जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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काट। में जाकर ऐसा करूँगा जिसमे वह आने न पाएँ। इस प्रकार हम दोनो
के प्रयत्न से हमारे मित्र की जान बचेगी।
इस बात को प्रकट करते हुए यह गाथा कही—
इदं वढमयं पासं छिन्द दन्तेहि कच्छप
अहं तया करिस्सामि यथा नेहिति लुद्दको ॥
[देख कछुए ! तू दांतो से चमडे के जाल को काट। मैं ऐसा करूँगा जिससे
शिकारी आने न पावे ।]
कछुए ने चमडे की डोरी खानी शुरू की। कठफोडा शिकारी के घर गया।
शिकारी प्रात काल ही शक्ति लेकर निकला। पक्षी ने यह जान कि वह घर
से निकल रहा हूँ आवाज कर, परो को फडफडा कर आगे के द्वार से निकलते
हुए उसके मुंह पर चोट की। शिकारी ने सोचा—मनहूस पक्षी ने मुझ पर
प्रहार किया।
वह रुका, थोडी देर लेट फिर शक्ति लेकर उठा। 'पहले यह आगे के
द्वार से निकला, अब पीछे के द्वार से निकलेगा' सोच पक्षी जाकर घर के पीछे
की ओर बैठा। शिकारी ने भी यह सोचा—आगे के द्वार से निकलते समय
मैने मनहूस पक्षी देखा अब पिछले द्वार से निकलूंगा। वह पीछे के द्वार से
निकला। पक्षी ने फिर जाकर आवाज लगा मुंह पर चोट की। शिकारी ने
कहा—फिर मुझ पर मनहूस पक्षी ने चोट की। यह मुझे निकलने नही देता।
वह रुका, अरुणोदय तक लेटा रहा; फिर अरुणोदय होने पर शक्ति लेकर
निकला।
पक्षी ने जल्दी से जाकर बोधिसत्त्व को सूचना दी कि शिकारी आ रहा है।
उस समय तक कछुए ने एक को छोड शेष सभी डोरियाँ काट डाली थी। उसके
दांत गिरने वाले हो गए थे, मुंह लोहू से लाल हो गया था। बोधिसत्त्व शिकारी
को शक्ति लिए बिजली की तेजी से आता देख बन्धन तोड वन में जा
घुसा। पक्षी वृक्ष-शाखा पर जा बैठा। कछुआ दुर्बलता के कारण वहीं पड़ा
रहा। शिकारी ने कछुए को एक थैली में डाल किसी ठूंट पर रख दिया।
बोधिसत्त्व ने मुड कर देखा तो पता लगा कि कछुआ पकड़ा गया। उसने
सोचा—मित्र की जान बचाऊँगा। तब उसने अपने आपको शिकारी को ऐसे
कुरुङ्गमिग ] ३२५
दिखाया जैसे बहुत दुर्बल हो गया हो। शिकारी ने सोचा—यह (घोर)
दुर्बल होगा; इसे मारूँगा। उसने शक्ति ले बोधिसत्त्व का पीछा किया।
बोधिसत्त्व न बहुत दूर, न बहुत नजदीक चलते हुए उसे ले जंगल में गए।
जब जाना कि दूर निकल आए तब मुड़ कर दूसरे रास्ते से हवा की तेजी से जा,
सींग से थैली उठा, जमीन पर गिरा, फाड़ कर कछुए को बाहर निकाला।
कठफोडा भी वृक्ष पर से उतरा। बोधिसत्त्व ने दोनो को उपदेश देते हुए कहा—
तुम्हारी सहायता से मेरे प्राण बचे। मैने भी तुम्हारे प्रति मित्र का कर्तव्य
पालन किया। अब वही शिकारी आकर तुम्हे पकड़ न ले, इसलिए मित्र कठ-
फोडे, तू अपने पुत्रो को ले दूसरी जगह चला जा, और मित्र कछुए तू पानी
में जा।
उन्होने वैसा किया। शास्ता ने बुद्ध होने पर दूसरी गाथा कही—
कच्छपो पाविसि वारिं कुरुङ्गो पाविसि वनं
सतपत्तो दुमग्गम्हा दूरे पुत्ते अपानयि ॥
[ कछुआ पानी में जा घुसा। कुरुङ्ग वन में चला गया। कठफोड़ा वृक्ष-
शाखा पर से अपने पुत्रो को दूर ले गया।]
अपानयि, अपनयि अर्थात् लेकर चला गया।
शिकारी वहाँ आ किसीको न देख फटी थैली ले दुःखी चित्त से अपने घर
गया। वे भी तीनो मित्र जीवन भर विश्वास बनाए रखकर यथाकर्म गए।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया।
उस समय शिकारी देवदत्त था। कठफोडा सारिपुत्र। कछुआ मोग्गल्लान।
कुरुङ्ग मृग तो मैं ही था।
२०७. अस्सक जातक
३२६ [ २.६.२०७
२०७. अस्सक जातक
“अयमसस्सकराजेन....” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय
पूर्व भार्य्या के प्रलोभन के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
शास्ता ने उस भिक्षु से पूछा—क्या तू सचमुच उत्कण्ठित है ?
“हाँ, सचमुच ।”
“किसने उत्कण्ठित किया ?”
