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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

१३१. असम्पदान जातक

पहला परिच्छेद
१४. असम्पदान वर्ग
१३१. असम्पदान जातक
"असम्पदानेनितरीतस्स..." यह (गाथा) शास्ता ने वेळुवन में रहते
समय देवदत्त के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
उस समय भिक्षु धर्मसभा में बैठे बातचीत कर रहे थे—आयुष्मानो !
देवदत्त अकृतज्ञ है। तथागत के सद्गुणो को नही जानता। शास्ता न आकर
पूछा—
"भिक्षुओ ! अब बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ?"
"अमुक बातचीत।"
"भिक्षुओ, देवदत्त केवल अभी अकृतज्ञ नहीं है, पहले भी अकृतज्ञ ही रहा
है।"
—इतना कह पूर्व जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्वकाल मे मगधदेश के राजगृह नगर में किसी मगधनरेश के राज्य करते
समय बोधिसत्त्व उस (राजा) के ही सेठ थे। उनके पास अस्सी करोड धन
था। नाम था सङ्घसेठ। वाराणसी मे भी पिल्लिय सेठ नामक सेठ था।
उसके पास भी अस्सी करोड धन था। वे दोनो परस्पर मित्र थे।
उनमें से वाराणसी के पिल्लिय सेठ को किसी कारण से कोई खतरा आ
पडा। तमाम जायदाद नष्ट हो गई। वह दरिद्र हो गया। आश्रयरहित

असम्यदान ] ७७

रह गया। तब वह अपनी स्त्री को ले, सङ्गसेठ के पास आने के विचार से
वाराणसी से निकल पैदल ही राजगृह पहुँच सङ्गसेठ के घर गया।
उसने उसे देखते ही 'मेरा मित्र आया है' पहचान गले मिल आदर सत्कार
करवाया। फिर कुछ दिन बिताकर पूछा—"मित्र कैसे आए?"
"सौम्य, मुझ पर खतरा आ पडा। मेरा सब धन नष्ट हो गया। मुझे
सहारा दे।"
"मित्र, अच्छा डरें मत" कह उसने खजाना खुलवा चालीस करोड हिरण्य
दिलवा उसके साथ अपने पास जो कुछ भी वस्त्र आदि तथा जानदार और
बेजान वस्तु थी सभी बांटकर आधी आधी दी। वह उस धन को ले फिर वारा-
णसी लौट रहने लगा।
आगे चलकर सङ्गसेठ पर भी वैसा ही खतरा आ पडा। उसने अपने लिए
सहारा ढूंढते हुए सोचा—मैने अपने मित्र का बहुत उपकार किया। आधी
जायदाद दे दी। वह मुझे देखकर त्यागेगा नही। मैं उसके पास चलूँ।
उसने अपनी स्त्री के साथ पैदल ही वाराणसी पहुँचकर कहा—भद्रे, तेरे
लिए यह अच्छा नही है कि तू मेरे साथ गली गली भटके। मै जाकर सवारी
भेजूंगा, तू पीछे उस पर बडे ठाट से आना। उसे एक शाला में बिठा स्वय
नगर में दाखिल हुआ। सेठ के घर पहुँच सूचना भिजवाई कि राजगृह से
तुम्हारा मित्र आया है। सेठ बोला—आ जाए। उसे देखकर न वह आसन
से उठा न स्वागत ही किया, केवल इतना पूछा—"क्यो आया है?"
"तुम्हें देखने आया हूँ।"
"निवास स्थान कहीं ठीक किया है?"
"अभी कही ठीक नही हुआ है। सेठानी को शाला में बिठाकर आया हूँ।"
"यहाँ तुम्हारे ठहरने को जगह नही। सीधा लेकर किसी जगह पका
खाकर चले जाओ। फिर मेरे पास न आना"—इतना कह अपने एक दास को
आज्ञा दी कि मेरे मित्र के पल्ले में एक तूम्बा भर भूसा बाँध दो।
उसी दिन उसने एक हजार गाडी लाल चावल छटवाकर कोठे भरे थे।
चालीस करोड धन लेकर आए अकृतज्ञ महाचोर ने मित्र को केवल एक तूम्बा
भर भुस दिलवाया। दास एक टोकरी मे तूम्बा भर भुस डाल वोधिसत्व के
पास गया।

