जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
१२५. कटाहक जातक
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१२५. कटाहक जातक
“बहुम्पि सो विकत्थेय्य . ” यह (धर्मोपदेश) शास्ता ने जेतवन में
विहार करते समय एक शेखी बघारने वाले भिक्षु के बारे में कहा। उसकी
कथा पूर्वोक्त सदृश ही है¹।
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसो में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
महाधनशाली सेठ हुए। उसकी भार्या ने पुत्र को जन्म दिया। उसकी
दासी ने भी उसी दिन पुत्र उत्पन्न किया। वे दोनो साथ साथ बढ़ने लगे।
सेठ के लड़के के लिखना सीखते समय, दास ने भी उसकी तख्ती ढोने हुए जाकर
उसी के साथ लिखना सीखा, गिनना सीखा। दो तीन भाषाएँ (बोहार)
सीखी। क्रम से बढ़कर वह वचन-कुशल, भाषाविद, सुन्दर तरुण हुआ।
उसका नाम था कटाहक।
सेठ के घर में भण्डारी का काम करते हुए वह सोचने लगा कि यह लोग
मुझसे हमेशा भण्डारी का काम नहीं लेंगे। कुछ भी दोष देखेंगे, तो डाटेंगे,
बांध कर दाग देगे और दास बनाकर काम लग। इलाके मे सेठ का मित्र एक
सेठ है। क्यो न मैं सेठ की तरफ से एक चिट्ठी लेकर, वहाँ पहुँच 'मैं सेठ का
लडका हूँ कह उस सेठ को धोखा दे, उसकी लड़की से शादी कर सुखपूर्वक
रहूँ।
उसने कागज ले उस पर अपने ही लिखा—मैं अमुक नाम का (सेठ)
अपने पुत्र को तुम्हारे पास भेजता हूँ। मेरा तुम्हारे ओर तुम्हारा मेर साथ
¹ भीमसेन जातक (८०)।
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शादी का सम्बन्ध करना योग्य है। इसलिए आप इस लडके को अपनी लडकी
देकर वही बसा ले, मै भी समय मिलने पर आऊँगा।
फिर इस चिट्ठी पर सेठ की अँगूठी की मुहर लगा इच्छानुसार मार्ग-
व्यय तथा सुगन्धियाँ और वस्त्रादि ले प्रत्यन्त देश में जा सेठ के यहाँ पहुँच
प्रणाम किया।
सेठ ने उसे पूछा—तात, कहाँ से आया है ?
"बाराणसी से।"
"किसका पुत्र है ?"
"वाराणसी सेठ का।"
"किस प्रयोजन से आया है ?"
कटाहक ने कहा—यह पत्र देखकर जान ले।
सेठ ने पत्र बाँच प्रसन्न हो 'अब मेरा जीवन सफल हुआ' कह उसे लडकी दे
प्रतिष्ठित किया।
कटाहक का बडा परिवार था। वह यवागु-खाद्य अथवा वस्त्र गंध आदि
के लाने पर झिडकता था—'इस तरह भी कही यवागु पकाया जाता है ?
इस तरह भी कही खाद्य पकाया जाता है। और इस तरह भात ? ओह !
यह प्रत्यन्त देश के रहनेवाले। शहरी न होने से ही यह लोग न कपडो पर
स्त्री करना जानते है, न सुगन्धित पदार्थो को पीसना और न फूलो को गूँथना ?'
