जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
कह आर्य-सत्यों का प्रकाशन कर, जातक का सारांश निकाला। सत्यों का
१२८ [ १.१५.१४६
तथा हि भय तज्जितो, मैं इसी बार प्रवेश करने से भी भयभीत हो गया; मरण
भय से त्रास को तथा उद्विग्नता को प्राप्त हुआ।
इतना कह और वहाँ से भाग फिर उस अथवा अन्य किसी भी हाथी के
शरीर को खड़े होकर देखा तक नहीं। उस के बाद से लोभ के वशीभूत नहीं हुआ।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला कर कहा—भिक्षुओ, अन्दर जो मैल पैदा
हो जाए उस चित्त के मैल को बढ़ने न देकर वही निग्रह करना चाहिए। इतना
कह आर्य-सत्यों का प्रकाशन कर, जातक का सारांश निकाला। सत्यों का
प्रकाशन समाप्त होने पर वह पाँच सौ भिक्षु अर्हत् हो गए। शेष में से कुछ
श्रोतापन्न, कुछ सकृदागामी तथा कुछ अनागामी हुए।
उस समय सियार तो मैं ही था।
१४६. एकपण्ण जातक
“एक पण्णो अयं रुक्खो...” यह शास्ता ने वैशाली के पास महावन की
कूटागार शाला में रहते हुए वैशाली के एक दुष्ट-स्वभाव लिच्छवि-कुमार के
बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
उस समय वैशाली में गावुत गावुत¹ की दूरी पर तीन प्राकारें बनी थीं।
तीनो जगहों पर गोपुर थे, अट्टालिकाएँ थीं तथा कोठे थे। इस प्रकार अत्यन्त
शोभायमान था।
¹ गव्यूति=२ मील।
एकपण्ण ] १२६
वहां सदैव राज्य करवाते हुए रहनेवाले राजाओ की संख्या सात हजार
सात सौ सात होती थी। उतने ही उपराजा होते थे। उतने ही सेनापति।
उतने ही भण्डारी।
उन राजकुमारो में एक कुमार दुष्ट लिच्छवि कुमार कहलाता था। वह
क्रोधी था, प्रचण्ड था, कठोर था। डण्डे से छेड़े गए जहरीले सांप की तरह
क्रोध से सदैव जलता रहता था। कोई भी उसके सामने दो तीन शब्द भी
नहीं बोल सकता था। उसे न उसके माता पिता, न रिश्तेदार और न यार-दोस्त
ही समझा सके। तब उसके माता पिता ने सोचा- "यह कुमार अत्यन्त कठोर
स्वभाव का है दुस्साहसी है। सम्यक् सम्बुद्ध को छोड और कोई इसे विनयी नही
बना सकता। हो सकता है कि यह उन्ही लोगो में से हो जो बुद्ध के विनीत बनाने
से ही विनीत बनते है।" वे उसे शास्ता के पास ले गए और प्रणाम करके बोले-
भन्ते ! यह कुमार प्रचण्ड है, कठोर है, क्रोध से जलता है। इसे उपदेश दे।
शास्ता ने उस कुमार को उपदेश दिया- "कुमार ! प्राणियो के प्रति
प्रचण्ड नही होना चाहिए, दुस्साहसी नही होना चाहिए, कष्ट देने वाला नही
होना चाहिए। कठोर वाणी जिस माता ने जन्म दिया है उसको भी, पिता
को भी, पुत्र को भी, भाई वहन को भी, भार्य्या को भी, मित्र बन्धुओ को
भी अप्रिय होती है, अच्छी नही लगती। जो आदमी डसन के लिए आए
सर्प की तरह, जगल म लूटमार करने के लिए तैयार चोर की तरह, खाने
के लिए आए यक्ष की तरह उद्विग्न होता है, वह दूसरे जन्म म नरक आदि
मे पैदा होता है। इस जन्म म क्रोधी आदमी सजा धजा रहन पर भी
