जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
क. वर्तमान कथा
थीणपूण ] ४०६
क. वर्तमान कथा
वह श्रावस्ती के एक सेठ की लड़की थी। उसने अपने घर में वृषभराज
का सत्कार होते देख दाई से पूछा- माँ, यह कौन है जिसका इस प्रकार सत्कार
होता है ?
"बेटी, यह वृषभराज है।"
एक दिन उस लड़की ने प्रासाद पर खड़े होकर गली में एक कुबड़े को
देखा। उसने सोचा-बैलों में जो ज्येष्ठ होता है उसकी पीठ पर एक ककुध
होता है, मनुष्यों में जो बड़ा हो उसकी पीठ पर भी होना चाहिए। यह मनुष्यों
में वृषभ-राज होगा। मुझे इसकी चरणसेविका बनना चाहिए। उसने दासी
को भेजकर उसे कहलवाया कि सेठ की लड़की तेरे साथ जाना चाहती है।
तू अमुक स्थान पर जाकर ठहर। वह कीमती चीजें ले, भेष बदल, महल से
उतर उसके साथ भाग गई। आगे चलकर यह बात नगर में और भिक्षुसङ्घ
में प्रकट हो गई। धर्मसभा में भिक्षुओं ने बात चलाई-आयुष्मानो ! अमुक
सेठ-लड़की कुबड़े के साथ भाग गई।
शास्ता ने आकर पूछा- भिक्षुओ, इस समय बैठे क्या बातचीत कर रहे
हो ? 'अमुक बातचीत' कहने पर शास्ता ने कहा- भिक्षुओ, न केवल अभी
यह कुबड़े को चाहती है, इसने पहले भी कुबड़े की ही इच्छा की है। इतना कह
पूर्व जन्म की कथा कही।
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में राजा ब्रह्मदत्त के राज्य करते समय बोधिसत्त्व
ने एक निगम-ग्राम में सेठ के कुल में पैदा हो, गृहस्थी बसाते हुए, पुत्र-पुत्री के
साथ बढ़ते हुए अपने पुत्र के लिए वाराणसी-सेठ की लड़की पक्की कर दिन का
निश्चय किया। सेठ की लड़की ने अपने घर पर वृषभ का सत्कार-सम्मान
होते देख दाई से पूछा- यह कौन है ? उसने कहा- यह वृषभ है। तब
सेठ की लड़की ने गली में जाते हुए एक कुबड़े को देखकर समझा कि यह पुरुषों
में वृषभ होगा। उसने कीमती सामान लिया और उसके साथ भाग गई।
४१० [ २६.२३२
बोधिसत्त्व भी सेठ की लडकी को घर लाने की इच्छा से बडी बारात
के साथ बाराणसी जाते हुए उसी रास्ते पर हो लिए। वे दोनो सारी रात
रास्ता चलते रहे। रात भर सर्दी खाने के कारण अरुणोदय होने पर कुबडे के
शरीर का वायु कुपित हो गया। बडी पीडा होने लगी। वह रास्ते से हट,
पीडा से बेहोश होने के कारण वीणा के दण्डे की तरह मुडकर पड रहा। सेठ
की लडकी भी उसके चरणो म बैठ रही। बोधिसत्त्व ने सेठ की लडकी को
कुबडे के चरणो में बैठे देख, पहचान कर, पास आ, सेठ की लडकी से वार्तालाप
करते हुए पहली गाथा कही—
एकचिन्तितोय अयमत्थो बालो अपरिनायको,
नहि खुज्जेन वामेन भोति सङ्गन्तुमरहसि ॥
[ यह (कुबडे के साथ भागने की बात) एक देशी चिन्ता है। (कुबडा)
मूर्ख है, जाने में असमर्थ है। कुबडे बौने के साथ आपका जाना उचित नही।]
एकचिन्तितोव अयमत्थो, अम्म ! यह जो तू सोचकर इस कुबडे के साथ
निकल भागी यह बात तेरी अकेली को ही सोची होगी। बालो अपरिनायको
यह कुबडा मूर्ख है, दुर्बुद्धि होने से बढा होने पर भी बाल ही है। दूसरा पकड
कर ले जाने वाला न होने पर जाने मे असमर्थ होने से अपरिनायक। नहि
खुज्जेन वामेन भोति सङ्गन्तुमरहसि, इस कुबडे के साथ, वामनरूप होने से
