जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
२२७. गूथपाणक जातक
गूथपाणक ] ३६१
२२७. गूथपाणक जातक
“सूरो सूरेण सङ्गम्म....” यह शास्ता ने जेतवन मे रहते समय एक
भिक्षु के बारे मे कही।
क. वर्तमान कथा
उस समय जेतवन से गव्यूति¹, आधे योजन की दूरी पर एक निगम-ग्राम
था। यहाँ से बहुत शलाका-भोजन² मिलता था। वहाँ एक प्रश्न पूछने वाला
ठिंगना व्यक्ति रहता था। वह शलाका-भोजन तथा पाक्षिकभोजन लेने के
लिए गए तरुण भिक्षु तथा सामणेरो से 'कौन खाते हैं ? कौन पीते हैं ? कौन
भोजन करते हैं ?' आदि प्रश्न पूछता। उत्तर न दे सकने पर उन्हे लज्जित
करता। वे उसके भय से शलाका भोजन तथा पाक्षिक-भोजन लेने उस गाँव
न जाते।
एक दिन एक भिक्षु शलाका बाँटने के स्थान पर जाकर बोला—भन्ते !
क्या अमुक गाँव में शलाका-भोजन या पाक्षिक-भोजन है ?
“आयुष्मान् ! है, किन्तु वहाँ एक ठिंगना व्यक्ति है जो प्रश्न पूछता
है। उत्तर न दे सकने पर गाली देता है, अपशब्द कहता है। उसके भय से
कोई नही जा सकते हैं।”
“भन्ते ! वहाँ के भोजन मेरे जिम्मे कर। मै उस का दमन कर, उसे
निर्विष करके ऐसा बना दूँगा कि आगे से तुम्हे देख कर भागे।”
भिक्षुओ ने 'अच्छा' कह वहाँ का भोजन उसके जिम्मे कर दिया।
¹गव्यूति=१/४ योजन।
²शलाक भत्त—गृहस्थों के घर से शलाका से प्राप्त होने वाला भोजन।
गूथपाणक ] ३६३
ने उसे देख सोचा—यह मेरे भय से ही भागा जा रहा है। मेरा इसका युद्ध होना
चाहिए। उसने उसे ललकारते हुए पहली गाथा कही—
सूरो सूरेन सङ्कम्म विक्कन्तेन पहारिना,
एहि नाग निवत्तस्सु किम्मु भीतो पलायसि;
पस्सन्तु अङ्गमगधा मम तुम्हञ्च विक्कमं ॥
[ तू शूर है। लडने मे, प्रहार करने मे समर्थ शूर के सम्मुख होने पर हे
नाग ! रुक, डर कर भाग क्यो रहा है। जरा अङ्गमगध के लोग मेरा और
तेरा पराक्रम देखे । ]
तू सूरो मुझ सूरेन साथ आकर वीर्य्य-विक्रम से विक्कन्तेन प्रहार करने
की सामर्थ्य होने से पहारिना किस कारण से बिना लडे ही जाता है। एक
प्रहार तो देने दे। इसलिए एहि नाग निवत्तस्सु इतने से ही मरने से भयभीत
हो किम्मु भीतो पलायसि । यह इस सीमा मे रहने वाले पस्सन्तु अङ्गमगधा
मम तुम्हञ्च विक्कम हम दोनो का पराक्रम देखे।
उस हाथी ने ध्यान देकर उसकी बात सुन, रुक कर उसने पास जा उसे
अप्रसन्न करते हुए दूसरी गाथा कही—
न त पादा वधिस्सामि न दन्तेहि न सोण्डिया,
मिळ्हेन त वधिस्सामि पूति हञ्जतु पूतिना ॥
[ न तुझे पांव से मारूँगा, न दांतो से, न सूण्ड से । तुझे गूह से मारूँगा ।
गन्दगी गन्दगी से ही मरे । ]
तुझे पांव आदि से नही मारूँगा। तेरे योग्य गूह से ही तुझे मारूँगा।
ऐसा कह 'गन्दगी मे रहने वाला कीडा गन्दगी से ही मरे' (करके) उसके
सिर पर बडा सा लेण्डा गिरा कर जल छोड उसे वही मार क्रौञ्चनाद करता
हुआ आरण्य मे गया।