“पूर्व-भार्य्या ने ।”
शास्ता ने कहा—भिक्षु, उस स्त्री का तेरे प्रति स्नेह नहीं है। पहले भी
तू उसके कारण महान् दुख भोग चुका है।
इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही।
ख. अतीत कथा
पूर्व काल में काशी राष्ट्र के पोतली¹ नाम के नगर में अस्सक नामक
राजा राज्य करता था। उसकी उब्बरी नाम की पटरानी थी। वह प्रिया थी,
मनोज्ञ थी, सुन्दर थी, दर्शनीय थी और थी मानुषिक और दिव्य-वर्ण के बीच
के वर्ण की। यह मर गई। उसकी मृत्यु से राजा शोकाभिभूत हुआ। उसे
दुख हुआ और वह दौर्मनस्य को प्राप्त हुआ। उसने रानी का शरीर द्रोणी में,
तेल की काई में रखवा उसे अपनी चारपाई के नीचे रखवाया। फिर स्वयं
बिना कुछ खाए पीए रोता पीटता हुआ चारपाई पर पड रहा।
¹ ‘पोतल’ भी पाठ है।
अरुसक ] ३२७
माता-पिता, अन्य नातेदार, मित्र अमात्य तथा ब्राह्मण गृहपति आदि
“महाराज ! सस्कार अनित्य है . ” कहते हुए उसे होश में न ला सके।
उसके रोते पीटते ही सात दिन बीत गए।
उस समय पाँच अभिज्ञा तथा आठ समापत्तियो के लाभी, तपस्वी होकर
हिमवन्त प्रदेश में विचरते हुए बोधिसत्त्व ने प्रकाश फैला दिव्य चक्षु से जम्बु
द्वीप को देखते हुए उस राजा को उस प्रकार रोते देखा। 'मुझे इसकी सहायता
करनी चाहिए' सोच ऋद्विबल से आकाश में उड राजा के बाग में उतर मङ्गल
शिला-पट पर सोने की प्रतिमा की तरह बैठे।
पोतली नगर वासी एक ब्राह्मण-माणवक उद्यान में जा बोधिसत्त्व को देख
प्रणाम करके बैठा।
बोधिसत्त्व ने उससे बातचीत कर पूछा—माणवक ! क्या राजा धार्मिक
हैं ?
“भन्ते ! हाँ राजा धार्मिक हैं। लेकिन उसकी भार्या मर गई हैं। वह
उसके शरीर को द्रोणी मे रखवा रोता पीटता लेटा है। आज उसे सातवाँ दिन
हो गया। तुम राजा को इस प्रकार के दुख से क्यो मुक्त नही करते ? क्या
यह ठीक है कि तुम्हारे जैसे शीलवान् के रहते राजा इस प्रकार का दुख अनु-
भव करे ?”
'माणवक ! में राजा को नही जानता। लेकिन यदि वह आकर मुझे
पूछे तो मैं उसे उसकी भार्या का जन्म ग्रहण करने का स्थान बताकर, राजा
के सामने ही उससे बातचीत करवाऊँ।"
“भन्ते ! तो में जब तक राजा को लेकर आऊँ तब तक आप यही बैठें।"
माणवक ने बोधिसत्त्व से बचन ले राजा के पास जा यह बात सुनाकर
कहा—उस दिव्य-चक्षुधारी के पास चलना चाहिए।
राजा यह सोच कि उब्बरी को देख सकूँगा सन्तुष्ट हो रथ पर चढ वहाँ
गया। बोधिसत्त्व को प्रणाम कर उसने पूछा—क्या तुम सचमुच देवी के जन्म
ग्रहण करने की जगह जानते हो ?
“महाराज ! हाँ।”
“वह कहाँ पैदा हुई हैं ?”
“महाराज ! उसने रूप मे मत्त होने के कारण, प्रमादवश कोई अच्छा
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काम नहीं किया। इसलिए वह इसी उद्यान में गोबर के कीड़े की योनि
में पैदा हुई।"
“मैं विश्वास नहीं करता।”
“तो तुझे दिखा कर उससे कहलवाता हूँ।”
“अच्छा, कहलवाएँ।”
बोधिसत्त्व ने अपने प्रताप से ऐसा किया कि दो गोबर-पिण्ड लुढ़कते हुए
राजा के सामने आएँ। वे चले आए। बोधिसत्त्व ने उसे दिखाते हुए कहा—
महाराज ! यह तेरी उब्ब्री देवी तुझे छोड़ गोबर के कीड़े के पीछे पीछे आती
है। उसे देखें।
“भन्ते ! मैं विश्वास नहीं करता कि उम्बरी गोबर के कीड़े की योनि में
जन्म ग्रहण करेगी।”
“महाराज ! उससे कहलवाता हूँ।”
“भन्ते ! कहलवाएँ।”
बोधिसत्त्व ने अपने प्रताप से उसे बुलवाते हुए पूछा—उब्ब्री ! उसने
मानुषी वाणी में कहा—हाँ भन्ते ! क्या ?
“पूर्व-जन्म में तेरा क्या नाम था ?”
