जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
क. वर्तमान कथा
सेग्गु ] ३५५
क. वर्तमान कथा
यह कथा पहले परिच्छेद में आ ही चुकी है।१ इस कथा में शास्ता ने
पूछा—उपासक ! क्यो देर करके आया है ?
"भन्ते ! मेरी लडकी सदैव हँसमुख रहती थी। मैने उसकी परीक्षा कर
उसे एक तरुण को दिया।" सो यह करने से आपके दर्शन के लिए आने का
समय नहीं मिला।"
"उपासक ! वह अब ही सदाचारिणी नही है। पहले भी सदाचारिणी
थी। तूने न केवल अभी उसकी परीक्षा की है, पहले भी की ही थी।"
इतना कह उसके प्रार्थना करने पर पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्वं काल में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
वृक्ष-देवता हुए। उस समय उसी तरकारी बेचने वाले उपासक ने लडकी की
'परीक्षा करने के लिए' उसे जगल में ले जा काम-भोग चाहने वाले की
तरह उसे हाथ से पकडा। वह रोने लगी। उसे यह पहली गाथा कही—
सब्बो लोको अत्तमना अहॉसि,
अकोविदा गामधम्मस्स सेग्गु ॥
कोमारि कोनाम तवज्ज धम्मो,
य त्व गहिता पवने परोदसि ॥
[ सारा लोक (इससे) आनन्दित (होता) है। सेग्गु तू इस ग्राम्य-धर्म
से अपरिचित है। कुमारी ! यह तेरा क्या धर्म है कि तू बन मे पकडने पर
रोती है। ]
सव्यो लोको अत्तमना अहॉसि, धम्म ! सारे प्राणी इस कामभोग के
१ पण्णिक जातक (१०२)
३५६ [ २७.२१७
सेवन से सन्तुष्ट (होते) हैं। अकोविदो गामधम्मस्स सेग्गु, सेग्गु, उसका नाम
है। सो धम्म सेग्गु । तू इस ग्राम्य धर्म में, इस चाण्डाल-कर्म में दक्ष नही है।
कोमारि को नाम सवज्ज धम्मो, धम्म कुमारी । यह आज तेरा क्या स्वभाव
है ? य त्व गहिता पवने परोदसि, जो तू मेरे द्वारा इस वन में कामभोग के लिए
पकड़ी जाने पर रोती है। स्वीकार नहीं करती। यह तेरा क्या स्वभाव है ?
क्या तू कुमारी ही है ? —पूछता है।
इसे सुन कुमारी ने कहा—हाँ तात ! मैं कुमारी ही हूँ। मैं मैथुन धर्म को
नहीं जानती हूँ। ऐसा कह, रोती हुई दूसरी गाथा बोली—
यो दुक्खफुट्ठाय भवेय्य ताणं,
सो मे पिता दूभि वने करोति ॥
सर कस्स कन्दामि वनस्स मज्झे,
यो तायिता सो सहसा करोति ॥
अर्थ उपरोक्त प्रकार¹ से ही है।
तब वह तरकारी बेचने वाला उस लड़की की परीक्षा कर, घर ले जा,
तरुण को दे यथा-कर्म सिधारा।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला सत्यों का प्रकाशन कर जातक का मेल बैठाया।
सत्यों का प्रकाशन समाप्त होने पर तरकारी बेचने वाला श्रोतापत्ति फल में
प्रतिष्ठित हुआ।
उस समय लड़की (अब की) लड़की ही थी। पिता पिता ही हुआ।
उस बात को प्रत्यक्ष करने वाला वृक्ष देवता मैं ही था।
¹पण्णिक जातक (१०२)