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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

| ५७४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २ |

| ५७४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २ |
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| स्तन्निमित्तश्च प्रकाशादिः, न पुनः परमार्थचन्द्रादित्यस्वरूपानाशवदसंसारिब्रह्मस्वरूपस्य विज्ञानघनस्य नाशः; तद्विज्ञानघन इत्युक्तम्; स आत्मा सर्वस्य जगतः, परमार्थतो भूतनाशान्न विनाशी। विनाशी त्वविद्याकृतः खिल्यभावः, "वाचारम्भणं विकारो नामधेयम्" (छा० उ० ६।१।४) इति श्रुत्यन्तरात्। अयं तु पारमार्थिकः—अविनाशी वा अरेऽयमात्मा, अतोऽलं पर्याप्तं वै अरे इदं महद्भूतमनन्तमपारं यथाव्याख्यातं विज्ञानाय विज्ञातुम्। "न हि विज्ञातुर्विज्ञातेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वात्" (४।३।३०) इति हि वक्ष्यति ॥ १३ ॥ | उससे होनेवाले प्रकाशादिका नाश हो जाता है। किंतु जिस प्रकार वास्तविक चन्द्रमा और सूर्यादिके स्वरूपका नाश नहीं होता, उसी प्रकार असंसारी ब्रह्मके स्वरूप विज्ञानघनका भी नाश नहीं होता; उसीको विज्ञानघन—इस नामसे कहा गया है; वह सम्पूर्ण जगत्‌का आत्मा है और भूतोंका नाश होनेपर भी परमार्थतः उसका नाश नहीं होता। विनाशी तो अविद्याजनित खिल्यभाव ही है, जैसा कि "विकार वाणीसे आरम्भ होनेवाला नाममात्र है" इस अन्य श्रुतिसे सिद्ध होता है। किंतु यह तो पारमार्थिक है और हे मैत्रेयि ! यह आत्मा तो अविनाशी है; अतः जिस प्रकार इसकी व्याख्या की गयी है, उसी प्रकार यह अनन्त और अपार महद्भूत जाना जा सकता है। "विज्ञाताके विज्ञानका विशेषरूपसे लोप नहीं होता; क्योंकि वह अविनाशी है" ऐसा श्रुति आगे कहेगी भी ॥ १३ ॥ |

व्यवहार द्वैतमें है, परमार्थ व्यवहारातीत है

| कथं तर्हि प्रेत्य संज्ञा नास्ति ?<br><br>इत्युच्यते, शृणु— | शरीरपातके अनन्तर उसकी संज्ञा किस प्रकार नहीं रहती ? सो बतलाया जाता है, सुनो— |