बौने के साथ, तुम्हें जो महान् कुल मे उत्पन्न हुई हो, सुन्दर हो, दर्शनीय हो जाना
योग्य नहीं।
उसकी इस बात को सुनकर सेठ की लडकी ने दूसरी गाथा कही—
पुरिसूत्तम मञ्ञमाना अह खुज्जमकामयि,
सोय सकुदितो सेति छिन्नतन्ति यथा घुणा ॥
[ मैने कुबडे को पुरुषो म वृषभ समझ कर उसकी इच्छा की। यह तार
टूटी वीणा की तरह सुकदा हुआ पडा है।]
[विकण्णक ] ४११
आर्ये ! मैने एक साड को देखकर सोचा कि बैलों म जो ज्येष्ठ होता
हैं उसकी पीठ पर एक ककुध होता है। इसकी पीठ पर भी यह है। इसलिए
यह पुरुष म वृषभ होगा। इस प्रकार मैने इस कुबडे को पुरुष-वृषभ मान
कर इसकी इच्छा की। यह तो जैसे, तार टूटा तूमडी सहित वीणा-दण्ड हो
वैसे मुडा हुआ पडा है।
बोधिसत्त्व यह जान कि यह अज्ञान के ही कारण घर से निकल पडी,
उसे नहला, अलङ्कृत कर, रथ पर चढ़ा कर ल गय।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय यही
सेठ की लडकी थी। बाराणसी-सेठ तो मैं ही था।
२३३. विकण्णक जातक
"कामं मंहि इच्छसि तेन गच्छ " यह शास्ता ने जेतवन म विहार
करते समय एक उत्कण्ठित भिक्षु के बारे मे कही।
क. वर्तमान कथा
वह धर्मसभा म लाया गया। शास्ता ने पूछा—भिक्षु, क्या तू सचमुच
उत्कण्ठित है ? 'सचमुच' कहने पर पूछा—किस कारण से उत्कण्ठित है ?
बोला—कामुकता के कारण। शास्ता ने उसे कहा—भिक्षु, कामुकता तीखे
शल्य की तरह है। एक बार हृदय में प्रविष्ट होने पर तीर लगे मगरमच्छ
की तरह मार ही डालती है। इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही—
विक्कण्णक ] ४१३
भोजन के कारण मच्छो का पीछा करता हुआ लोभवश मारा गया है।]
काम निश्चय से। यहि इच्छसि तेन गच्छ जहां चाहे वहाँ जा। मम्मम्हि
मर्म स्थान मे। विक्कण्णकेन उल्टी नोक वाले शल्य से। हतोसि भत्तेन
स्वादसितेन लोलो च मच्छे अनुबन्धमानो तू नगाडा बजाकर भात दिए जाते
समय लोभी बन खाने के लिए मच्छो का पीछा करता हुआ उस स्वादिष्ट
भोजन द्वारा मारा गया। जाने की जगह भी तू जीवित नही रहेगा।
यह अपने वासस्थान पर पहुँच कर मर गया। शास्ता ने यह बात कह,
अभिसम्बुद्ध होने पर दूसरी गाथा कही—
एवम्पि लोकाभिस ओपतन्तो
विहञ्ञती चित्तवसानुवत्ती;
सो हञ्जति ञातिसखानमज्झे
मच्छानुगो सोरिव सुसुमारो ॥
[इस प्रकार लौकिक लाभ के पीछे भागता हुआ, अपने चित्त के वशीभूत
आदमी मारा जाता है। वह रिश्तेदारो और दोस्तो के बीच वैसे ही मारा जाता
है जैसे मच्छो का पीछा करने वाला मगरमच्छ।]
लोकाभिस पांच विषय। उन्हें ससार इष्ट, कान्त तथा सुन्दर समझ
ग्रहण करता है, इसलिए लोकाभिस कहलाते है। ओपतन्तो उन लौकिक
चीजो के पीछे भागता हुआ राग के वशीभूत आदमी विहञ्जति कष्ट पाता
है। सो हञ्जति इस प्रकार का वह आदमी रिश्तेदारो तथा मित्रो के बीच
म भी सो तीर से बिंधे मच्छानुगो सुसुमारो विय पाँच विषयो को सुन्दर मानकर
हञ्जति कष्ट पाता है, महाविनाश को प्राप्त होता है।
इस प्रकार शास्ता ने यह धर्मदेशना ला, (आर्य-)सत्यो को प्रकाशित
कर जातक का मेल बैठाया। सत्यो के प्रकाशन के अन्त म उत्कण्ठित भिक्षु
स्रोतापत्तिफल में प्रतिष्ठित हुआ।
उस समय वाराणसी राजा मै ही था।