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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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पुण्णनदी ] ३४७
मैं उस समय में ज्येष्ठ ऋषि था।
राजा ने तथागत के भोजन करके चले जाने पर आदमियों को भेज कर
तैर्थिकों का आश्रम विध्वंस करा दिया। तैर्थिक अप्रतिष्ठित हो गए।
२१४. पुण्णनदी जातक
"पुण्णं नदि...." यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय प्रज्ञा
पारमिता के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
एक दिन धर्मसभा में भिक्षुओं ने तथागत की प्रज्ञा के बारे में बातचीत
चलाई—आयुष्मन्तो ! सम्यक् सम्बुद्ध महाप्रज्ञा हैं, विस्तृतप्रज्ञा हैं, प्रसन्न-
प्रज्ञा हैं, क्षिप्र-प्रज्ञा हैं, तीक्ष्ण प्रज्ञा हैं, उनकी प्रज्ञा बींधने वाली है, वे उपाय-
कुशल हैं। शास्ता ने आकर पूछा—भिक्षुओ ! यहाँ बैठे क्या बातचीत कर
रहे हो ? 'अमुक बातचीत' कहने पर 'भिक्षुओ, तथागत केवल अभी प्रज्ञावान्
तथा उपायकुशल नहीं हैं, पहले भी थे' कह पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व काल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
पुरोहित-कुल में पैदा हुए। बड़े होने पर तक्षशिला जा सब शिल्प सीख पिता
के मरने पर पुरोहित का पद पा राजा के अर्थधर्मानुशासक हुए।
आगे चलकर राजा ने चुगली करने वालों की बात का विश्वास कर
क्रोधित हो बोधिसत्त्व को 'मेरे पास मत रह' कह निकाल दिया। बोधिसत्त्व
स्त्री-बच्चों को ले काशी के एक गामड़े में रहने लगे। फिर राजा को बोधि-