“भन्ते ! मैं अस्सक राजा की उब्ब्री नाम की पटरानी थी।”
“इस समय तुझे अस्सक राजा प्रिय हैं या गोबर का कीड़ा।”
“भन्ते ! वह मेरा पूर्व-जन्म था; उस समय मैं उसके साथ इस बाग़ में
रूप, शब्द, गन्ध, रस तथा स्पर्श का आनन्द लेती हुई विचरती थी। लेकिन
अब जब से मेरा नया जन्म हुआ है, वह मेरा क्या लगता है ? मैं अब अस्सक
राजा को मार कर उसकी गर्दन के खून से अपने स्वामी गोबर के कीड़े के पैरों
को धो सकती हूँ।”
यह कह परिषद् के बीच में आदमियों की भाषा में उसने यह गाथाएँ
कही—
अयमस्सकराजेन देसो विचरितो मया,
अनुकामनुकामेन पियेन पतिना सह ॥
नवेन, सुखदुक्खेन, पोरणं, अपिथीयति.,
तस्मा अस्सकरञ्ञाव कीटो पियतरो ममं ॥
अस्सक ] ३२६
[परस्पर एक दूसरे की कामना करते हुए अपने प्रिय पति इस अस्सक
राजा के साथ मैंने इस प्रदेश में विचरण किया। नए सुख दुःख से पुराना सुख
दुःख ढक जाता है। इसलिए अस्सक राजा की अपेक्षा यह कीड़ा ही मेरा
अधिक प्रिय है।]
अयमस्सकराजेन देसो विचरितो मया इस रमणीय उद्यान प्रदेश में पहले
मैंने अस्सक राजा के साथ विचरण किया। अनुकामयानुक़ामेन; अनु निपात
मात्र है। मैं उसकी कामना करती, वह मेरी कामना करता। इस प्रकार
परस्पर कामना करते हुए के साथ। पियेन उस जन्म में प्रिय।
नयेन सुखदुक्खेन पोराणं अपिधीयति, भन्ते ! नए सुख से पुराना सुख
नए दुःख से पुराना दुःख ढक जाता है। यही लोक-स्वभाव है—प्रगट करती
है। तस्मा अस्सकरञ्ञाय कीटो पियतरो मम; क्योंकि नवीन से पुराना ढक
जाता है इसलिए अस्सक राजा की अपेक्षा कीड़ा मुझे सौ गुणा प्रिय है।
इसे सुन अस्सक राजा को पश्चात्ताप हुआ। उसने वहाँ खड़े ही सड़े
लाश निकलवा सिर से स्नान कर बोधिसत्व को प्रणाम किया। फिर नगर
में प्रवेश कर दूसरी पटरानी बना धर्म से राज्य करने लगा।
बोधिसत्त्व भी राजा को उपदेश दे शोक-रहित कर हिमवन्त चले गए।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला सत्यों को प्रकाशित कर जातक का मेल
बैठाया। सत्यों के अन्त में उत्कण्ठित (भिक्षु) सोतापत्ति फल में प्रतिष्ठित
हुआ।
• उस समय उव्वरी पूर्व-भार्य्या थी। अस्सक राजा उत्कण्ठित भिक्षु था।
माणवक सारिपुत्र। तपस्वी तो मैं ही था। *
२०८. संसुमार जातक
३३० [ २.६.२०८
२०८. संसुमार जातक
“अलमेतेहि अम्हेहि,...” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय
देवदत्त के वध करने के प्रयत्न के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
उस समय शास्ता ने यह सुन कि देवदत्त वध के लिए प्रयत्न करता है,
कहा—भिक्षुओ, न केवल अभी देवदत्त मेरे वध करने का प्रयत्न करता है,
उसने पहले भी किया है, लेकिन त्रास मात्र भी पैदा नही कर सका।
इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही।
ख. अतीत कथा
पूर्व काल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करते समय बोधिसत्त्व हिमा-
लय प्रदेश में बन्दर की योनि में पैदा हुए। वह हाथी सदृश बल वाले, शक्ति-
सम्पन्न, महान् शरीर धारी, अति सुन्दर थे। गङ्गा के मोड़ पर जगल में
रहते थे।
उस समय गङ्गा में एक मगरमच्छ रहता था। उसकी भार्या ने बोधिसत्त्व
को देखा। उसके मन में उसका मांस खाने का दोहद उत्पन्न हुआ। उसने
मगरमच्छ से कहा—स्वामी १, इस कपिराज का कलेजा खाना चाहती हूँ।
“भद्रे १ हम जल-चर, वह स्थल-चर, क्या हम उसे पकड़ सकेंगे ?”
“जिस किसी भी तरह हो पकड़, यदि नही मिलेगा, मर जाऊँगी।”
“तो डर मत। एक उपाय है। मैं तुझे उसका कलेजा खिलाऊँगा।”
उसे आश्वासन दे मगरमच्छ, जिस समय बोधिसत्त्व गङ्गा का पानी पी,
गङ्गा-तट पर बैठा था, बोधिसत्त्व के पास गया और बोला—वानरराज !
संसुमार ] ३३१
यहां इन अस्वादिष्ट फलो को खाते हुए तू अभ्यस्त स्थान में ही चरता है ?
गङ्गा-पार आम, कटहल के मधुर फलो की सीमा नही । क्या तुम्हें गङ्गा-पार
जाकर फल-मूल नही खाने चाहिएँ ?
"मगरराज ! गङ्गा में पानी बहुत है। वह विस्तृत है। मैं उधर कैसे
जाऊँ ?"
"यदि चले तो मैं तुझे अपनी पीठ पर चढ़ा कर ले जाऊँगा।"
उसने उसका विश्वास कर 'अच्छा' कह स्वीकार किया। 'तो आ मेरी
पीठ पर चढ' कहने पर चढ गया। मगरमच्छ थोडी दूर जा उसे डुबाने लगा।
बोधिसत्त्व ने पूछा—दोस्त ! यह क्या ? मुझे पानी में डुबा रहा है।?