७८ [ १.१४.१३१
बोधिसत्व ने सोचा—यह असत्पुरुष मेरे पास से चालीस करोड़ धन पाकर
अब तूम्बा भर भूसा दे रहा है। इसे लूँ अथवा न लूँ ? उसे विचार हुआ—
यह तो अकृतज्ञ है, मित्रद्रोही है, कृत उपकार को भूलकर इसने मेरे साथ मैत्री-
सम्बन्ध तोड़ डाला है। यदि में इसका दिया तूम्बा भर भूसा बुरा होने के कारण
नही ग्रहण करता हूँ, तो में भी मैत्री सम्बन्ध को तोडनेवाला होता हूँ । इसलिए
मै इसके दिए तूम्बा भर भूसे को ग्रहण कर अपनी ओर से मैत्री-भाव की
प्रतिष्ठा करूँगा ।
उसने तूम्बा भर भूसे को अपने पल्ले में बांध लिया और महल से उतर
शाला को गया ।
स्त्री न पूछा—आर्य्य, तुम्हें क्या मिला ?
"भद्रे ! हमारे मित्र पिल्लिय सेठ ने हमें तूम्बा भर भूसा दे आज ही विदा
कर दिया ।”
उसने रोना प्रारम्भ किया—आर्य्य ! इसे लिया ही क्यो ? क्या
चालीस करोड़ धन का बदला यही है ?
बोधिसत्त्व ने कहा—भद्रे, रो मत । मैने अपनी ओर से मैत्री-सम्बन्ध
न टूटने देने के लिए, अपनी ओर से उसे बनाए रखने के लिए ग्रहण किया है ।
तू क्यों सोच करती हैं ।
—इतना कह यह गाथा कही—
असम्पदानेनितरीतरस्स
बालस्स मित्तानि कती भवन्ति,
तस्मा हरामि भुसं अद्धमानं
मा मे मित्ति ओपिय सस्सतायं ॥
[ऐसी वैसी वस्तु स्वीकार न करने से मूर्ख आदमी के मित्र मित्र नहीं
रहते । इसीलिए में अर्धमान भूसा ले आया हूँ । मेरा मैत्री-सम्बन्ध न टूटे ।
यह शास्वत बना रहे ।]
असम्पदानेन, परस्पर का लोप होकर सन्धि हुई है, अर्थ है ग्रहण न करने
से । इतरीतरस्स, जिस किसी अच्छी बुरी चीज के । बालस्स मित्तानि कसी
भवन्ति, मूढ, अप्रज्ञावान् के मित्र स्खलित हो जाते हैं, मनहूस से हो जाते हैं,

धम्मपददान ] ७६
मतलब टूट जाते हैं। तस्मा हरामि भुसं अटुठमानं, इसी कारण रो प्रकट करता
हूँ कि मैं मित्र का दिया हुआ तूम्बा भर भुस ले आया हूँ। आठ नाळि को
मान कहते हैं। चार नाळियों को अर्ध-मान; और चार ही नाळियो को
तूम्बा; इसी लिए कहा तूम्बा भर भूसा। मा ने मित्ति जीयित्य सस्मताय,
मेरे मित्र से मेरा मैत्री भाव न टूटे। हमेशा बना रहे।
ऐसा कहने पर भी सेठानी रोती ही रही। उसी समय सङ्घसेठ द्वारा
पीळिय सेठ को दिया गया एक दास शाला के दरवाजे के पास से गुजर रहा
था। उसने सेठानी के रोने की आवाज सुनी। अन्दर जाकर जब उसने देखा
कि उसके स्वामी है तो पैरो पर गिर पडा और रोने-चिल्लाने लगा। उसने
पूछा- "स्वामी ! यहाँ कैसे आए ?" सेठ ने सब हाल कह दिया। दास बोला
-स्वामी, हो, चिन्ता न करें। इस प्रकार दोनों को दिलासा दे अपने घर ले
गया। वहाँ सुगन्धित जल से नहलाया, खिलाया। फिर अन्य सब दासों को
खबर कर दी कि स्वामी आए हैं। कुछ दिन बिताकर सभी दासो की राय से
वह राजा के यहाँ पहुँचा और शोर किया।
राजा ने बुलवाकर पूछा- यह क्या है ?
उन्होंने यह सब हाल राजा को कह दिया। राजा ने उनकी बात सुन
दोनो सेठो को बुलवा सङ्घसेठ को पूछा-
"महासेठ ! क्या तूने सचमुच पिळिय सेठ को चालीस करोड धन दिया ?"
"महाराज ! मेरी आशा लगा जब मेरा मित्र मेरे पास राजगृह आया
तो मैंने उसे न केवल चालीस करोड धन ही दिया बल्कि जितना भी मेरे पास
धन था, चाहे जानदार चाहे बेजान सभी के दो बराबर हिस्से कर एक हिस्सा
दिया।"
राजा ने पिळिय सेठ से पूछा- क्या यह सच है ?
"देव ! हाँ ठीक है।"
"तेरी ही आशा लगाकर तेरे पास आनेपर तूने भी इसका कोई सत्कार
सम्मान किया ?"
वह चुप रहा।
"तूने तूम्बा भर भूसा इसके पल्ले में ढलवाकर दिया है ?"

