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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय ज्येष्ठ

८८ [ १.१४.१३६

आभस्सरूपगो, वह मनुष्य वैसा अभ्यास करने से द्वितीय-ध्यान को प्राप्त हो
आभस्वर-ब्रह्मलोक को प्राप्त होना ही है।
इस प्रकार बोधिसत्त्व तपस्वियों को समझाकर तथा ज्येष्ठ शिष्य की प्रशंसा
कर ब्रह्मलोक गए।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय ज्येष्ठ
शिष्य सारिपुत्र थे और महाब्रह्मा तो मै ही था।
१३६. सुवण्णहंस जातक
"यं लद्धं तेन तुट्ठब्ब...", यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय
थुल्ल नन्दा भिक्षुणी के बारे में कही—
क. वर्तमान कथा
श्रावस्ती में एक उपासक ने भिक्षुणी संघ को लहसुन लेने का निमन्त्रण दिया
और अपने खेत वाले को आज्ञा दी कि यदि भिक्षुणियां आएँ तो एक एक भिक्षुणी
को दो तीन गांठ लहसुन दे। उसके बाद से भिक्षुणियां उसके घर भी और खेत
पर भी लहसुन के लिए जाने लगीं।
एक उत्सव के दिन उस (उपासक) के घर में लहसुन समाप्त हो गया।
थुल्लनन्दा भिक्षुणी औरों को साथ ले घर गई और बोली—आयुष्मानो, लहसुन
की आवश्यकता है।
—आर्ये, लहसुन नहीं हैं। लाया हुआ समाप्त हो गया। खेत पर जाएँ।
वह खेत पर गई और बेअन्दाज लहसुन लिवा लाई।
खेत वाला खीझा—यह क्या है कि भिक्षुणियां अन्दाज न कर बे अंदाज
लहसुन ले जाती हैं।

सुवण्णहंस ] ८६
उसे यह कहता सुन जो अप्पेच्छ भिक्षुणियां थी वह असन्तुष्ट हुई और उनमें
सुनकर भिक्षु भी असन्तुष्ट हुए। उन्होंने खीझकर भगवान् से यह बात कही।
भगवान् ने थुल्लनन्दा भिक्षुणी की निन्दा कर कहा—
“भिक्षुओ, लालची (=महेच्छ) आदमी जिस मां ने जन्म दिया है,
उसके लिए भी अप्रिय हो जाता है। वह अप्रसन्न को प्रसन्न नहीं कर सकता।
प्रसन्नो को अधिक प्रसन्न नहीं कर सकता। अप्राप्त वस्तु को प्राप्त नहीं कर
सकता। प्राप्त वस्तु को सँभाल कर नहीं रख सकता। अप्पेच्छ आदमी
अप्रसन्नो को प्रसन्न कर सकता है। प्रसन्न को अधिक प्रसन्न कर सकता है।
अप्राप्त वस्तु को प्राप्त कर सकता है। प्राप्त वस्तु को बनाए रख सकता है।”
—इस प्रकार भिक्षुओं को उनके योग्य उपदेश दे फिर कहा 'भिक्षुओ, थुल्ल
नन्दा अभी लोभी नहीं है, पहले भी लोभी ही रही है।' इतना कह पूर्व-जन्म
की कथा कही—

ख. अतीत कथा

पूर्व समय मे बाराणसी मे ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
एक ब्राह्मण कुल में पैदा हुए। उनके बड़े होने पर उनके समान जाति-कुल से
उन्हे एक भार्या ला दी गई। उससे उसे नन्दा, नन्दवती और नन्दसुन्दरी
तीन लड़कियाँ हुईं। उनका विवाह होने से पूर्व ही बोधिसत्त्व मर कर स्वर्ण-
हंस होकर पैदा हुए। उन्हें पूर्व-जन्म-स्मृति का ज्ञान भी रहा।
उसने बड़े होने पर सोने के परो से ढके हुए परम सौभाग्यवान् अपने शरीर
को देखकर विचार किया कि मै कहाँ से मरकर यहाँ पैदा हुआ हूँ? उसे मालूम
हुआ कि मनुष्य-लोक से। फिर विचार किया कि ब्राह्मणी और लडकियो
का जीवन-यापन कैसे होता है ? उसे पता लगा कि दूसरो की मजदूरी करके
बड़े कष्ट से जीवन-यापन करती है। तब उसने सोचा कि मेरे सोने के पर ठोस१
हैं। इनमें से में एक एक पर उन्हे दू। इस से मेरी भार्या और लड़कियाँ
सुखपूर्वक जीएँगी।” वह यहाँ पहुँच घर के शहतीर के एक सिरे पर बैठ।
———
१कूटे और रगडे जा सकते हैं।