"मैं तुझे धर्म-भाव से नही ले जा रहा हूँ। मेरी भार्या के मन में तेरे
कलेजे के लिए दोहद उत्पन्न हुआ है। मैं उसे तेरा कलेजा खिलाना चाहता हूँ।"
"दोस्त ! तूने कह दिया सो अच्छा किया। यदि हमारे पेट में कलेजा
हो तो एक शाखा से दूसरी शाखा पर घूमते हुए चूर्ण विचूर्ण हो जाए।"
"तो तुम कहाँ रखते हो ?" "
बोधिसत्त्व ने पास ही पके फलो से लदा हुआ एक गूलर का पेड दिखाकर
कहा—देख, हमारे कलेजे इस गूलर के पेड पर लटकते है।
"यदि मुझे कलेजा दे, तो मैं तुझे नही मारूँगा।"
"तो आ मुझे वहाँ ले चल। मैं तुझे वृक्ष पर लटका हुआ दूँगा।"
वह उसे लेकर वहाँ गया। बोधिसत्त्व ने उसकी पीठ पर से छलांग मार
गूलर की शाखा पर बैठ कहा—सौम्य ! मूर्ख मगरमच्छ ! तूने यह मान लिया
कि इन प्राणियो का कलेजा वृक्ष की शाखाओ पर होता है। तू मूर्ख है। मैने
तुझे ठगा है। तेरे फल-मूल तेरे ही पास रहें। तेरा शरीर ही बड़ा है। अक्ल
नही है।
यह कह, इसी बात को प्रकट करते हुए यह गाथाएँ कही— :-
अलमेतेहि अम्बेहि जम्बूहि पनसेहि च,
यानि पार समुद्दस्स वर मय्ह उदुम्बरो ॥
महती वत ते बोन्दि न च पञ्ञाण तदुप्पिका,
सुसुमार वञ्चितो मेसि गच्छ दानि यथासुखं ॥
३३२ [ २.६.२०६
[यह जो तू समुद्र-पार आम, जामुन और कटहल बताता है, मुझे यह
नहीं चाहिए। मुझे गूलर ही अच्छा है। तेरा शरीर बड़ा है; लेकिन तेरी
प्रज्ञा उसके समान नहीं। मगरमच्छ ! तू मेरे द्वारा ठगा गया है। अब तू
सुखपूर्वक जा।]
———
अलमेतेहि, जो तूने द्वीप में देंगे, यह मुझे नही चाहिएँ। वरं महं उदुम्बरो
मुझे यह उदुम्बर वृक्ष ही अच्छा है। बोन्धि शरीर। तद्रूपिया, तेरी प्रज्ञा
तेरे शरीर के अनुकूल नहीं है। गच्छदानि यथासुखं, अब सुखपूर्वक जा, तेरे
(लिए) कलेजा नहीं है।
———
मगरमच्छ (जूए में) हजार हार जाने की तरह दुःखी, दौर्मनस्य को प्राप्त
हो चिन्ता करता हुआ अपने निवास-स्थान को चला गया।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय
मगरमच्छ देवदत्त था। मगरमच्छी चिञ्चामाणविका। कपिराज तो मैं
ही था।
२०६. कक्कर जातक
“दिट्ठा मया वने रुक्खा...."यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय
धर्मसेनापति सारिपुत्र स्थविर के शिष्य तरुण भिक्षु के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
वह अपने शरीर की रक्षा करने में होशियार था। शरीर के लिए सुखकर
न होगा, इस डर से किसी अति-शीत वा अति-उष्ण चीज का उपयोग न
थक्कर ] ३३३
करता था। सर्दी-गर्मी से शरीर को कष्ट होगा, इस डर से बाहर नही निक-
लता था। बहुत पक्का या जला भात नहीं खाता था। उसकी यह शरीर-
रक्षा की होशियारी सघ में प्रकट हो गई। धर्मसभा में भिक्षुओ ने बातचीत
चलाई—आयुष्मानो ! अमुक तरुण शरीर-रक्षा के काम में होशियार है।
शास्ता ने आकर पूछा—भिक्षुओ, बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ?
