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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

२८८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

२८८बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| जात्याख्यायां पक्षे बहुवचनस्मरणाद् व्यक्तिबहुत्वाद्वा भेदोपचारेण बहुवचनम्। | विकल्पसे बहुवचन होता है—ऐसी स्मृति होनेसे अथवा भेदोपचारसे इन्द्रादि व्यक्तियोंके अनेक होनेके कारण यहाँ 'क्षत्राणि' इस पदमें बहुवचन है। |
| कानि पुनस्तानि? इत्याह—तत्राभिषिक्ता एव विशेषतो निर्दिश्यन्ते—इन्द्रो देवानां राजा, वरुणो यादसाम्, सोमो ब्राह्मणानाम्, रुद्रः पशूनाम्, पर्जन्यो विद्युदादीनाम्, यमः पितॄणाम्, मृत्युरोगादीनाम्, ईशानो भासाम्—इत्येवमादीनि देवेषुक्षत्राणि। तदनु, इन्द्रादिक्षत्रदेवताधिष्ठितानि मनुष्यक्षत्राणि सोमसूर्यवंश्यानि पुरूरवःप्रभृतीनि सृष्टान्येव द्रष्टव्यानि। तदर्थ एव हि देवक्षत्रसर्गः प्रस्तुततः। | वे कौन हैं? सो श्रुति बतलाती है। यहाँ विशेषरूपसे उनमेंसे [भिन्न-भिन्न वर्गोंके अधिपतिरूपसे] अभिषिक्त देवताओंका ही उल्लेख किया जाता है—देवताओंका राजा इन्द्र, जलचरोंका अधिपति वरुण, ब्राह्मणोंका राजा सोम, पशुपति रुद्र, विद्युदादिका नायक मेघ, पितरोंका राजा यम, रोग आदिका स्वामी मृत्यु और प्रकाशोंका स्वामी ईशान इत्यादि जो देवताओंमें क्षत्रिय हैं [उन्हें उत्पन्न किया]। उनके पीछे इन्द्रादि क्षत्रिय देवताओंसे अधिष्ठित पुरूरवा आदि चन्द्र और सूर्यवंशी मानवक्षत्रिय रचे गये—ऐसा समझना चाहिये। उन्हींके लिये देवक्षत्रसृष्टिका आरम्भ किया गया है। |
| यस्माद्ब्रह्मणातिशयेन सृष्टं क्षात्रं तस्मात्क्षत्रात्परं नास्ति ब्राह्मणाजातेरपि नियन्तृ। तस्माद्ब्राह्मणः कारणभूतोऽपि क्षत्रियस्य क्षत्रियमधस्ताद्भूम्यवस्थितः सन्नुपरिस्थितमुपास्ते। क्व? राजसूये। | क्योंकि ब्रह्माने क्षत्रियोंको अतिशयरूपसे रचा है, इसलिये क्षत्रियसे उत्कृष्ट ब्राह्मणजातिका भी नियमन करनेवाला दूसरा कोई नहीं है। इसीसे क्षत्रियजातिका कारणभूत होकर भी ब्राह्मण नीचे बैठकर ऊँचे बैठे हुए क्षत्रियकी उपासना करता है। कहाँ? राजसूययज्ञमें। उस समय वह |