जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय भी
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न खा पाएगा। अथवा हमारे साथ तुम्हारा रहना बन्द हुआ; अब हम तेरे
साथ न बसेंगे। शेष पहले ही की तरह से है।
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शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय भी
शृगाल यही भिक्षु था। चूहों का राजा तो मैं ही था।
१३०. कोसिय जातक
"यथाधाचाव भुञ्जस्सु..." यह (गाथा) शास्ता ने जेतवन में विहार
करते समय श्रावस्ती-निवासी एक स्त्री के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
वह एक श्रद्धालु ब्राह्मण उपासक की ब्राह्मणी थी; बहुत दुश्चरित्र, पापिन।
रात को दुराचार करती। दिन में कुछ न कर रोग का बहाना बना बड़बड़ाती
हुई लेट रहती।
वह ब्राह्मण उससे पूछता—"भद्रे ! तुझे क्या कष्ट है?"
"मुझे वायु बींधती है।"
"तो तुझे क्या क्या चाहिए?"
"चिकने, मीठे, अच्छे, स्वादिष्ट यागु-भात-तेल आदि।"
जो जो वह इच्छा करती, ब्राह्मण ला लाकर देता। दास की तरह सब
काम करता। लेकिन वह ब्राह्मण के घर आने के समय लेट रहती, बाहर जाने
के समय जारों के साथ गुजारती। ब्राह्मण सोचता कि इसके शरीर में
चुभनेवाली वायु का अन्त ही होता दिखाई नहीं देता।
एक दिन वह गन्ध माला आदि से जेतवन जा शास्ता की वन्दना तथा पूजा
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पर एक ओर बैठा। शास्ता ने पूछा- "क्यों ब्राह्मण दिखाई नहीं देता ?"
"भन्ते ! मेरी ब्राह्मणी के शरीर को वायु बीधती है। सो मैं उसके लिए
घी-तेल तथा अच्छे अच्छे भोजन योजता हूँ। उसका शरीर मोटा गया है।
चमड़ी निखर आई है। लेकिन वात-रोग का अन्त होता नहीं दिखाई देता।
मैं उसकी सेवा में ही लगा रहता हूँ। इसी लिए यहाँ आने का अवकाश नहीं
मिलता।"
शास्ता ने ब्राह्मणी के दुश्चरित्र होने की बात जान कहा- "ब्राह्मण !
इस प्रकार पड़ी हुई स्त्री के रोग के न शान्त होने पर पूर्व-जन्म में भी तुझे
बुद्धिमानो ने बताया था कि यह यह ओषधि करनी चाहिए, लेकिन यह पूर्व-जन्म
की बात होने के कारण तू उस पर ध्यान नहीं देता।" -
उस ब्राह्मण के पूछने पर शास्ता ने पूर्व जन्म की बात कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्व
ब्राह्मणो के एक बड़े कुल में पैदा हुए। सयाने होने पर तक्षशिला जा, यहाँ
सब विद्याएँ सीख लौटकर बनारस में प्रसिद्ध आचार्य्य हुए। एक सौ राज-
धानियो के क्षत्रिय ब्राह्मण कुमार प्रायः उसी के पास विद्याएँ सीखने ।
एक जनपदवासी ब्राह्मण ने बोधिसत्त्व से तीनो वेद और अट्ठारह विद्याएँ
सीखीं। वह वाराणसी में ही बस कर प्रतिदिन दो तीन बार बोधिसत्व के पास
आता। उसकी ब्राह्मणी दुश्चरित्र थी, पापिन थी। शेष सारी कथा वर्तमान
कथा ही की तरह है। हाँ, बोधिसत्व ने यह सुन कि 'इस कारण से उपदेश
सुनने आने का समय नहीं मिलता' और यह समझकर कि वह लडकी उसे धोखा
देकर लेट रहती है, उसके अनुकूल औषधि बताने का विचार कर कहा—
"तात ! अब से तू उसे दूध, घी, रस आदि मत दे। गोमूत्र में त्रिफला
आदि और पांच प्रकार के पत्ते रगड़कर उनका काढ़ा बनाकर ओषधि में ताँबे की
गन्ध आने तक ताँबे के नए वर्तन में रख रस्सी, जोत या किसी वृक्ष की ही लता
ले उसे जाकर कहना—यह तेरे रोग के लिए उचित दवाई है। या तो इसे पी;
नही तो जो भोजन तू करती है उसके अनुसार काम कर। और यह गाथा भी
कहना। यदि दवाई न पीए तो उसे रस्सी से या जोत से अथवा लता से कुछ
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प्रहार लगाकर, केसो से पकड़कर, खींचकर कोहनी से पीटना। उसी समय
उठकर वह काम करने लगेगी।" .
उसने 'अच्छा' कह स्वीकार कर कथनानुसार ओषधि बना कहा—भद्रे !
यह ओषधि पी।'
“यह ओषधि तुझे किसने कही ?”
“आचार्य ने, भद्रे !”
“इसे ले जाओ, नहीं पीऊँगी।”
ब्राह्मण ने कहा, तू स्वेच्छा से नहीं पीएगी। रस्सी लेकर बोला, या तो
रोग के अनुसार दवाई पी अथवा यवागु-भात के अनुसार काम कर।
इतना कह यह गाथा कही—
यथावाचाय भुञ्जस्सु यथाभुतञ्च व्याहर,
उभयं ते न समेति वाचा भुतञ्च कोसिये ॥
[ जैसे कहती है, वैसे दवाई पी, अथवा जैसे खाती है वैसे काम कर,।
कोसिये ! तेरी वाणी और तेरे भोजन का मेल नहीं बैठता ।]