“यह बातचीत” कहने पर ‘भिक्षुओ ! यह तरुण अपने शरीर-रक्षा के काम में
न केवल अभी होशियार है, पहले भी होशियार था।’
इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व काल में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
जगल में वृक्ष-देवता हुए।
एक चिडीमार पालतू बटेर, वालो का फदा तथा लाठी से जगल में बटेरो
को फँसाता हुआ, भाग कर जगल में चले गए एक बटेर को फाँसने लगा।
यह चाल के फदे म होशियार होने के कारण फद में नही आता था। वह उठ
उठ कर छिप जाता।
शिकारी अपने आपको शाखा-पत्तो से ढक बार बार लकडी और फदा
लगाता। बटेर ने उसे लज्जित करने के लिए मानुषी भाषा बोलते हुए पहली
गाथा कही—
दिट्ठा मया वने रुक्खा अस्सकण्णविभीटका,
न तानि एव सक्कन्ति यथा त्वं रुक्ख सक्कसि ॥
[ मैने इस वन के अनेक अस्सकण्ण (अश्वकर्ण) और विभीटका (विभीतक)
वृक्ष देखे, लेकिन तू वृक्ष जिस तरह से इधर उधर चलता है, वह नही चलते । ]
मित्र शिकारी मया इस वने पैदा हुए बहुत से अस्सकण्ण तथा विभीटक
खे। तानि वृक्ष यथा त्व सक्कसि, तू सक्रमण करता है, इधर उधर विचरता
एव न सक्कन्ति, नही सक्रमण करते है, नही विचरते है।
३३४ [ २.६.२१०
ऐसा कह यह तीतर भाग कर दूसरी जगह चला गया। उसके भाग जाने
के समय चिड़ीमार ने दूसरी गाथा कही—
पुराणवट्टरो अयं भेत्वा पञ्जरमागतो,
कुसलो वाळपासानं असरसमति भासति ॥
[यह पुराना बटेर पिंजरा तोड़ कर चला आया। घास के फंदे में होशियार
परिहास करके चल देता है।]
कुसलो वाळपासानं, घास के फंदे में होशियार अपने को न बाँधते देख
असरसमति और भासति, बोलकर भाग जाता है। ऐसा कह चिड़ीमार जंगल
में घूम जो मिला लेकर घर गया।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय शिकारी
देवदत्त था। बटेर अपनी शरीर-रक्षा करने में होशियार तरुण भिक्षु। उस बात
को प्रत्यक्ष देखने वाला वृक्ष-देवता तो मैं ही था।
२१०. कन्दगलक जातक
अम्भो कोनामयं रुक्खो, यह शास्ता ने वेळुवन में विहार करते समय
सुगत का रग-ढंग बनाने के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
तब शास्ता ने यह सुन कि देवदत्त ने सुगत का रग-ढंग बनाया कहा—
भिक्षुओ ! न केवल अभी देवदत्त मेरी नकल करके विनाश को प्राप्त हुआ,
पहले भी प्राप्त हुआ है।
इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही।
ख. अतीत कथा
कन्दग २८ ] ३३५
ख. अतीत कथा
पूर्व काल में वाराणसी म ब्रह्मदत्त के राज्य करने समय बोधिसत्त्व हिम-
वन्त प्रदेश में कठफोरनी पक्षी होकर उत्पन्न हो खदिरवन में ही रहने लगे।
उसका नाम खदिरवनी ही हो गया। उसका एक बन्दगळक नाम का मित्र
था। यह पाळिभद्रक वन में रहता था। एक दिन यह खदिरवनी के पास
गया। खदिरवनी ने 'मेरा मित्र आया है' सोच बन्दगळक को ले खदिरवन में
प्रवेश कर खदिर के तने को चोंच से ठोग मार कीडे निकाल कर दिए। वन्दगळकत
जो जो पाता मीठे पूए की तरह तोड तोड कर खाता। उसे खाते समय
ही अभिमान हो गया। यह भी कठफोरनी योनि में पैदा हुआ है, मैं भी।
मुझे इसके दिए शिकार से क्या प्रयोजन ? मैं स्वयं ही शिकार करूंगा। उसने
खदिरवनी से कहा—"मित्र ! तू कष्ट मत उठा। मैं ही खदिरवन में शिकार
करूँगा।"
उसने उसे कहा—मित्र ! तू सेमर पालिभद्रक आदि वन म निसार
लकडी में शिकार करने वाले कुल में पैदा हुआ है। खदिर की लकडी सारवान्
होती है, कठोर होती है। तू यह इच्छा मत कर।
बन्दगळत बोला—क्या मैं कठफोरनी की योनि में पैदा नही हुआ ?
उसने उसका कहना न मान जल्दी से जा खदिर वृक्ष पर चांच से ठोग मारी।
उसी समय उसकी चोच टूट गई। आँखें बाहर निकली सी हो गईं। सीस
फट गया। वह तने पर खडा न रह सकने के कारण जमीन पर गिरा और
पहली गाथा कही—
धम्भो को नामय रुक्खो सीनपत्तो सकण्टको,
यत्थ एकप्पहारेन उत्तमाङ्गं विपाटित ॥
[भो ! इस पतले पत्तो वाले काँटेदार वृक्ष का क्या नाम है, जिस
पर एक ही चोट करने से मेरा सिर फट गया ।]
————
धम्भो को नामय रुक्खो, भो खदिरवनी ! इस वृक्ष का क्या नाम है ?
