जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
२०८. संसुमार जातक
३३० [ २.६.२०८
२०८. संसुमार जातक
“अलमेतेहि अम्हेहि,...” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय
देवदत्त के वध करने के प्रयत्न के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
उस समय शास्ता ने यह सुन कि देवदत्त वध के लिए प्रयत्न करता है,
कहा—भिक्षुओ, न केवल अभी देवदत्त मेरे वध करने का प्रयत्न करता है,
उसने पहले भी किया है, लेकिन त्रास मात्र भी पैदा नही कर सका।
इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही।
ख. अतीत कथा
पूर्व काल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करते समय बोधिसत्त्व हिमा-
लय प्रदेश में बन्दर की योनि में पैदा हुए। वह हाथी सदृश बल वाले, शक्ति-
सम्पन्न, महान् शरीर धारी, अति सुन्दर थे। गङ्गा के मोड़ पर जगल में
रहते थे।
उस समय गङ्गा में एक मगरमच्छ रहता था। उसकी भार्या ने बोधिसत्त्व
को देखा। उसके मन में उसका मांस खाने का दोहद उत्पन्न हुआ। उसने
मगरमच्छ से कहा—स्वामी १, इस कपिराज का कलेजा खाना चाहती हूँ।
“भद्रे १ हम जल-चर, वह स्थल-चर, क्या हम उसे पकड़ सकेंगे ?”
“जिस किसी भी तरह हो पकड़, यदि नही मिलेगा, मर जाऊँगी।”
“तो डर मत। एक उपाय है। मैं तुझे उसका कलेजा खिलाऊँगा।”
उसे आश्वासन दे मगरमच्छ, जिस समय बोधिसत्त्व गङ्गा का पानी पी,
गङ्गा-तट पर बैठा था, बोधिसत्त्व के पास गया और बोला—वानरराज !
संसुमार ] ३३१
यहां इन अस्वादिष्ट फलो को खाते हुए तू अभ्यस्त स्थान में ही चरता है ?
गङ्गा-पार आम, कटहल के मधुर फलो की सीमा नही । क्या तुम्हें गङ्गा-पार
जाकर फल-मूल नही खाने चाहिएँ ?
"मगरराज ! गङ्गा में पानी बहुत है। वह विस्तृत है। मैं उधर कैसे
जाऊँ ?"
"यदि चले तो मैं तुझे अपनी पीठ पर चढ़ा कर ले जाऊँगा।"
उसने उसका विश्वास कर 'अच्छा' कह स्वीकार किया। 'तो आ मेरी
पीठ पर चढ' कहने पर चढ गया। मगरमच्छ थोडी दूर जा उसे डुबाने लगा।
बोधिसत्त्व ने पूछा—दोस्त ! यह क्या ? मुझे पानी में डुबा रहा है।?
"मैं तुझे धर्म-भाव से नही ले जा रहा हूँ। मेरी भार्या के मन में तेरे
कलेजे के लिए दोहद उत्पन्न हुआ है। मैं उसे तेरा कलेजा खिलाना चाहता हूँ।"
"दोस्त ! तूने कह दिया सो अच्छा किया। यदि हमारे पेट में कलेजा
हो तो एक शाखा से दूसरी शाखा पर घूमते हुए चूर्ण विचूर्ण हो जाए।"
"तो तुम कहाँ रखते हो ?" "
बोधिसत्त्व ने पास ही पके फलो से लदा हुआ एक गूलर का पेड दिखाकर
कहा—देख, हमारे कलेजे इस गूलर के पेड पर लटकते है।
"यदि मुझे कलेजा दे, तो मैं तुझे नही मारूँगा।"
"तो आ मुझे वहाँ ले चल। मैं तुझे वृक्ष पर लटका हुआ दूँगा।"
वह उसे लेकर वहाँ गया। बोधिसत्त्व ने उसकी पीठ पर से छलांग मार
गूलर की शाखा पर बैठ कहा—सौम्य ! मूर्ख मगरमच्छ ! तूने यह मान लिया
कि इन प्राणियो का कलेजा वृक्ष की शाखाओ पर होता है। तू मूर्ख है। मैने
तुझे ठगा है। तेरे फल-मूल तेरे ही पास रहें। तेरा शरीर ही बड़ा है। अक्ल
नही है।
यह कह, इसी बात को प्रकट करते हुए यह गाथाएँ कही— :-
अलमेतेहि अम्बेहि जम्बूहि पनसेहि च,
यानि पार समुद्दस्स वर मय्ह उदुम्बरो ॥
महती वत ते बोन्दि न च पञ्ञाण तदुप्पिका,
सुसुमार वञ्चितो मेसि गच्छ दानि यथासुखं ॥
३३२ [ २.६.२०६
[यह जो तू समुद्र-पार आम, जामुन और कटहल बताता है, मुझे यह
नहीं चाहिए। मुझे गूलर ही अच्छा है। तेरा शरीर बड़ा है; लेकिन तेरी
प्रज्ञा उसके समान नहीं। मगरमच्छ ! तू मेरे द्वारा ठगा गया है। अब तू
सुखपूर्वक जा।]
———
अलमेतेहि, जो तूने द्वीप में देंगे, यह मुझे नही चाहिएँ। वरं महं उदुम्बरो