८० [ १.१४.१३२
उसे भी सुनकर वह चुप ही रहा।
राजा ने मन्त्रियों के साथ सलाह करके कि क्या करना चाहिए, सेठ की
निन्दा कर आज्ञा दी—जाओ, पिल्लिय सेठ के घर में जितना धन है, वह सब
सङ्गसेठ को दे दो।
वोधिसत्त्व ने कहा—महाराज ! मुझे पराया धन नहीं चाहिए।
जितना धन मैंने दिया है, उतना ही दिलवा दें।
राजा ने बोधिसत्त्व का धन दिलवा दिया।
बोधिसत्त्व ने अपना दिया हुआ सब धन ले दास-समूह सहित राजगृह जाकर
कुटुम्ब बसाया। फिर दान आदि पुण्य कर्म करते हुए कर्मानुसार परलोक सिधारे।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय पिल्लिय
सेठ देवदत्त था। सङ्गसेठ तो मैं ही था।
१३२. पञ्चगरुक जातक
"कुसलोपदेसे पितिया दळहाय च..." यह (गाथा) शास्ता ने जेतवन
में विहार करते समय अजपाल न्यग्रोध (वृक्ष) के नीचे मार-कुमारियों द्वारा
प्रलोभित किए जाने के सूत्र के बारे में कही। भगवान् आरम्भ से ही
ऐसे थे—
वड्ढलमाना आगच्छु तण्हा च अरती रगा,
ता तत्थ पनुदी सत्था तूल भट्ठंव मारुतो ॥१
[तण्हा, अरति और रगा (मारकन्याएँ) प्रभास फैलाती हुई आईं।
शास्ता ने उनको ऐसे दूर भगा दिया जैसे हवा उड़ती हुई रूई को।]
१ सयुत्त-निकाय, मार-सयुत्त ।

पञ्चगरुक ] ८१
इस प्रकार उस सूत्र को अन्त तक कहने के समय धर्म-सभा में एकत्र हुए
भिक्षुओं ने बातचीत चलाई—आयुष्मानो, सम्यक् सम्बुद्ध के पास मारकन्याएँ
सैंकड़ों प्रकार के दिव्य रूप बनाकर लुभाने के लिए आईं। लेकिन उन्होंने
आँख खोलकर भी नहीं देखा। अहो ! बुद्ध-बल अद्भुत है। शास्ता ने आकर
पूछा—भिक्षुओ, बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ? 'अमुक बातचीत' कहने पर
शास्ता ने कहा—'भिक्षुओ, इस समय मेरे सभी आश्रवों को नष्ट कर सर्वज्ञता
प्राप्त किए रहने पर मार कन्याओं के न देखने में कुछ भी आश्चर्य नहीं है।
पूर्व समय में बुद्धत्व प्राप्ति की खोज में लगे हुए रहने पर चित्त मैल के
रहते हुए भी निर्मित दिव्य रूप को आँख उघाड़कर कामुक भाव से न
देख, जाकर महाराज्य प्राप्त किया था। इतना कह पूर्व-जन्म की कथा
कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व सौ
भाइयों में सबसे छोटे थे। सारी कथा उपरोक्त तक्कसिला जातक¹ के अनुसार
विस्तारपूर्वक कहनी चाहिए।
उस समय तक्षशिला नगर निवासियो ने नगर के बाहर शाला में (बैठे
हुए) बोधिसत्त्व के पास जा, स्वीकृति ले उन्हें राज्य का भार सौंप अभिषेक
किया। फिर उन्होंने नगर को देवनगर की तरह तथा राजभवन को इन्द्रभवन
की तरह अलंकृत किया।
उस समय बोधिसत्त्व नगर में प्रविष्ट हो राजभवन के महल के ऊँचे तल
पर श्वेत छत्र के नीचे श्रेष्ठ रतन सिंहासन पर चढ़ देवेन्द्र की तरह बैठे।
अमात्य, ब्राह्मण गृहपति आदि तथा सभी अलंकारों से अलंकृत क्षत्रियकुमार
उसे घेर कर खड़े थे। देव अप्सराओं के समान नृत्य-गीत तथा वाद्य में
कुशल, उत्तम हाव भाव वाली सोलह हजार नर्तकियों ने गाना बजाना किया।
¹ तक्कसिला=तेलपत्त जातक (९६)
६