को नाम सो यह भी पाठ है। सीनपत्तो सूक्ष्म पत्तो वाला। यत्थ एकप्पहारेन,
जिस वृक्ष पर एक ही चोट लगाने से उत्तमाङ्ग' विपाटित, सिर फूट गया, न
३३६ [ २६.२१०
केवल सिर ही फूटा चोच भी टूट गई। वह वेदना से पीडित हो खदिर-वृक्ष को
न जान सका कि यह खदिर-वृक्ष है, और इस गाथा से विलाप किया—
इसे सुन खदिरवनी ने दूसरी गाथा कही—
अचारुताय¹ वितुद वनानि कट्ठङ्गरुक्खेसु असारकेसु,
अथासदा खदिर जातसार यत्यब्भिदा गळ्हो उत्तमाङ्गं ॥
[ अभी तक सार-रहित काठ के वृक्षो वाले बनो को ठोग मारी । अब यह
सारवान् खदिर-वृक्ष को प्राप्त हुआ, जहाँ पक्षी ने सिर तुड़वाया । ]
अचारुताय, उसने आचरण किया । वितुद वनानि सार रहित सेमर पालि-
भद्रक के वन आदि को ठोग मारते हुए बीधते हुए । कट्ठङ्गरुक्खेसु असारकेसु,
बन की सामान्य लकडी सार रहित पालिभद्रक सेमर आदि में । अथासदा
खदिर जातसार, छोटपन से सारवान् खदिर-वृक्ष को प्राप्त हुआ । यत्यब्भिदा,
जिस खदिर-वृक्ष से लगकर तोड लिया फाड लिया गळ्हो पक्षी । सभी
पक्षियो के लिए आदर का शब्द है ।
खदिरवनी ने उसे यह सुना कर कहा—कन्दगळक ! जहाँ तून सिर
तुड़ाया यह खदिर नाम का सारवान् वृक्ष है । वह वही मर गया ।
शास्ता ने यह धर्मदेशना सुना जातक का मेल बैठाया ।
उस समय कन्दगळक देवदत्त था । खदिरवनी तो मे ही था ।
¹ अचारिताय भी पाठ है।
२११. सोमदत्त जातक
दूसरा परिच्छेद
७. वीररणत्थम्भक वर्ग
२११. सोमदत्त जातक
“अकासि योग्गं…” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय
लालुदायी स्थविर के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
दो तीन जनो के बीच में यह एक शब्द भी न बोल सकता। अधिक
लज्जाशील होने के कारण कुछ कहने जाकर कुछ दूसरा ही कह देता। धर्म-
सभा में बैठे हुए भिक्षु उसके बारे में चर्चा कर रहे थे। शास्ता ने आकर पूछा—
भिक्षुओ, बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ? "अमुक बातचीत” “भिक्षुओ,
लालुदायी केवल अभी अधिक लज्जाशील नहीं है, पहले भी लज्जाशील ही
रहा है" कह पूर्व-जन्म की कथा कही।
ख. अतीत कथा
पूर्व काल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
काशीदेश में एक ब्राह्मण-कुल में पैदा हुए। बड़े होने पर तक्षशिला में विद्या
सीख घर लौटे। यह देख कि माता-पिता बहुत दरिद्र हैं, उसने सोचा कि दुर्गति
को प्राप्त माता-पिता की अवस्था सुधारूँगा। माता-पिता की आज्ञा से वह
वाराणसी जा राजा की सेवा में रहने लगा। वह राजा को प्रिय हुआ, उसके
मन को अच्छा लगने वाला हुआ।
उसका बाप दो बैलो से खेती कर पेट पालता था। एक बैल मर गया।
उसने बोधिसत्त्व से कहा—तात ! एक बैल मर गया। खेती नहीं होती।
२२
३३८ [ २.७.२११
राजा से एक बैल मांग। “तात ! राजा की सेवा मे रहते थोडे ही दिन हुए
है। अभी बैल मांगना ठीक नही। आप ही मांगे।”
“तात ! तू मेरे अधिक लज्जाशील होने को नही जानता ? मै दो तीन
जनो के सामने बोल नही सकता। यदि मे राजा के पास बैल मांगने जाऊँगा;
तो यह भी देकर आऊँगा।”
“तात ! जो होना है सो हो। मै राजा से नही माँग सकता। लेकिन
मैं तुम्हे बोलने का अभ्यास करा दूंगा।”
“तो अच्छा, मुझे अभ्यास करा।”
बोधिसत्त्व उसे ऐसे श्मशान में ले गए, जहाँ बीरण-घास के झुण्ड थे।
वहाँ घास के पूले बांधकर 'यह राजा है', 'यह उपराजा है', 'यह सेनापति है'
नाम रख, क्रम से पिता को दिखा कर कहा—“तात ! तू राजा के पास जा
'महाराज की जय हो' कह, इस तरह यह गाथा कह बैल मांगना। गाथा
सिखाई—
द्वे मे गोणा महाराज येहि खेतं कसाकसे,
तेसु एको मतो देव दुतियं देहि खत्तिय ॥
[महाराज ! मेरे दो बैल थे, जिनसे खेती होती थी। देव ! उनमें से एक
मर गया। राजन् ! दूसरा दें।]
ब्राह्मण ने एक वर्ष में गाथा का अभ्यास कर बोधिसत्त्व को कहा—
'तात ! सोमदत्त ! मुझे गाथा (कहने) का अभ्यास हो गया। अब मै इसे
जिस किसी के सामने कह सकता हूँ। मुझे राजा के पास ले चल।
उसने कहा 'तात अच्छा' और योग्य भेंट लिवा पिता को राजा के पास ले
गया। ब्राह्मण ने 'महाराज की जय हो' कह भेंट दी। राजा ने पूछा—
'सोमदत्त ! यह ब्राह्मण तेरा क्या लगता है ?'
“महाराज ! मेरा पिता है।”
“किस मतलब से आया है ?”
