जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
शास्ता ने यह धर्म-देशना ला, जातक का मेल बैठाया।
२४ [ १.१२.११४
सिप्पिकानं सतं नत्थि—इसके पास सौ सीपियां भी नही हैं। कुतो कंससता
दुवे दो सौ कार्षापण तो कहाँ होगे।
बोधिसत्व यह गाथा कह 'हे ब्राह्मण ! जा अपनी चादर धोकर, स्नान
करके अपना काम कर' कह अन्तर्ध्यान हो गए।
ब्राह्मण वैसा कर 'हाय ठगा गया' सोचता हुआ चला गया।
शास्ता ने यह धर्म-देशना ला, जातक का मेल बैठाया।
उस समय गीदड देवदत्त था। हाँ, वृक्ष-देवता में ही था।
११४. मितचिन्ती जातक
“बहुचिन्ती अप्पचिन्ती च” यह गाथा शास्ता ने जेतवन मे विहार करते
समय दो वृद्ध स्थविरो के बारे मे कही।
क. वर्तमान कथा
उन्होने एक जनपद के जगल मे वर्षा-काल बिताकर सोचा कि अब शास्ता
के दर्शन के लिए जायेगे, रास्ते के लिये आवश्यक सामग्री तैयार कर 'आज
जाते हैं, कल जाते हैं' करते करते एक मास बिता दिया। फिर दुबारा सामग्री
तैयार कर 'आज जाते है, कल जाते हैं' करते करते एक मास और बिता दिया।
इसी प्रकार अपने आलस्य और निवास-स्थान से मोह होने के कारण तीसरा
महीना भी बिता दिया। तीन महीने गुजारकर जेतवन पहुँच, अपने योग्य-
स्थान पर पाँच चीवर रख बुद्ध के दर्शनो को गए। भिक्षुओ ने पूछा—“आयु-
ष्मानो ! आप बुद्ध की सेवा में बहुत दिन के बाद उपस्थित हुए। इतनी
देर क्यो हुई ? उन्होने कारण बताया। उनका यह आलस्य तथा सुस्ती करने
मितचिन्ती ] २५
का स्वभाव भिक्षुओ पर प्रगट हो गया। भिक्षुओ ने धर्म सभा मे उन स्थविरो
के आलसी स्वभाव की चर्चा चलाई। शास्ता ने आकर पूछा—"भिक्षुओ,
इस समय बैठे क्या बात कर रहे थे ?" "यह बातचीत" कहने पर उन स्थविरो
को बुलवाकर पूछा—
"भिक्षुओ, क्या तुम सचमुच आलसी हो ?"
"भन्ते ! सचमुच ।"
"भिक्षुओ ! न केवल अभी आलसी हो, पूर्वजन्म में भी आलसी ही थे
और निवास-स्थान के प्रति मोह था" कह पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में राजा ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय
वाराणसी नदी में तीन मच्छ थे। उनके नाम थे बहुचिन्ती, अल्प चिन्ती
और मित-चिन्ती। वे जगल (की नदी) से वस्ती के पास आ गए। मितचिन्ती
ने बाकी दोनो को कहा—"यह वस्ती है। यहाँ सशकित रहने की तथा भय-
भीत रहने की जरूरत है। मछुवे लोग नाना प्रकार के मछली पकड़ने के जाल
आदि फेंककर मछलियां पकड़ते है। हम जगल को ही चले।"
बाकी दोनो जनो ने आलस्य के कारण और लोभ के कारण 'आज चले,
कल चलें' कहते हुए तीन महीने गुजार दिए। मछुओ ने नदी में जाल फेंका।
बहुचिन्ती और अल्प चिन्ती खाने की चीज को ग्रहण करते हुए आगे आगे
जाते थे। वे अपनी मूर्खता के कारण जाल की गन्ध का ख्याल न कर जाल
में ही जा फँसे। मितचिन्ती ने पीछे आते हुए जाल की गन्ध सूंघकर समझ
लिया कि वे दोनो जाल में जा फँसे। उसने सोचा—इन दोनो आलसी तथा
मूर्खों को जीवन-दान दूँ। यह सोच यह बाहर की तरफ से जाल मे घुस जाल