—इस प्रकार वह दर्जियो आदि की निन्दा करता।
बोधिसत्त्व ने दास को न देख पूछा—'कटाहक नही दिखाई देता। कहाँ
गया ?' फिर उसे ढूँढने के लिए आदमियो को चारो ओर भेजा। एक आदमी
ने वहाँ जा उसे देख, पहचान अपने आप को छिपाए रख लौटकर बोधिसत्त्व से
कहा। बोधिसत्त्व वह वृत्तान्त सुन, 'उसने अनुचित किया, जाकर उसे लेकर
आता हूँ' सोच राजाज्ञा ले बहुत से लोगो को साथ ले चले।
सेठ प्रत्यन्त देश को जा रहे हैं, यह बात सब जगह फैल गई।
कटाहक ने जब यह सुना कि सेठ आ रहा है, तो सोचा कि वह और किसी
कारण से नही आ रहा है। मेरे ही कारण वह आ रहा है। यदि मै अब भाग
जाऊँ तो फिर नही आ सकूँगा। इसलिए एक यही उपाय है कि मै आगे जाकर
स्वामी की सेवा कर उसे प्रसन्न करूँ।
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उस समय से वह लोगो में बैठकर इस प्रकार बातें बनाने लगा—दूसरे
मूर्ख लोग मातापिता के किए उपकार को भूल, उनके भोजन करने के समय
उनके प्रति अपने कर्तव्य को पूरा न कर उनके साथ ही भोजन करने बैठ जाते
हैं। हम तो मातापिता के भोजन करने के समय पानी का बर्तन ले जाते हैं,
थूकने का बर्तन ले जाते हैं, (दूसरे) पाय ले जाते हैं, पानी और पखा लेकर
खड़े रहते हैं। शौच के लिए जाते समय परदे की जगह तक पानी का बरतन
लेकर जाते हैं। इस प्रकार स्वामी के प्रति जो जो दास के कर्तव्य होते हैं, उन
सबको प्रगट किया।
इस तरह लोगो को समझा बोधिसत्त्व के प्रत्यन्त देश के समीप पहुँच
जाने के समय अपने श्वसुर से कहा—"तात ! मेरे पिता आपके दर्शन के
लिए आ रहे हैं। आप खाद्य भोज तैयार कराएँ। मैं भेंट लेकर आगे जाता
हूँ।" उसने "तात ! अच्छा" कह स्वीकार किया।
कटाहक ने बहुत सी भेंट ले जाकर बहुत से लोगो के साथ जा बोधिसत्त्व
को प्रणाम कर भेंट अर्पण की।
बोधिसत्त्व ने भेंट स्वीकार कर कुशल समाचार पूछ हाजरी के समय तम्बू
लगवा शौच के लिए परदे की जगह में प्रवेश किया। कटाहक ने अपने अनु-
यायियों को पीछे छोड़ा। पानी ले बोधिसत्त्व के पास पहुँचे। वहाँ उनके पानी
छू चुकने पर पैरो में गिर कर कहा—'स्वामी मैं आपको जितना चाहे उतना
धन दूंगा। मुझे बदनाम न करे।' बोधिसत्त्व उसकी सेवा से प्रसन्न हो बोले—
'मत डरो। मुझ से तुम्हें कुछ हानि न होगी।' इस प्रकार उसे तसल्ली दे
प्रत्यन्त-नगर में प्रवेश किया। बड़ा आदर-सत्कार हुआ।
कटाहक दास की तरह से उसकी सब प्रकार की सेवा करता रहा।
एक बार जब बोधिसत्त्व सुखपूर्वक बैठे हुए थे प्रत्यन्त-देश के सेठ ने कहा—
"महासेठ ! मैंने तुम्हारे पत्र को देखकर ही तुम्हारे लड़के को अपनी लड़की
दे दी।" बोधिसत्त्व ने कटाहक को पुत्र ही बना उस (अवसर) के योग्य प्रिय
वचन कह सेठ को सन्तुष्ट किया। लेकिन फिर उसके बाद से वह कटाह का
मुँह नहीं देख सका।
एक दिन बोधिसत्त्व ने सेठ की लड़की को बुलाकर कहा—अम्म ! आ !
मेरे सिर में जुएं हैं, उन्हें चुन। उसके आकर जुएं चुनती हुई खड़ी होने पर
कटाहक ] ६१
पूछा—'अम्म ! क्या मेरा पुत्र तेरे दुःख-सुख मे आलस्य रहित हो साथ देता
हैं ? दोनो जने मिलकर प्रसन्नता-पूर्वक रहते हो न ?''
"तात ! सेठ के पुत्र में और कोई दोष नही। केवल आहार की निन्दा
करता है।"
"अम्म ! वह सदैव से दुख देनेवाला है। लेकिन मै तुझे उसका मुंह
बन्द करने का मन्त्र देता हूँ। तू उसे अच्छी तरह सीख। मेरे पुत्र के भोजन की
निन्दा करने के समय, जैसे सीखा वैसे ही उसके सामने खडी होकर कहना'—
इस प्रकार एक गाथा सिखा कुछ दिन रह वाराणसी चले गए।
कटाहक भी बहुत सा खाद्य-भोज्य ले, उनके पीछे पीछे जा बहुत सा धन
देकर लौट आया।
बोधिसत्त्व के जाने के बाद से कटाहक और भी अभिमानी हो गया।
एक दिन जब सेठ की लडकी नाना प्रकार के अच्छे अच्छे भोजन ले कडछी से
परोस रही थी उसने भोजन की निन्दा आरम्भ की। सेठ की लडकी ने जैसे
बोधिसत्त्व से सीखी थी, उसी प्रकार यह गाथा कही—
बहुम्पि सो विकत्थेय्य अञ्ञ जनपद गतो,
अन्वागन्त्वान दूसेय्य भुञ्ज भोगे कटाहक ॥
[ दूसरे देश में जाकर वह बहुत बकता है। फिर आकर उसे दोषी
ठहरा दे, (इसका ख्याल कर) कटाहक जो भोग मिल रहा है, उसका उपभोग
कर । ]
बहुम्पि सो विकत्थेय्य अञ्ञ जनपद गतो, जो अपने जन्म-स्थान से किसी
ऐसे दूसरे देश मे गया रहता है, जहाँ उसकी जाति नही जानते, वह बहुत बकता
हैं। धोका देने की ठगने की बात करता है। अन्वागन्त्वान दूसेय्य, इस वार
स्वामी की अगवानी करके दास कर्म करने के कारण चाबुक से पीटे जा कर
पीठ की चमडी उधेडी जाने से और दाग दिए जाने से बच गया। यदि अनाचार
करेगा तो दोबारा आने पर तेरा स्वामी तुझे दोषी ठहरायेगा, इस डर से आकर
चाबुक से सजा देगा। दाग देकर तथा तेरी जाति प्रकट करके तुझे खराब करेगा,
पीटेगा। इसलिए इस अनाचार को छोड भुञ्ज भोगे कटाहक ! फिर बाद
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में अपना दासत्व प्रगट कराकर मत पछताना, यही यहाँ सेठ के कहने का
मतलब है ।
—•—
सेठ की लड़की यह सब नही जानती थी । वह जैसे सीखा था वैसे शब्द-
मात्र कहती थी ।
कटाहक ने सोचा, निश्चय से सेठ ने मेरा नाम बताकर इसे सब कह दिया
होगा । उसके बाद से फिर उसकी भोजन की निन्दा करने की हिम्मत न हुई ।
मान-मर्दित होकर वह यथा प्राप्त भोजन करता हुआ कर्मानुसार परलोक
सिधारा ।
शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया । उस समय
कटाहक बकवादी भिक्षु था । वाराणसी सेठ तो में ही था ।
१२६. असिलक्खण जातक
"तथेवेकस्स कल्याण" यह (धर्मोपदेश) शास्ता ने जेतवन में रहते समय
कोशल-नरेश के तलवार के लक्षण कहनेवाले ब्राह्मण के बारे में दिया ।
क. वर्तमान कथा
यह (ब्राह्मण) राजा के पास लोहारों के तलवार लाने के समय तलवार
को सूंघकर तलवार का लक्षण बताता था । जिनके हाथ से कुछ प्राप्त हो
जाता उन की तलवार को वह सुलक्षण और माङ्गलिक कहता, जिनके हाथ से
कुछ न मिलता उनकी तलवार को अमाङ्गलिक बता निन्दा करता ।
एक शिल्पी तलवार बना उसके म्यान में मिर्चों का बारीक चूर्ण भर राजा
के पास तलवार लाया । राजा ने ब्राह्मण को बुलवाकर कहा—तलवार की
परीक्षा कर ।