उस समय ब्राह्मण ने बैल मांगने के लिए गाथा कहते हुए कहा—
द्वे मे गोणा महाराज येहि खेतं कसाकसे,
तेसु एको मतो देव दुतियं गण्ह खत्तिय ॥
सोमदत्त ] ३३६
[ महाराज ! मेरे दो बैल थे, जिनसे खेती होती थी। देव ! उनमें से
एक मर गया। राजन् ! दूसरा लें । ]
राजा ब्राह्मण से विमुख हो गया। उसके कहने का भाव जान मुस्कराया
और बोला—सोमदत्त ! तुम्हारे घर मे मालूम होता है बहुत बैल हैं।
"महाराज ! आप देंगे तो हो जाएँगे।"
राजा ने बोधिसत्त्व पर प्रसन्न हो ब्राह्मण को सोलह अलङ्कृत बैल और
उसका रहने का गाँव ब्रह्मदान दे, बहुत से धन के साथ विदा किया।
ब्राह्मण सर्व श्वेत सैन्धव घोड़े जुते रथ पर चढ़ बहुत से अनुयायियों के
साथ गाँव आया। बोधिसत्त्व ने रथ में बैठ, पिता के साथ आते हुए कहा—
तात ! मैंने सारा साल तुम्हें अभ्यास कराया; लेकिन अन्त में तुमने अपना
बैल राजा को दिया ।
इतना कह यह गाथा कही—
अकासि योग्गं धुवमप्पमत्तो
संवच्छरं वीररणत्थम्भकस्मि,
व्याकासि सञ्ञं परिसं विगय्ह
न निय्यमो तायति अप्पपञ्ञं ॥
[ आलस्य रहित हो नित्य साल भर तक वीरण-घास के भुंडो वाले,
श्मशान में अभ्यास किया, लेकिन परिषद में जाकर भूल गया। अल्प-प्रज्ञा
आदमी का अभ्यास भी त्राण नही करता । ]
अकासि योग्गं धुवमप्पमत्तो संवच्छरं वीररणत्थम्भकस्मि, तू नित्य
प्रमादरहित हो वीरण के भुंड वाले श्मशान में वर्ष भर अभ्यास करता रहा।
व्याकासि सञ्ञं परिसं विगय्ह, परिषद में आकर उस सञ्ज्ञा को विकृत कर
दिया; मतलब बदल दिया। न निय्यमो तायति अप्पपञ्ञं, अल्प प्रज्ञा वाले
आदमी का नियम, अभ्यास त्राण नही करता; रक्षा नही करता।
उसकी बात सुन ब्राह्मण ने दूसरी गाथा कही—
पहले भी अधिक लज्जाशील ही था” कह यह धर्मदेशना ला जातक का
३४० [ २.७ २१२
द्वय याचनको तात सोमदत्त निगच्छति
अलाभं धनलाभञ्च एवधम्मा हि याचना ॥
[ तात सोमदत्त ! माँगने वाले की दो ही हालते होती है—धन मिलता है
या नही मिलता । माँगने का यह स्वभाव ही है । ]
एवधम्मा हि याचना; माँगने का यही स्वभाव है ।
शास्ता ने “भिक्षुओ-लालुदायी केवल अभी अधिक लज्जाशील नही है,
पहले भी अधिक लज्जाशील ही था” कह यह धर्मदेशना ला जातक का
मेल बैठाया ।
उस समय सोमदत्त का पिता लालुदायी था। सोमदत्त मै ही था।
२१२. उच्छिट्ठभत्त जातक
“अद्धओ उपरिमो धण्णो ” यह शास्ता ने जतवन म विहार करते
समय पूर्व भार्या की आसक्ति के बारे में कही—
क. वर्तमान कथा
शास्ता, ने पूछा—भिक्षु, क्या तू सचमुच उत्कण्ठित है ?
“सचमुच !”
“तुझे किसने आकर्षित किया ?”
“पूर्व भार्या ने ।”
“भिक्षु ! यह स्त्री तेरा अपकार करने वाली है। पहले भी इसने तुझे
अपने जार का जूठा खिलाया है।”
इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही—
- उच्चिट्ठभत्त ] ३४१
इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व काल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करते समय बोधिसत्त्व ने
एक ऐसे दरिद्र नट के कुल में जन्म ग्रहण किया जो भीख मांगकर जीविका
चलाता था। बडे होने पर वह दरिद्र अवस्था को प्राप्त हो भीख माँग कर
जीविका चलाने लगे।
उस समय काशी देश के एक गाँव में एक ब्राह्मण की ब्राह्मणी दुश्शीला
थी, पापिन थी, व्यभिचार करती थी। एक दिन किसी काम से जब ब्राह्मण
बाहर गया तो उसका जार मौका देख घर मे घुस आया। उसने उसके साथ
अनाचार कर चुकने पर कहा—"कुछ अच्छा खा कर ही जाओगे ?” उसने
भात तैयार कर दाल (= सूप) व्यञ्जन से युक्त भात परोस कर दिया कि तू
खा। स्वय ब्राह्मण के आगमन की प्रतीक्षा करती हुई द्वार पर खडी हुई।
उस समय बोधिसत्त्व ब्राह्मणी के जार के खाने की जगह पर भीख की
प्रतीक्षा में खडे थे। तभी ब्राह्मण घर की तरफ आया। ब्राह्मणी-ने उसे आते
देख जल्दी से घर मे जाकर जार को कहा—'उठ, ब्राह्मण आ रहा हैं' और उसे
कोठे में उतार दिया। ब्राह्मण के घर में दाखिल हो बैठने के समय पीढा तथा
हाथ धोने को पानी दे जार के जूठे छोडे ठंडे भात के ऊपर गरम भात परोस
दिया। उसने जब भात में हाथ डाला तो ऊपर का भात गरम और नीचे
का ठंडा पाया। वह सोचने लगा कि यह दूसरे का खाकर बचा हुआ जूठा भात
होगा। उसने ब्राह्मणी से पूछते हुए पहली गाथा कही—
अञ्ञो उपरिमॊ वण्णो अञ्ञो वण्णोय हेट्ठिमो,
ब्राह्मणित्वेव पुच्छामि किं हेट्ठा कि च उपरि ॥
[ऊपर (के भात) का रूप ढग दूसरा हैं, नीचे (के भात) का दूसरा।
ब्राह्मणी ! तुझे ही पूछता हूँ कि यह क्या ऊपर है और क्या नीचे ?]
