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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

९७२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

९७२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

| भूतमात्रासंसर्गतः सैन्धवखिल्यवत् प्रविभक्तः, जलादौ चन्द्रादिप्रतिविम्बवत् कार्यकारण इह प्रविष्टः, सोऽयं पुरुषः, प्राज्ञेन परमार्थेन स्वाभाविकेने स्वेनात्मना परेण ज्योतिषा, सम्परिष्वक्तः सम्यक् परिष्वक्त एकीभूतो निरन्तरः सर्वात्मा, न बाह्यं किञ्चन वस्त्वन्तरम्, नाप्यान्तरमात्मनि-–अयमहस्मि सुखी दुःखी वेति वेद ।<br><br>तत्र चैतन्यज्योतिःस्वभावत्वे कस्मादिह न जानातीति यद्-प्राक्षीः, तत्रायं हेतुर्मयोक्त एकत्वम्, यथा स्त्रीपुंसयोः सम्परिष्वक्तयोः। | क्षेत्रज्ञ पुरुष भूतमात्राके संसर्गसे लवणखण्डके समान विभक्त होकर, जलादिमें चन्द्रमादिके प्रतिबिम्बके समान इस देहेन्द्रियमें प्रविष्ट हो रहा है, वह यह पुरुष अपने स्वाभाविक परमार्थस्वरूप परज्योति प्राज्ञसे सम्यक् प्रकारसे परिष्वक्त अर्थात् एकीभूत होकर निरन्तर और सर्वात्मा होनेके कारण न तो किसी बाह्य वस्त्वन्तरको जानता है और न आन्तर अर्थात् आत्मामें ही 'यह सुखी अथवा दुःखी मैं हूँ' ऐसा समझता है।¹<br><br>इस प्रकार तुमने जो पूछा था कि चैतन्यात्मज्योतिःस्वरूप होनेपर भी वह इस अवस्थामें क्यों नहीं जानता, सो उसमें मैंने एकत्व यह हेतु बतलाया, जिस प्रकार कि परस्पर आलिङ्गित स्त्री और पुरुषका |


१. इस प्रसङ्गसे कोई यह न समझ ले कि सुषुप्तिमें जीव वस्तुतः आत्मनिष्ठ एक अद्वितीय एवं सर्वात्मा हो जाता है। यह तो बोधवान्‌का स्वरूप है। जो किसी अवस्थाविशेषसे परिच्छिन्न होगा, वह सर्वात्मा कैसे हो सकता है ? इस प्रकरणका तात्पर्य, जैसा कि पहले टिप्पणीमें बताया गया है, इतना ही है कि उस समय कुछ भी भान नहीं रहता; सुषुप्तिसे जागनेपर मनुष्य यही अनुभव सुनाता है कि 'मैं सुखसे सोया, कुछ नहीं जाना' इत्यादि। उसको सर्वात्मभावका बोध नहीं रहता; क्योंकि आवरण दूर हुए बिना यह बोध प्रकाशित नहीं होता और बोध हो जानेपर आवरण रहता नहीं; सुषुप्तिसे जीव पुनः जाग्रत्-अवस्थामें आता है; इससे इसकी स्वरूपस्थिति नहीं मानी जा सकती; स्त्री-पुरुषके मिलनका दृष्टान्त अथवा सुषुप्ति-का दृष्टान्त वस्तुको समझानेके लिये सब एकदेशी दृष्टान्तमात्र है; मुक्त पुरुषकी किसी दूसरेसे वास्तविक तुलना हो ही नहीं सकती।