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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

३१० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

३१०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १
न तु सामान्यं पुरुषमात्रं विशिष्टाधिकारानारूढम्; तस्माद्भवितव्यं तेन, येन प्रेरितोऽवश एव बहिर्मुखो भवति स्वस्माल्लोकात्।विशिष्ट अधिकारपर आरूढ़ न हुए सामान्य पुरुषमात्रकी रक्षा नहीं करते; अतः कोई ऐसा होना चाहिये, जिससे प्रेरित होकर वह बलात्कारसे आत्मलोकसे बहिर्मुख हो जाता है।
नन्वविद्या सा, अविद्यावान् हि बहिर्मुखीभूतः प्रवर्तते।पूर्व०—अच्छा तो वह अविद्या है, क्योंकि अविद्यावान् पुरुष ही बहिर्मुख होकर प्रवृत्त होता हैं।
सापि नैव प्रवर्तिका; वस्तुस्वरूपावर्णात्मिका हि सा; प्रवर्तकबीजत्वं तु प्रतिपद्यतेऽन्धत्वमिव गर्तादिपतनप्रवृत्तिहेतुः।सिद्धान्ती—वह भी प्रवर्तिका नहीं है, वह तो वस्तुके स्वरूपका आवरण करनेवाली ही है। हाँ, जिस प्रकार अन्धत्व गढ़ेमें गिरनेका हेतु होता है, उसी प्रकार यह प्रवर्तकबीजरूपताको तो प्राप्त होती है।
एवं तर्ह्युच्यतां किं तद् यत्प्रवृत्तिहेतुरिति ?पूर्व०—ऐसी बात है तो तुम्हीं बताओ, जो प्रवृत्तिका हेतु है, वह क्या है?
तदिहाभिधीयते—एषणा कामः सः, ‘स्वाभाविकीयामविद्यायां वर्तमाना बालाः पराचः कामाननुयन्ति’ इति काठकश्रुतौ, स्मृतौ च— “काम एष क्रोध एषः” (गीता ३। ३७) इत्यादि, मानवे च सर्वा प्रवृत्तिः कामहेतुक्येवेति। स एषो-सिद्धान्ती—वह यहाँ बतलाया जाता है—वह एषणा यानी काम है। ‘स्वाभाविकी अविद्यामें रहनेवाले मूर्खलोग बाह्य कामनाओंका अनुसरण करते हैं’—ऐसा कठश्रुतिमें भी कहा है, तथा स्मृतिमें भी “यह काम, यह क्रोध” ऐसा कहा है। मानवधर्मशास्त्रमें भी सारी प्रवृत्ति कामसे ही होनेवाली है—ऐसा कहा है।¹

१. अकामतः क्रिया काचिद्दृश्यते न हि कस्यचित्।
 यद्यद्धि कुरुते जन्तुस्तत्तत्कामस्य चेष्टितम्॥