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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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सेग्गु ] ३५५
क. वर्तमान कथा
यह कथा पहले परिच्छेद में आ ही चुकी है।१ इस कथा में शास्ता ने
पूछा—उपासक ! क्यो देर करके आया है ?
"भन्ते ! मेरी लडकी सदैव हँसमुख रहती थी। मैने उसकी परीक्षा कर
उसे एक तरुण को दिया।" सो यह करने से आपके दर्शन के लिए आने का
समय नहीं मिला।"
"उपासक ! वह अब ही सदाचारिणी नही है। पहले भी सदाचारिणी
थी। तूने न केवल अभी उसकी परीक्षा की है, पहले भी की ही थी।"
इतना कह उसके प्रार्थना करने पर पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्वं काल में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
वृक्ष-देवता हुए। उस समय उसी तरकारी बेचने वाले उपासक ने लडकी की
'परीक्षा करने के लिए' उसे जगल में ले जा काम-भोग चाहने वाले की
तरह उसे हाथ से पकडा। वह रोने लगी। उसे यह पहली गाथा कही—
सब्बो लोको अत्तमना अहॉसि,
अकोविदा गामधम्मस्स सेग्गु ॥
कोमारि कोनाम तवज्ज धम्मो,
य त्व गहिता पवने परोदसि ॥
[ सारा लोक (इससे) आनन्दित (होता) है। सेग्गु तू इस ग्राम्य-धर्म
से अपरिचित है। कुमारी ! यह तेरा क्या धर्म है कि तू बन मे पकडने पर
रोती है। ]
सव्यो लोको अत्तमना अहॉसि, धम्म ! सारे प्राणी इस कामभोग के
१ पण्णिक जातक (१०२)