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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

५३६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २

५३६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय २

| यथा लोके निर्दिश्यते, तथा; अध्यारोपितनामरूपकर्मद्वारेण ब्रह्म निर्दिश्यते 'विज्ञानमानन्दं ब्रह्म' (३।९।२७-७) 'विज्ञानघन एव ब्रह्मात्मा' इत्येवमादिशब्दैः। | बैलका निर्देश किया जाता है, उसी प्रकार उसका निर्देश नहीं किया जा सकता। आरोपित नाम, रूप और कर्मके द्वारा 'ब्रह्म विज्ञान और आनन्दस्वरूप है', 'विज्ञानघन ही ब्रह्मात्मा है' इत्यादि शब्दोंसे ब्रह्मका निरूपण किया जाता है। |
| यदा पुनः स्वरूपमेव निर्दिदिक्षितं भवति; निरस्तसर्वोपाधिविशेषम्, तदा न शक्यते केनचिदपि प्रकारेण निर्देष्टुम्; तदा अयमेवाभ्युपायः-यदुत प्राप्तनिर्देशप्रतिषेधद्वारेण 'नेति नेति' इति निर्देशः। | किंतु जिस समय सम्पूर्ण उपाधिरूप विशेषसे रहित स्वरूपका ही निर्देश करना अभीष्ट होता है, तब तो उसका किसी भी प्रकारसे निर्देश नहीं किया जा सकता; तब तो यही एक उपाय रह जाता है कि प्राप्त निर्देशके प्रतिषेधद्वारा ही 'यह नहीं है, यह नहीं है' इस प्रकार उसका निरूपण किया जाय। |
| इदं च नकारद्वयं वीप्साव्याप्यर्थम्; यद्यत्प्राप्तं तत्तन्निषिध्यते। तथा च सति अनिर्दिष्टशङ्का ब्रह्मणः परिहृता भवति; अन्यथा हि नकारद्वयेन प्रकृतद्वयप्रतिषेधे, यदन्यत्प्रकृतात्तत्प्रति- | यहाँ 'नेति नेति' इन पदोंमें जो दो नकार हैं वे वीप्सा(द्विरुक्ति) द्वारा [ समस्त विषयोंको ] व्याप्त करनेके लिये हैं। अर्थात् जो कुछ भी विषयरूपसे प्राप्त होता है, इनके द्वारा उसका निषेध कर दिया जाता है। इससे ऐसी आशङ्काका भी परिहार हो जाता है कि [समस्त वस्तुओंका निषेध करनेके कारण इनके द्वारा ] ब्रह्मका भी निर्देश नहीं हुआ। अन्यथा इन दो नकारोंके द्वारा जिन दो प्रकृत वस्तुओंका निषेध किया गया है, उन प्रकृत प्रतिषिद्ध दो पदार्थोंसे भिन्न जो |