६० [ १४।१३६

ब्राह्मणी और लड़कियों ने बोधिसत्व को देखकर पूछा—स्वामी, कहाँ
से आए ?
"मैं तुम्हारा पिता हूँ। मरकर स्वर्ण हंस होकर पैदा हुआ हूँ। तुम्हें
देखने के लिए आया हूँ। इसके बाद तुम्हे दूसरो की मजदूरी करते हुए कष्ट-
पूर्वक जीवन-यापन करने की जरूरत नही है। में तुम्हें अपना एक एक पर दिया
करूँगा। उसे बेच-वेच कर सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करना।"
इतना कह वह एक पर देकर उड़ गया। इसी प्रकार वह बीच बीच में
आकर एक एक पर देता। ब्राह्मणियाँ धनी और सुखी हो गईं।
एक दिन उस ब्राह्मणी ने लडकियो से बुलाकर सलाह की—'अम्म !
जानवरो के दिल का पता नही। हो सकता है कि कभी तुम्हारा पिता न आए।
इसलिए उसके इस बार आने पर हम उसके सभी पर उखाड लें।'
उन्होने अस्वीकार किया। वे बोली—इस प्रकार हमारे पिता को कष्ट
होगा।
ब्राह्मणी ने लालची होने के कारण फिर एक दिन स्वर्ण-राजहंस के आने
पर कहा—स्वामी आएँ।
जब उसने देखा कि यह उसके पास आ गया है, तो दोनो हाथो से पकड़कर
उसके सब पर नोच लिए। सभी पर बोधिसत्त्व की इच्छा के बिना जबर्दस्ती
लिए जाने के कारण बगले के पर सदृश हो गए।
अब बोधिसत्त्व पक्ष पसारकर उड़ न सके। उसने उन्हें मटके में रखकर
पाला। उनके जो नए पर निकले वह श्वेत ही निकले। पक्ष निकलने पर
वह उड़कर अपने स्थान पर चले गए, और फिर वहाँ नही गए।
शास्ता ने पूर्व-जन्म की बात सुनाकर कहा—भिक्षुओ, थुल्लनन्दा अभी
लालची नही रही है। पहले भी लालची रही है। लालच के ही कारण स्वर्ण
से हाथ धोया। अब अपने लालच के कारण लहसुन से भी हाथ धोएगी।
इसके बाद अब लहसुन खाना न मिलेगा। जैसे थुल्लनन्दा को वैसे ही उसके
कारण दूसरी भिक्षुणियों को भी। इस लिए बहुत मिलने पर भी अपना
। जानना चाहिए। थोडा मिलने पर जितना मिले उसी से सन्तोष
ना चाहिए। अधिक की इच्छा नही करनी चाहिए।
इतना कह यह गाथा कही—

बब्बु ] ६१
य लद्ध तेन तुट्ठव्व अतिलोभो हि पापको,
हंसराज गहेत्वान सुवण्णा परिहायथ ॥
[ जो मिले उससे संतुष्ट रहना चाहिए। अतिलोभ करना पाप है।
हंसराज को पकड़कर स्वर्ण से हाथ धोया । ]
तुट्ठव्वं का मतलब है संतोष करना चाहिए।
इतना कह शास्ता ने अनेक प्रकार से निन्दा कर नियम बना दिया कि
जो भिक्षुणी लहसुन खाए उसे पाचित्तिय (-दोष) लगे ।¹
फिर जातक का मेल बैठाया। उस समय की ब्राह्मणी यह थुल्लनन्दा
हुई। तीन लड़कियाँ इस समय की तीन बहनें। स्वर्ण-राजहंस तो मैं ही था।
१३७. बब्बु जातक
“प्रत्येको लभते बब्बु...”, शास्ता ने इसे जेतवन में विहार करते समय
काणमाता के शिक्षा-पद² के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
श्रावस्ती में अपनी कानी लड़की के कारण काण माता कहलाने वाली
एक श्रोतापन्न आर्य-श्राविका थी। उसने अपनी कानी लड़की को एक गामड़े
¹ भिक्खुणी-पातिमोक्ख ।
² पाचित्तिय के भोजन-वर्ग का चौथा शिक्षापद ।

६२ [ १.१४.१३७
में समान जाति के किसी आदमी को दिया। काणा किसी काम से माँ के घर
आई।
कुछ दिन बीतने पर उसके स्वामी ने दूत भेजा—मैं चाहता हूँ कि काणा
आये। काणा चली आवे।
काणा ने दूत की बात सुन, माँ से पूछा—माँ ! जाती हूँ।
काण-माता ने सोचा कि इतने दिन रहकर खाली हाथ कैसे जाएगी, इस
लिए पुए पकाने लगी।
उस समय एक पिण्डपातिक¹ भिक्षु उसके घर आया। उपासिका ने उसे
बिठाकर पात्रभर पुए दिलवाए। उसने निकल दूसरे (भिक्षु) से कहा। उसे भी
वैसे दिलवाए। उसने भी निकलकर दूसरे से कहा। उसे भी वैसे ही।
इस प्रकार चार जनों को पुए दिलवाए। सब तैयार पुए समाप्त हो गए।
काणा का जाना नहीं हुआ।
उसके स्वामी ने दूसरा दूत भेजा और दूसरे के बाद तीसरा भेजा। तीसरे
दूत के हाथ उसने कहला भेजा कि यदि काणा नहीं आएगी तो में दूसरी भार्या
ले आऊँगा। तीनों बार उसी तरह जाना न हो सका। काणा का स्वामी दूसरी
स्त्री ले आया। काणा ने जब यह सुना तो रोने लगी।
शास्ता को पता लगा तो पहन कर पात्र-चीवर ले काण-माता के घर जा
बिछे आसन पर बैठकर पूछा—
“यह क्यो रोती है ?”
“इस कारण से ।”
शास्ता ने धर्मकथा कह काण-माता को दिलासा दिया। फिर उठकर
विहार को गए।
उन चार भिक्षुओं को तीन बार तैयार पुए ले आकर काणा के गमन में
बाधक होने की बात भिक्षुसंघ में प्रकट हो गई।
एक दिन भिक्षुओं ने धर्मसभा में बातचीत चलाई—आयुष्मानो ! चार
¹जो भिक्षु केवल भिक्षा से ही निर्वाह करता है, निमन्त्रण आदि ग्रहण
नहीं करता।