८२ [ १.१४.१३२
गाने बजाने के शब्द से सारा राजभवन ऐसा गूंज गया जैसे मेघ के शब्द से
महासमुद्र की घोस भर जाए।
तब बोधिसत्त्व को विचार हुआ—यदि मैं उन यक्षिणियो के बनाए हुए
दिव्य-रूप को देखता तो मैं मृत्यु को प्राप्त होता और मुझे यह वैभव न देखना
मिलता। प्रत्येक-बुद्धो के उपदेशानुसार चलने से मुझे इसकी प्राप्ति हुई।
इस प्रकार सोच उल्लास-वाक्य कहते हुए यह गाथा कही—
कुसलूपदेसे धितिया दळ्हाय च
अवत्थितत्ताभयभीरुताय च,
न रक्खसीनं वसमागमिम्हा
स सोत्थिभायो महता भयेन मे ॥
[ सदुपदेश पर दृढ़ता पूर्वक स्थिर रहने से, तथा भय भीरुता को मन में
स्थान न देने से हम राक्षसियो के वश में नही आए। मै बडे भारी भय से
बच गया (सकुशल रहा) ।]
कुसलूपदेसे; समर्थ लोगो के उपदेश से; प्रत्येक-बुद्धो के उपदेशानुसार
(चलकर) । धितिया दळ्हाय च, दृढ धृति से वा स्थिर अखण्डित धीर्य्य से ।
अवत्थितत्ताभयभीरुताय च, भय-भीरुता को मन में स्थान न देने से, भय
कहते हैं चित्त का डर मात्र और भीरुता शरीर को कंपा देनेवाला भय। यह
दोनो बोधिसत्त्व को यह देखकर भी कि यक्षिणियां मनुष्यो को खा जाती हैं—
इस भय के कारण के उत्पन्न होने पर भी नही हुए। इसी लिए कहा है अवत्थि-
तत्ताभयभीरुताय च । भयभीरुता के न होने से अर्थात् भयभीरुता का कारण
उपस्थित होने पर भी पीछे न लौटने से । नरक्खसीनं वसमागमिम्हा, यक्ष-
कान्तार मे उन राक्षसियो के वश में नही आया। क्योकि सदुपदेश में हमारी
स्थिति स्थिर और दृढ थी। भयभीरुता के न होने से पीछे न लौटने वाले हुए,
इसलिए राक्षसियो के वश में नही आए—यही भाव है। स सोत्थि भायो
महता भयेन मे. सो आज मुझेयह बडे भारी भय से, राक्षसियो से प्राप्त होनेवाले
दुःख दौर्मनस्य से छुटकारा मिला, कल्याण हुआ, प्रीतिसौमनस्य-भाव पैदा हुआ।

८२ [ १.१४.१३२
गाने बजाने के शब्द से सारा राजभवन ऐसा गूंज गया जैसे मेघ के शब्द से
महासमुद्र की कोक्ष भर जाए।
तब बोधिसत्व को विचार हुआ—यदि मैं उन यक्षिणियो के बनाए हुए
दिव्य-रूप को देखता तो मैं मृत्यु को प्राप्त होता और मुझे यह वैभव न देखना
मिलता। प्रत्येक-बुद्धो के उपदेशानुसार चलने से मुझे इसकी प्राप्ति हुई।
इस प्रकार सोच उल्लास-वाक्य कहते हुए यह गाथा कही—
कुसलूपदेसे धितिया दळ्हाय च
अवत्थिसत्ताभयभीरुताय च,
न रक्खसीन वसमागमिम्हा
स सोत्थिभावो महता भयेन मे ॥
[ सदुपदेश पर दृढ़ता पूर्वक स्थिर रहने से, तथा भय भीरुता को मन में
स्थान न देने से हम राक्षसियो के वश में नही आए। मै बडे भारी भय से
बच गया (सकुशल रहा) ।]
कुसलूपदेसे; समर्थ लोगो के उपदेश से, प्रत्येक-बुद्धो के उपदेशानुसार
(चलकर) । धितिया दळ्हाय च, दृढ धृति से वा स्थिर अखण्डित वीर्य से।
अवत्थितत्ताभयभीरुताय च, भय-भीरुता को मन में स्थान न देने से, भय
कहते है चित्त का डर मात्र और भीरुता शरीर को कँपा देनेवाला भय। यह
दोनो बोधिसत्व को यह देखकर भी कि यक्षिणियां मनुष्यो को खा जाती है—
इस भय के कारण के उत्पन्न होने पर भी नही हुए। इसी लिए कहा है अवत्थि-
तत्ताभयभीरुताय च। भयभीरुता के न होने से अर्थात् भयभीरुता का कारण
उपस्थित होने पर भी पीछे न लौटने से। नरक्खसीनं वसमागमिम्हा, यक्ष-
कान्तार मे उन राक्षसियो के वश में नही आया। क्योकि सदुपदेश में हमारी
स्थिति स्थिर और दृढ थी। भयभीरुता के न होने से पीछे न लौटने वाले हुए,
इसलिए राक्षसियो के वश मे नही आए—यही भाव है। स सोत्थि भावो
महता भयेन मे. सो आज मुझेयह बडे भारी भय से, राक्षसियो से प्राप्त होनेवाले
दुःख दोर्मनस्य से छुटकारा मिला, कल्याण हुआ, प्रीतिसौमनस्य-भाव पैदा हुआ।