फाड कर निकलते हुए की तरह पानी को आलोडते हुए जाल के आगे गिरा;
फिर पिछली तरफ से फाडकर निकलते हुए की तरह पानी को आलोडते हुए
पिछली तरफ गिरा। मछुओ ने यह समझकर कि मच्छ जाल फाडकर निकल
गए जाल के सिरो को खोल फेंक दिया। वे दोनो मच्छ जाल से छूटकर
पानी में जा पडे। इस प्रकार मितचिन्ती ने उनके प्राण बचाए।
शास्ता ने यह पूर्व-जन्म की कथा कह बुद्ध होने पर यह गाथा कही—
२६ [ १.१२.११५
बहुचिन्ती अप्पचिन्ती च उभो जाले अबज्झरे,
मितचिन्ती प्रमोचेसि उभो तत्थ समागता ॥
[बहुचिन्ती और अप्पचिन्ती दोनो जाल में फँस गए। मितचिन्ती
ने दोनो को छुड़ा दिया। ये दोनो उसके साथ आ गए ।]
बहुचिन्ती, बहुत चिन्तन करनेवाला होने से अथवा बहुत सङ्कल्प-विकल्प
वाला होने से बहुचिन्ती नाम हुआ। बाकी दोनो भी इसी प्रकार हैं। उभो
तत्थ समागता, मितचिन्ती के कारण प्राण बचाकर वे दोनो फिर पानी मे
मितचिन्ती के साथ आ गए।
इस प्रकार शास्ता ने यह धर्मदेशना ला (आर्य-) सत्यो को प्रकाशित कर
जातक का मेल बैठाया। (आर्य-) सत्यो की समाप्ति पर स्थविर भिक्षु
श्रोतापन्न हुए।
उस समय के बहुचिन्ती और अल्प-चिन्ती यह दोनो थे, मितचिन्ती तो मै
ही था।
११५. अनुसासिक जातक
“यायञ्चमनुसासति .” यह गाथा शास्ता ने जेतवन मे विहार करते
समय एक उपदेश देनेवाली भिक्षुणी के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
यह श्रावस्ती-निवासिनी एक कुल में उत्पन्न हुई थी। जिस समय से
प्रव्रजित होकर उपसम्पन्न हुई, उस समय से लेकर वह श्रमण-धर्म मे न लग
अनुसासिक ] २७
चीजो की लोभी होने से नगर के एक ऐसे हिस्से मे जहां दूसरी भिक्षुणियां नही
जाती थी, भिक्षा मांगने जाती । मनुष्य उसे बढ़िया भोजन देते । उसने रस
तृष्णा के कारण सोचा, यदि दूसरी भिक्षुणियां भी उसी ओर भिक्षा मांगने
जाएंगी, तो मेरी प्राप्ति मे फरक पडेगा। इस लिए मुझे ऐसा करना चाहिए,
जिसमे दूसरी भिक्षुणियां उधर भिक्षा मांगने न जाएं ।
वह भिक्षुणियो के निवास-स्थान पर गई और बोली—बहनो ! अमुक
जगह पर चण्ड-हाथी है, चण्ड-घोडा है, चण्ड-कुत्ता है। वह खतरनाक जगह
हैं। वहाँ पिण्ड-पात के लिए मत जाएं। उसकी बात सुन एक भिक्षुणी ने
भी उधर गर्दन निकालकर नही देखा।
उसके एक दिन उधर भिक्षा माँगने के समय, जब वह जल्दी से एक घर
मे घुसने जा रही थी एक मरखने मेढे ने उसे टक्कर मारकर उसकी जांघ की
हड्डी तोड दी । मनुष्यो ने दौडकर उस दो टुकडे हुए जांघ की हड्डी को एक में
बाँधा और उसे चारपाई पर लिटाकर भिक्षुणी आश्रम लाए। 'यह दूसरी भिक्षु-
णियो को उपदेश देती थी, स्वय उधर जाकर जांघ की हड्डी तुडाकर आई है'
कह भिक्षुणियो ने हंसी उडाई। यह बात शीघ्र ही भिक्षु-सघ तक पहुँच गई।
एक दिन धर्म-सभा में बैठे हुए भिक्षु उसकी निन्दा कर रहे थे—आयु-
ष्मानो ! दूसरो को उपदेश देनेवाली भिक्षुणी स्वय उधर जाकर मरखने मेंढे
से जांघ की हड्डी तुडा लाई है।
शास्ता ने आकर पूछा—भिक्षुओ, बैठे क्या बात चीत कर रहे हो ?'
