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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४५१

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४५१


| बुद्ध्युपाधिस्वभावानुविधायी हि सः, चन्द्रादिप्रतिबिम्ब इव जलाद्यनुविधायी। तस्मात्तस्या बुद्धेर्जाग्रद्विषयायास्ताभिर्नाडीभिः प्रत्यवसर्पणमनु प्रत्यवसृप्य पुरीतति शरीरे शेते तिष्ठति, तप्तमिव लोहपिण्डमविशेषेण संव्याप्याग्निवच्छरीरं संव्याप्य वर्तत इत्यर्थः। | इसका भोग है; जिस प्रकार चन्द्रादिका प्रतिबिम्ब [अपने आधारभूत] जलादिका अनुवर्तन करनेवाला होता है, उसी प्रकार वह बुद्धिरूप अपनी उपाधिके स्वभावका ही अनुवर्ती है। अतः उस जाग्रद्विषयिणी बुद्धिके व्यावर्तन (लौटने) के साथ-साथ वह उन नाड़ियोंद्वारा व्यावृत होकर पुरीतत्में—शरीरमें शयन करता—स्थित होता है, तात्पर्य यह है कि तपे हुए लोहपिण्डमें अग्निके समान वह सामान्यरूपसे शरीरमें व्याप्त होकर स्थित होता है।^१ |
| स्वाभाविक एव स्वात्मनि वर्तमानोऽपि कर्मानुगतबुद्ध्यनुवृत्तित्वात्पुरीतति शेत इत्युच्यते। न हि सुषुप्तिकाले शरीरसम्बन्धोऽस्ति। "तीर्णो हि तदा सर्वान्शोकान्हृदयस्य" (४। ३। २२) इति हि वक्ष्यति। | वह अपने स्वाभाविक स्वरूपमें ही विद्यमान रहते हुए भी कर्मानुसारिणी बुद्धिका अनुवर्ती होनेके कारण 'शरीरमें शयन करता है' इस प्रकार कहा जाता है। सुषुप्तिकालमें उसका शरीरसे सम्बन्ध नहीं रहता। "उस समय वह हृदयके सारे शोकोंको पार कर लेता है" ऐसा श्रुति कहेगी भी। |
| सर्वसंसारदुःखवियुक्ता इयमवस्थेत्यत्र दृष्टान्तः—स यथा | यह अवस्था संसारके सारे दुःखोंसे रहित है—इस विषयमें यह दृष्टान्त दिया जाता है—वह जिस |


१. अर्थात् उसकी किसी स्थानविशेषमें विशेष अभिव्यक्ति नहीं रहती, बुद्धिके संकोचके साथ उसका भी संकोच हो जाता है; केवल सामान्य सत्तामात्रसे अपने शुद्धस्वरूपमें स्थित रहता है।