असिलक्खण ] ६३
जब ब्राह्मण तलवार निकालकर सूँघने लगा तो मिर्चों के चूर्ण के उसकी
नाक को लगने से उसे छींक आई । छींक आने से उसकी नाक तलवार से लगी;
और उसके दो टुकड़े हो गए ।
उसकी इस तरह नाक कटने की बात भिक्षु-सघ में प्रकट हो गई । एक
दिन धर्म-सभा मे बैठे हुए भिक्षुओं ने बात चलाई—आयुष्मानो ! राजा के
तलवार का लक्षण बतानेवाले ने तलवार का लक्षण बताते हुए नाक कटवा
ली।
शास्ता ने आकर पूछा—भिक्षुओ, इस समय बैठे क्या बातचीत कर रहे
हो ? 'अमुक बातचीत' कहने पर 'भिक्षुओ, इस ब्राह्मण ने न केवल अभी तल-
वार सूँघते हुए नाक कटवाई, पहले भी कटवाई है' कह पूर्व जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय, उसके यहाँ
तलवार का लक्षण कहनेवाला एक ब्राह्मण था। (इसके आगे की सारी कथा
'वर्तमान-कथा' की तरह ही है) । राजा ने उसे वैद्य के पास भेजकर उसकी नाक
की चिकित्सा कराई । फिर लाख से उसकी नाक के सदृश ही एक नाक बनवाकर
उसे फिर अपनी सेवा में नियुक्त किया ।
वाराणसी नरेश को कोई पुत्र न था । एक लडकी और एक भानजा था ।
उन दोनो को भी उसने अपने पास ही रखकर पाला था । एक साथ रहने के
कारण वह् परस्पर प्रेम में बँध गए ।
राजा ने आमात्यों को बुलाकर सलाह की कि मेरा भानजा राज्य का
उत्तराधिकारी है ही, इसे ही लडकी देकर इसका राज्याभिषेक कर दिया जाए ।
लेकिन फिर सोचा, भानजा तो हर तरह से आत्मीय है ही, इसके लिए
कोई दूसरी राजकुमारी लाकर दी जाए । फिर इसका अभिषेक किया जाए ।
और अपनी लडकी किसी दूसरे राजा को दी जाए । इस प्रकार हमारे रिश्तेदार
बहुत होगे; और हम ही दोनो राज्यो के स्वामी होगे । उसने मन्त्रियो की
सलाह से निश्चय किया कि दोनो को पृथक पृथक रखना चाहिए; एक को एक
घर में दूसरे को दूसरे में रक्खा । सोलह वर्ष की अवस्था होने पर उनका
परस्पर का आकर्षण और भी बढ गया ।
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राजकुमार सोचने लगा कि किस उपाय से मामा की लड़की को राज घर
से निकलवाया जा सकता है ? उसे एक उपाय सूझा । एक भाग्य बतानेवाली
को बुलवाकर उसने उसे एक हजार मुद्राएँ दीं। भाग्य बतानेवाली ने पूछा—
"मैं क्या कर सकती हूँ ?"
"अम्ब ! तेरे करने से सफलता निश्चित है। कोई बात कहकर ऐसी
विधि लगा जिससे मेरा मामा राज-कन्या को घर से बाहर लाए।"
"स्वामी, अच्छा मैं राजा के पास जाकर कहूँगी कि तुम्हारी कन्या पर ग्रह
है। इतने समय के बाद नहीं रहेगा। मैं अमुक दिन राज-कन्या को रथ पर
चढ़ाकर हथियार बन्द बहुत से आदमियो को साथ ले, अनेक अनुयायियो सहित
श्मशान में जाऊँगी। वहाँ मण्डल-चौकी के नीचे श्मशानशय्या पर मुर्दे को
लिटा, ऊपर की शय्या पर राज-कन्या को बिठा सुगन्धित जल के एक सौ आठ
घडा से स्नान करवाकर ग्रह उतारूँगी, ऐसा कह कर मैं राजकन्या को श्मशान
ले जाऊँगी। तू हमारे वहाँ जाने के दिन हमसे भी पहले ही थोड़ा मिर्चों का चूर्ण