मुझे यह उदुम्बर वृक्ष ही अच्छा है। बोन्धि शरीर। तद्रूपिया, तेरी प्रज्ञा
तेरे शरीर के अनुकूल नहीं है। गच्छदानि यथासुखं, अब सुखपूर्वक जा, तेरे
(लिए) कलेजा नहीं है।
———
मगरमच्छ (जूए में) हजार हार जाने की तरह दुःखी, दौर्मनस्य को प्राप्त
हो चिन्ता करता हुआ अपने निवास-स्थान को चला गया।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय
मगरमच्छ देवदत्त था। मगरमच्छी चिञ्चामाणविका। कपिराज तो मैं
ही था।
२०६. कक्कर जातक
“दिट्ठा मया वने रुक्खा...."यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय
धर्मसेनापति सारिपुत्र स्थविर के शिष्य तरुण भिक्षु के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
वह अपने शरीर की रक्षा करने में होशियार था। शरीर के लिए सुखकर
न होगा, इस डर से किसी अति-शीत वा अति-उष्ण चीज का उपयोग न
थक्कर ] ३३३
करता था। सर्दी-गर्मी से शरीर को कष्ट होगा, इस डर से बाहर नही निक-
लता था। बहुत पक्का या जला भात नहीं खाता था। उसकी यह शरीर-
रक्षा की होशियारी सघ में प्रकट हो गई। धर्मसभा में भिक्षुओ ने बातचीत
चलाई—आयुष्मानो ! अमुक तरुण शरीर-रक्षा के काम में होशियार है।
शास्ता ने आकर पूछा—भिक्षुओ, बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ?
“यह बातचीत” कहने पर ‘भिक्षुओ ! यह तरुण अपने शरीर-रक्षा के काम में
न केवल अभी होशियार है, पहले भी होशियार था।’
इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व काल में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
जगल में वृक्ष-देवता हुए।
एक चिडीमार पालतू बटेर, वालो का फदा तथा लाठी से जगल में बटेरो
को फँसाता हुआ, भाग कर जगल में चले गए एक बटेर को फाँसने लगा।
यह चाल के फदे म होशियार होने के कारण फद में नही आता था। वह उठ
उठ कर छिप जाता।
शिकारी अपने आपको शाखा-पत्तो से ढक बार बार लकडी और फदा
लगाता। बटेर ने उसे लज्जित करने के लिए मानुषी भाषा बोलते हुए पहली
गाथा कही—
दिट्ठा मया वने रुक्खा अस्सकण्णविभीटका,
न तानि एव सक्कन्ति यथा त्वं रुक्ख सक्कसि ॥
[ मैने इस वन के अनेक अस्सकण्ण (अश्वकर्ण) और विभीटका (विभीतक)
वृक्ष देखे, लेकिन तू वृक्ष जिस तरह से इधर उधर चलता है, वह नही चलते । ]
मित्र शिकारी मया इस वने पैदा हुए बहुत से अस्सकण्ण तथा विभीटक
खे। तानि वृक्ष यथा त्व सक्कसि, तू सक्रमण करता है, इधर उधर विचरता
एव न सक्कन्ति, नही सक्रमण करते है, नही विचरते है।
३३४ [ २.६.२१०
ऐसा कह यह तीतर भाग कर दूसरी जगह चला गया। उसके भाग जाने
के समय चिड़ीमार ने दूसरी गाथा कही—
पुराणवट्टरो अयं भेत्वा पञ्जरमागतो,
कुसलो वाळपासानं असरसमति भासति ॥
[यह पुराना बटेर पिंजरा तोड़ कर चला आया। घास के फंदे में होशियार
परिहास करके चल देता है।]
कुसलो वाळपासानं, घास के फंदे में होशियार अपने को न बाँधते देख
असरसमति और भासति, बोलकर भाग जाता है। ऐसा कह चिड़ीमार जंगल
में घूम जो मिला लेकर घर गया।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय शिकारी
देवदत्त था। बटेर अपनी शरीर-रक्षा करने में होशियार तरुण भिक्षु। उस बात
को प्रत्यक्ष देखने वाला वृक्ष-देवता तो मैं ही था।
२१०. कन्दगलक जातक
अम्भो कोनामयं रुक्खो, यह शास्ता ने वेळुवन में विहार करते समय
सुगत का रग-ढंग बनाने के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
तब शास्ता ने यह सुन कि देवदत्त ने सुगत का रग-ढंग बनाया कहा—
भिक्षुओ ! न केवल अभी देवदत्त मेरी नकल करके विनाश को प्राप्त हुआ,
पहले भी प्राप्त हुआ है।
इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही।