सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

१७६. सतधम्म जातक

सत्यम्म ] २३७
य१ मेल बैठाया। सत्यों का प्रकाशन समाप्त होने पर वह कुल-पुत्र
स्रोतापत्ति फल में प्रतिष्ठित हुआ।
उस समय काश्यप आनन्द था। कुम्हार तो मैं ही था।
१७६. सतधम्म जातक
“तञ्च अप्प...” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय इक्कीस
तरह की अनुचित जीविका के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
एक समय भिक्षु इक्कीस तरह के ऐसे कर्मों से जीविका चलाते थे जैसे
वैद्यक, दूत बनकर जाना, सन्देस लेकर जाना, पैदल दौड कर (सन्देस ले)
जाना, भिक्षा (=पिण्ड) के बदले में भिक्षा लेना आदि।
शास्ता ने उन भिक्षुओं का उस उस तरह जीविका चलाना जान सोचा—
'इस समय भिक्षु अनुचित ढंग से जीविका चलाते हैं। इस प्रकार से जीविका
चलाने से वे यक्ष-योनि से वा प्रेत-योनि से मुक्त न होंगे। जुए के बैल होकर
पैदा होंगे। नरक में जन्म ग्रहण करेंगे। इनके हित के लिए, सुख के लिए
अपने विचारानुकूल तथा प्रतिभा के अनुसार एक धर्मोपदेश देना चाहिए।”
तब भगवान् ने भिक्षुओं को इकट्ठा करवा उपदेश दिया—"भिक्षुओ !
इक्कीस तरह के अनुचित तरीकों से जीविका नहीं चलानी चाहिए। अनुचित
तरीकों से जो भिक्षा मिलती है, वह लोहे के तप्त गोले के समान है, हलाहल
विष की तरह है। अनुचित तरीकों से जीविका चलाने की बुद्ध, प्रत्येक-बुद्ध
तथा श्रावकों सभी ने निन्दा की है, निकृष्ट बताया है। अनुचित तरीकों से
जिस भिक्षा की प्राप्ति होती है, उसे खाने वाले के मुंह पर मुस्कराहट नहीं आ