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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

६२२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

६२२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

| स ह अनूचानतमविषयोत्पन्नजिज्ञासः संस्तद्विज्ञानोपायर्थं गवां सहस्रं प्रथमवयसामवरुरोध, गोष्ठेऽवरोधं कारयामास। किंविशिष्टास्ता गावोऽवरुद्धाः ! इत्युच्यते— पलचतुर्थभागः पादः सुवर्णस्य, दश दश पादा एकैकस्या गोः शृङ्गयोराबद्धा बभूवुः । पञ्च पञ्च पादा एकैकस्मिन् शृङ्गे ॥ १ ॥ | इस प्रकार अनूचानतमविषयक जिज्ञासा उत्पन्न होनेपर उसे जाननेका उपाय करनेके लिये उसने नयी अवस्थावाली एक सहस्र गौएँ रोक लीं अर्थात् गोशालामें रोकवा दीं। वे किस विशेषणवाली गौएँ रोकी गयी थीं, सो बतलाया जाता है—पलका चतुर्थ भाग पाद होता है; ऐसे सुवर्णके दश-दश पाद एक-एक गौके सींगोंमें बाँधे हुए थे, अर्थात् एक-एक सींगमें पाँच-पाँच पाद थे ॥ १ ॥ |


याज्ञवल्क्यका गौएँ ले जानेके लिये अपने शिष्यको आज्ञा देना, ब्राह्मणोंका कोप, अश्वलका प्रश्न

तान् होवाच ब्राह्मणा भगवन्तो यो वो ब्रह्मिष्ठः स एता गा उदजतामिति । ते ह ब्राह्मणा न दधृषुरथ ह याज्ञवल्क्यः स्वमेव ब्रह्मचारिणमुवाचैताः सोम्योदज सामश्रवा३ इतिता होदाचकार ते ह ब्राह्मणाश्चुक्रुधुः कथं नो ब्रह्मिष्ठो ब्रुवीतेत्यथ ह जनकस्य वैदेहस्य होताऽश्वलो बभूव स हैनं पप्रच्छ त्वं नु खलु नो याज्ञवल्क्य ब्रह्मिष्ठोऽसी३ इति स होवाच नमो वयं ब्रह्मिष्ठाय कुर्मो गोकामा एव वयं ँ स्म इति त ँ ह तत एव प्रष्टुं दध्रे होताऽश्वलः ॥ २ ॥

उसने उनसे कहा—'पूज्य ब्राह्मणगण ! आपमें जो ब्रह्मिष्ठ हो वह इन गौओंको ले जाय।' किंतु उन ब्राह्मणोंका साहस न हुआ। तब

ब्रह्मचारियोंका...

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