लेकर, हथियार बन्द अपने आदमियो के साथ रथ पर चढ़कर श्मशान-भूमि में
जाना। वहाँ पहुँच रथ को श्मशान-द्वार पर ही एक तरफ छोड़, हथियार बन्द
आदमियों को श्मशान-वन में छिपा, स्वयं श्मशान में जाकर वहाँ मण्डतपीठ
के पास मुर्दे की तरह पट पड रहना। मैं वहाँ आकर तेरे ऊपर मञ्च बिछा
राजकन्या को उठा उस पर सुलाऊँगी । त उस समय मिर्च-चूर्ण को दो तीन
बार नाक पर लगा छींकना। तेरे छींकने के समय हमलोग राजकन्या को
छोड़कर भाग जाएँगे। तब आकर राजकन्या को सिर से नहला, अपने भी
नहा उसे लेकर अपने घर जाना।" उसने अच्छा कह स्वीकार किया।
राजा को जाकर जब उसने सब बात कही, तो राजा ने भी स्वीकार किया।
राजकन्या से भी वह रहस्य कहा तो वह भी मान गई। उसने बाहर निकलने
के दिन राजकुमार को सूचना दे अनेक अनुयायियो के साथ जाते हुए पहरेदार
आदमियों को डराने के लिए कहा—
मेरु, राजकन्या को चारपाई पर लिटाने के समय चारपाई के नीचे
पड़ा हुआ मुर्दा छींकेगा, और छींकने के बाद चारपाई के नीचे से निकल जिसे
पहले देखेगा उसे ही पकड़ेगा। इसलिए होशियार रहना।
राजकुमार पहले ही पहुँचकर जैसे कहा गया था, वैसे ही लेट रहा।
असिलक्खण ] ६५
भाग्य बतानेवाली ने राजकन्या को मण्डलपीठ की जगह पर जाते हुए 'डर मत'
इशारा कर चारपाई पर लिटाया ।
उसी समय कुमार ने मिर्च-चूर्ण नाक पर फेंक छींक मारी । उसके छींक
मारते ही (वह) भाग्य बतानेवाली राजकन्या को छोड़ बड़ा शोर मचाती हुई
सबसे पहले भागी । उसके भागने पर एक भी न ठहर सका । जिसके पास जो
शस्त्र थे उन्हें छोड़ सभी भाग गए ।
राजकुमार जैसे निश्चय किया गया था उसके अनुसार सब करके राजकन्या
को अपने घर ले गया । भाग्य बतानेवाली ने जाकर राजा को सब हाल कहा ।
राजा ने स्वीकार किया, बोला—यूँ भी मैने उसे उसी के लिए पाला था ।
दूध म घी पड़ने जैसा हुआ। आगे चलकर भानजे को राज्य दे अपनी कन्या
को उसकी पटरानी बनाया । वह उसके साथ मेल से रहता हुआ धर्म-पूर्वक
राज्य करता रहा ।
वह तलवार के लक्षण बतानेवाला भी उसी की सेवा में रहता था ।
एक दिन राज्य-सेवा में आ सूर्य के सामने खड़े हो सेवा-कार्य करते हुए उसकी
नाक की लाख पिघल गई । नकली नाक जमीन पर गिर पड़ी । वह शर्म
के मारे सिर नीचा करके खड़ा हुआ ।
राजा ने हँसते हुए कहा—आचार्य्य सोच मत करो । छींकना एक के लिए
कल्याणकर होता है, दूसरे के लिए बुरा । तुम्हारे छींकने पर नाक पृथक हो
गई, लेकिन हमने छींका तो हमें मामा की लड़की और राज्य मिला। इतना
कह यह गाथा कही—
तथेवेकस्स कल्याणं तथेवेकस्स पापकं,
तस्मा सब्बं न कल्याणं सब्बं वापि न पापकं ॥
[ वही किसी के लिए कल्याणकारक है, वही किसी के लिए बुरा । इस
लिए न सब कल्याणकारक ही है, न सब बुरा ही है।]
तथेवेक्स्स तवेवेकस्स—यह भी पाठ है । दूसरे पद में भी ऐस ही ।
इस प्रकार इस गाथा द्वारा उसने यह बात कही । फिर दान आदि
पुण्यकर्म करके यथाकर्म परलोक सिधारा ।
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