थे, कभी एक एक गली के लोग मिलकर देते थे और कभी सारे नगर के
लोग सबसे इकट्ठा करने के दान देते थे।
इस समय सारे नगर निवासियो से दान इकट्ठा किया गया। सारा
सामान तैयार हो गया। दाताओ में दो पक्ष थे। कुछ ने कहा यह सामान
अन्य-तीथिको को दे। कुछ ने कहा सघ को, जिसके प्रमुख बुद्ध हैं। इस प्रकार
बार बार बात होने पर भी दोनों पक्षो का अपना अपना आग्रह रहा—अन्य-
तीथिको के शिष्य उन्हें दान दिए जाने के पक्षपाती रहे और बुद्ध के शिष्य बुद्ध-
प्रमुख भिक्षुसघ को। तब यह हुआ कि बहुमत देखा जाए। बहुमत लिए
जाने पर अधिक लोग यही कहने वाले हुए कि बुद्ध-प्रमुख भिक्षु-सघ को ही
दिया जाए। उन्हीं की बात स्थिर रही। अन्य-तीथिको के शिष्य बुद्ध को
दिए जाने वाले दान में बाधा नहीं डाल सके।
नगर के लोगो ने बुद्ध की प्रमुखता में भिक्षुसघ को निमन्त्रित कर महा-
दान दिया और सातवें दिन सब वस्तुओ का दान किया।
शास्ता अनुमोदन कर जनता को मार्ग तथा फल का बोध करा जेतवन
विहार में चले गए। वहाँ भिक्षुसघ द्वारा आदर प्रदर्शित किए जाने पर गन्ध-
कुटी के सामने खडे हो उपदेश दे गन्धकुटी में प्रवेश किया।
शाम को धर्मसभा में एकत्रित हुए भिक्षुओ ने बातचीत चलाई—
आयुष् मानो! दूसरे तीर्थिक श्रावको ने बुद्ध को मिलने वाले दान में विघ्न डालने
की कोशिश की, किन्तु वे सफल नही हुए। सभी वस्तुओ का दान बुद्धो के
ही चरणो पर आ पहुँचा। ओह ! बुद्धो की महानता !

  • शास्ता ने आकर पूछा—भिक्षुओ, इस समय बैठे क्या बातचीत कर रहे
    हो ? 'अमुक बातचीत' कहने पर शास्ता ने कहा—'भिक्षुओ, यह दूसरे मतो
    के अनुयाई न केवल अभी मुझे मिलने वाले दान में विघ्न डालने का प्रयत्न
    करते हैं, पहले भी किया है। लेकिन दान की वह वस्तुएं हमेशा मेरे ही चरणों
    में आ जाती रही हैं'—इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही—