दुर्वर्ण ही होता है। इसका पूर्ण चन्द्र की सी शोभा वाला भी चेहरा आग से
जल कमल के सदृश अथवा मैले कञ्चन के शीशे की तरह भोंडा हो जाता
है, देखने में बुरा लगता है। क्रोध के कारण ही प्राणी शस्त्र लेकर स्वयं अपने
को मार डालते हैं। विष खा लेते हैं। रस्सी से फांसी लटक जाते है।
प्रपात से गिर पडते हैं। इस प्रकार क्रोध के वशीभूत हो मरकर वह नरक आदि
में पैदा होते हैं। दूसरो को कष्ट देनेवाले भी इस जन्म में निन्दा को प्राप्त हो
मरन पर नरक आदि म उत्पन्न होते है। फिर जब मनुष्य होकर पैदा होते
हैं तो फोडा फोड के ही रूपद से रुककर प्राय रोगी रहते हैं। आँख की बीमारी
तथा कान की बीमारी आदि रोगो में एक से उठने पर दूसरी बीमारी में फँस
६
१३० [ १.१५ १४६
जाते हैं। रोग से मुक्त न हो सकने के कारण नित्य दुखी रहते हैं। इसलिए
सभी प्राणियों के प्रति मैत्री भावना रखनी चाहिए। सभी का हित चिन्तक
होना चाहिए। सभी के प्रति कोमल चित्त वाला होना चाहिए। क्योकि इस
प्रकार का (क्रोधी) आदमी नरक आदि के भय से मुक्त नहीं होता।
वह कुमार शास्ता का एक ही उपदेश सुनकर मान-रहित हो गया, शान्त
इन्द्रिय हो गया, क्रोध-रहित हो गया, मैत्री-चित्त वाला हो गया तथा कोमल
चित्त का हो गया। उसे कोई गाली देता, मारता तो भी वह उसकी ओर रुख कर
न देखता। वह ऐसा सांप हो गया जिसके दांत उखाड़ दिए गए हों, ऐसा केकड़ा
हो गया जिसके डंक जाते रहे हों, ऐसा बैल हो गया जिसके सींग न हों।
उसका समाचार जानकर भिक्षुओं ने धर्म-सभा में बातचीत चलाई—
आयुष्मानो ! दुष्ट लिच्छवि कुमार को चिर काल तक उपदेश देते रहकर भी
न माता पिता न रिश्तेदार-मित्र आदि ही उसे विनीत बना सके। सम्यक्
सम्बुद्ध ने उसे एक ही उपदेश से ऐसा कर दिया जैसे किसी मस्त हाथी को शान्त
कर दिया हो। यह ठीक ही कहा गया है—भिक्षुओ ! हाथी-दमन करने
वाला खूब हाथी को दमन करता है तो दमन किया हुआ हाथी एक ही दिशा में
दौड़ता है चाहे पूर्व दिशा में, चाहे पश्चिम दिशा में, चाहे उत्तर दिशा में अथवा
दक्षिण में। भिक्षुओ, घोड़ा-दमन करनेवाला जब घोड़े को दमन करता है
तो दमन किया हुआ घोड़ा एक ही दिशा में दौड़ता है चाहे पूर्व दिशा में, चाहे
पश्चिम में, चाहे उत्तर में, अथवा दक्षिण में। भिक्षुओ, बैल को दमन करने
वाला जब उसे दमन करता है, तो दमन किया हुआ बैल एक ही दिशा में दौड़ता
है चाहे पूर्व दिशा में, चाहे पश्चिम में, चाह उत्तर में अथवा दक्षिण में। लेकिन
भिक्षुओ, जिसे तथागत अर्हत्सम्यक् सम्बुद्ध शिक्षित करते हैं वह आठ दिशाओं
में जाता है रूपवान् रूपों को देखता है, यह एक दिशा है • सञ्ज्ञा तथा संज्ञा
का जो निरोध है उसे प्राप्त कर विचरता है, यह आठवीं दिशा है। वह दिशाओं
में अनुपम पुरुष-दम्य-सारथि कहलाते हैं।¹ आयुष्मानो ! सम्यक् सम्बुद्ध
के समान पुरुषों का दमन करनेवाला सारथि नहीं है।
¹ मज्झिम निकाय (३)