'यह बातचीत' कहने पर 'भिक्षुओ, केवल अब ही नही, पहले भी यह दूसरो को
तो उपदेश देती रही है, लेकिन स्वय तदनुसार आचरण न करने के कारण दुख
भोगती रही है' कह पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय मे वाराणसी मे राजा ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधि-
सत्व जगल मे पक्षी की योनि म जन्म ग्रहण कर बडे होने पर सैकडो पक्षियो को
ले हिमालय को गए। उनके वहीं रहते समय चण्ड-स्वभाव की एक चिडिया
राज-मार्ग में जाकर पडी रहती, वहाँ उसे गाडियो पर से गिरे हुए धान, मूँग
आदि के दाने मिलते। उन्हे पाकर वह सोचती कि अब ऐसा उपाय करूँ जिससे
दूसरे पक्षी इधर न आयें। वह पक्षियो को उपदेश देती—राज-मार्ग बड़ा
खतरनाक है। हाथी, घोड़े और मरकहे वैलोवाली गाडियां आती जाती है।
शीघ्रता से उड़ा भी नही जा सकता। वहाँ नहीं जाना चाहिए। पक्षियो
ने उसका नाम अनुशासिका रख दिया।
एक दिन वह राजपथ पर चुग रही थी। जोर से आती हुई गाड़ी के शब्द
को सुन उसने पीछे मुंह कर देखा। 'अभी दूर है' सोच, चुगती ही रही।
हवा के जोर से गाड़ी शीघ्र ही आ पहुँची। वह उड़ न सकी। पहिये से
उसके दो टुकड़े हो गए।
बोधिसत्त्व ने पक्षियो के लौटने पर उनकी गिनती करते समय उसे न देख
कर कहा—अनुशासिका दिखाई नही देती, उसे खोजो। पक्षियो ने खोज करते
हुए, उसे राजपथ पर दो टुकड़े हो पड़े देखा। बोधिसत्त्व से आकर निवेदन
किया। 'वह दूसरो को जाने से रोकती थी लेकिन स्वयं वहाँ चुगने जाकर
दो टुकड़े हुई' कह यह गाथा कही—
यायञ्जमनुसासति सय लोलुप्पचारिणी,
साय विपक्खिका सेति हता चक्केन साळिका ॥
[ जो दूसरो को उपदेश देती थी लेकिन स्वयं थी लोभी, वह यह चिड़िया
पहिये के नीचे आकर पंख-रहित होकर मरी पड़ी है। ]
यायञ्जमनुसासतीति, इसमें 'य' केवल दो पदो की सन्धि के कारण है।
अर्थ है, जो दूसरो को उपदेश देती है। सय लोलुप्पचारिणी, अपने लोभी स्व-
भाव वाली। साय विपक्खिका सेति, वह पंखरहित होकर राजपथ पर पड़ी
है। हता चक्केन साळिका, गाड़ी के पहिये से मारी गई चिड़िया।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय उप-
देश देनेवाली चिड़िया यह उपदेश देनेवाली भिक्षुणी ही थी। ज्येष्ठ-पक्षी
तो मैं ही था।