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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

२८० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

२८०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
४ । ३७) इत्यादिस्मृतिभ्यश्च।देती है" इत्यादि स्मृतियोंसे भी यही सिद्ध होता है।
[कर्मणामविद्याविषयत्वम्]<br>यत्तु ऋणैः प्रतिबध्यत इति, तन्न, अविद्यावद्विषयत्वात्। अविद्यावान्हि ऋणी, तस्य कर्तृत्वादुपपत्तेः। "यत्र वा अन्यदिव स्यात्तत्रान्योऽन्यत्पश्येत्" (४। ३। ३१) इति हि वक्ष्यति। अनन्यत्सद्वस्त्वात्माख्यं यत्राविद्यायां सत्यामन्यदिव स्यात्तिमिरकृतद्वितीयचन्द्रवत्, तत्राविद्याकृतानेककारकापेक्षं दर्शनादिकर्म तत्कृतं फलं च दर्शयति, "तत्रान्योऽन्यत्पश्येत्" इत्यादिना।और यह जो कहा गया कि यह ऋणोंसे बँधा हुआ है, सो ठीक नहीं, क्योंकि ऋणोंका सम्बन्ध तो अविद्वान्‌से ही है। अज्ञानी पुरुष ही ऋणी है; क्योंकि उसीमें कर्तृत्वादि रहने सम्भव हैं। "जहाँ अन्यके समान होता है वहीं अन्य अन्यको देख सकता है" ऐसा श्रुति कहेगी भी। तात्पर्य यह है कि आत्मा-संज्ञक सद्वस्तु अनन्य है, वह जहाँ अविद्यावस्थामें तिमिर रोगकृत द्वितीयचन्द्रके समान अन्यके समान होती है, वहींपर श्रुति "वहाँ अन्य अन्यको देखेगा" इस वाक्यसे अनेक कारकोंकी अपेक्षावाला अविद्याकृत दर्शनादि कर्म और उससे होनेवाला फल भी दिखाती है।
यत्र पुनर्विद्यायां सत्यामविद्याकृतानेकत्वभ्रमप्रहाणम्, "तत्केन कं पश्येत्" (४। ५। १५) इतिकर्मासम्भवं दर्शयति। तस्मादविद्यावद्विषय एव ऋणित्वम्, कर्मसम्भवात्; नेतरत्र। एतच्चोत्तरत्रकिंतु जहाँ ज्ञानका उदय होने-पर अज्ञानजनित अनेकत्वभ्रमका नाश हो जाता है, वहाँ "तब किसके द्वारा किसे देखे" यह श्रुति कर्मकी असम्भवता दिखलाती है। अतः ऋणित्वका अविद्वान्‌से ही सम्बन्ध है, क्योंकि उसीके द्वारा कर्म होना सम्भव है, अन्य (ज्ञानवान्) से नहीं। यही बात आगे, जिन वाक्यों-