१६४ [ २.२.१६३
सोने की ध्वजाओं के साथ सुनहरी जालों से ढक कर खड़ा किया गया । राजा-
ङ्गण अलङ्कृत हुआ । ब्राह्मण लोग प्रसन्नचित्त सजधज कर खड़े थे कि
हम हस्ती-मङ्गल वरेंगे, हम करेंगे । सुसीम राजा भी गहने और भाण्डे लिवा
जाकर मङ्गल-स्थान पर खड़ा हुआ ।
बोधिसत्त्व ने भी एक कुमार के लिए जिस ढंग से अलङ्कृत होना उचित
है, उस तरह अलङ्कृत हो, अपनी परिषद का नेता बन राजा के पास जाकर
पूछा—"महाराज ! क्या आपने सचमुच ऐसी बात कही है कि हमारे यश
को नाश करके, दूसरे ब्राह्मणों से हस्ती-मङ्गल करवा, हाथियों के अलङ्कार
तथा दूसरे सामान उनको देंगे ?" इतना कह, पहली गाथा कही—
काळा मिगा सेतदन्ता तव इमे
परोसतं हेमजालाभिसञ्छन्ना
ते ते ददामीति सुसीम ! ब्रूसि
अनुस्सरं पेत्तिपितामहानं ॥
[ सुसीम ! क्या तुम अपने और हमारे पूर्वजों को याद करके भी यह
कहते हो कि सोने के जाल से ढके हुए सौ से अधिक काले हाथी, जिनके दांत
सफ़ेद हैं, तुमको देंगे, तुमको देंगे ? ]
ते ते ददामीति सुसीम ! ब्रूसि, वंह यह अथवा तुम्हारे पास के, काळा
मिगा सेत दन्ता, ऐसे नाम वाले सौ से अधिक सब अलङ्कारों से सजे हाथी दूसरे
ब्राह्मणों को देता हूँ, हे सुसीम ! क्या तू यह सचमुच कहता है । अनुस्सरं
पेत्ति पितामहानं, हमारे और अपने यश के पिता-पितामह आदि को याद करते
हुए । महाराज ! सात पीढ़ियों से हमारे पिता-पितामह हस्ती-मङ्गल करते
रहे हैं । सो आप इसे याद करके भी क्या सचमुच हमारे और अपने वंश (के
सम्बन्ध) को नष्ट करके ऐसा कहते हैं ?
सुसीम ने बोधिसत्त्व की बात सुन दूसरी गाथा कही—
काळा मिगा सेतदन्ता मम इमे
परोसतं हेमजालाभि सञ्छन्ना

सुसीम ] १६५
ते ते वदामीति वदामि माणव ।
अनुस्सरं पेत्तिपितामहानं ॥
[ माणव ! हाँ अपने और तुम्हारे पूर्वजों को याद करके भी यह कहता
हूँ कि यह अपने स्वर्ण-जाल से ढके हुए सौ से अधिक हाथी, जिनके सफेद दाँत
हैं, तुमको देता हूँ । ]
ते ते वदामि, ये यह हाथी दूसरे ब्राह्मणों को देता हूँ । माणव ! यह मैं
सत्य ही कहता हूँ । अथवा तेरे हाथी ब्राह्मणों को देता हूँ, यह भी अर्थ है ।
अनुस्सर, पिता पितामह की कृति भी याद है, नहीं याद है सो नहीं । हमारे
पिता पितामह के हस्ती मङ्गल को तुम्हारे पिता पितामह करते थे, इसे याद
करता हुआ भी यह कहता हूँ ।
बोधिसत्त्व ने कहा—"महाराज ! हमारे और अपने यश को याद रखते
हुए आप क्यों मुझे छोड़ दूसरो से हस्ती मङ्गल करवाते हैं ?"
"तात ! मुझे कहा गया है कि तू तीन वेद और हस्ती-सूत्र नहीं जानता
है । इसीलिए मैं दूसरे ब्राह्मणो से करवाता हूँ ।
बोधिसत्त्व सिंह की तरह गरज कर बोला—"तो महाराज ! इतन
ब्राह्मणो म जो एक भी ब्राह्मण मेरे साथ तीनो वेद तथा हस्ती-सूत्र का कुछ
हिस्सा भी कह सकता हो, वह उठे । तीन वेदो और हस्ती-सूत्र के साथ हस्ती-
मङ्गल करनेवाला मुझे छोड कोई दूसरा सारे जम्बूद्वीप में नहीं।"
एक ब्राह्मण भी प्रतिपक्षी बनकर खड़ा नहीं हो सका । बोधिसत्त्व ने
अपने कुल-वश को प्रतिष्ठित कर हस्ती-मङ्गल किया और बहुत धन ले अपने
घर गए ।
शास्ता ने यह धर्म-देशना ला आर्य (सत्यों) को प्रकाशित कर जातक का
मेल बैठाया । कोई श्रोतापन्न हुए। कोई सकृदागामी, कोई अनागामी और
कोई अर्हत् ।
तब माँ महामाया थी । पिता शुद्धोदन महाराज थे । सुसीम राजा आनन्द
था । चारो दिशाओ में प्रसिद्ध आचार्य्य सारिपुत्र था । माणव ता मैं ही था ।