———
वण्णो आकार। यह ऊपर वाले के गरम होने की और नीचे वाले के
ठंडे होने की बात पूछते हुए कहा। किं हेट्ठा किञ्च उपरि परोसा हुआ भात
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३४२ [ २.७.२१२ ]
ऊपर ठंडा और नीचे गरम होना चाहिए। यह वैसा नहीं है। इसलिए तुझे
पूछता हूँ। किस कारण से ऊपर का भात गरम और नीचे का ठंडा है?
ब्राह्मणी अपनी करतूत के प्रकट हो जाने के भय से ब्राह्मण के बार बार
कहने पर भी चुप ही रही। उस समय बोधिसत्त्व को यह सूझा कि कोठे में
बिठाया हुआ आदमी जार होगा और यह घर का स्वामी। ब्राह्मणी अपनी
करतूत के प्रकट होने के भय से कुछ नहीं बोलती। हन्त ! मैं इसकी करतूत
प्रकट कर जार के कोठे में बिठाए होने की बात कह दूँ।
उसने ब्राह्मण के घर से निकलने से जार के घर में प्रवेश करने, अनाचार
करने, श्रेष्ठ भात खाने, ब्राह्मणी का दरवाजे पर खड़े हो रास्ता देखने और
जार को कोठे में उतारने तक का सब हाल कह दूसरी गाथा कही—
अहं नटोस्मि भदन्ते भिक्खकोस्मि इधागतो,
अयं हि फोट्ठमोतिण्णो अयं सो यं गवेससि ॥
[स्वामी ! मैं नट हूँ। भीख मांगने के लिए यहाँ आया हूँ। यह है कोठे
सें उतरा हुआ और यह ही है जिसे तू खोजता है।]
अहं नटोस्मि भदन्ते, स्वामी ! मैं नट जाति का हूँ। भिक्खकोस्मि
इधागतो मैं भिखमंगा यहाँ भीख माँगता हुआ आया हूँ। अयं हि कोट्ठमोतिण्णो
यह इसका जार इस भात को खाता हुआ तेरे भय से कोठे में उतरा है। अयं
सो यं गवेससि, जिसे तू खोज रहा है कि यह किसका जूठा भात होगा, वह यही
है। 'इसे बालो से पकड़, कोठे से निकाल ऐसा कर जिसमें इसे होश रहे और
फिर यह ऐसा पाप-कर्म न करे' कह चला गया।
ब्राह्मण उन दोनों को डरा, पीट कर ऐसी शिक्षा दे जिसमें वे फिर ऐसा
पाप-कर्म न करें, कर्मानुसार गया।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला सत्यों को प्रकाशित कर जातक का मेल
बैठाया। सत्यों के अन्त में उत्कण्ठित भिक्षु सोतापत्ति फल में प्रतिष्ठित हुआ।
उस समय ब्राह्मणी पूर्व-भार्या थी। ब्राह्मण उत्कण्ठित। नट-पुत्र मैं
ही था।
२१३. भरु जातक '
यहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण पाठ प्रस्तुत है:
भरु ] ३४३
२१३. भरु जातक '
"इसीनमन्तरं कत्वा. " यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय
कोशल राजाओ के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
भगवान् के भिक्षुसघ का लाभ तथा सत्कार बहुत था । जैसे कहा है—
"उस समय भगवान् का सत्कार होता था, गौरव होता था, मान होता था,
पूजा होती थी, आदर होता था और उन्हें चीवर, पिण्डपात (=भिक्षा),
शयनासन, रोगी की दवाई आदि चीजें मिलती थी, भिक्षुसघ का भी सत्कार
होता था, गौरव होता था, मान होता था, पूजा होती थी, आदर होता था और
उसे चीवर, पिण्डपात, शयनासन, रोगी की दवाई आदि चींजे मिलती थी ।
लेकिन दूसरे तैथिक परिव्राजको का न सत्कार होता था, न गौरव होता था,
न मान होता था, न पूजा होती थी, न आदर होता था और न उन्हें चीवर,
पिण्डपात, शयनासन, रोगी की दवाई आदि चींजे ही मिलती थी ।" इस
प्रकार जब उनका लाभ सत्कार जाता रहा तो वे दिन रात छिपकर इकट्ठे हो
विचार करते कि जब से श्रमण गौतम पैदा हो गया है तभी से हमारा लाभ
सत्कार जाता रहा, श्रमण गौतम को ही श्रेष्ठ लाभ तथा यश मिलता है ।
क्या कारण है कि इसे यह सब मिलता है ?
कुछ ने कहा—श्रमण गौतम सकल जम्बूद्वीप में उत्तम स्थान श्रेष्ठ-भूमि
पर रहता है । इसीसे उसे लाभ सत्कार की प्राप्ति होती है । बारी बोले—
यही कारण है। हम भी जेतवन मे तैथिक आश्रम बनवाएं । इससे हमको भी
लाभ होगा ।
उन सब ने 'यह ठीक है' निश्चय कर सोचा—यदि हम राजा को बिना
सूचित किए आश्रम बनवाएँगे तो भिक्षु रोक देंगे। घूस पाकर पक्षपात न