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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

१२८० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६

१२८०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ६

पञ्च मा प्रश्नान् राजन्यबन्धुरप्राक्षीत्ततो नैकंचन वेदेति कतमे त इतीम इति ह प्रतीकान्युदाजहार ॥ ३ ॥

फिर राजाने श्वेतकेतुसे ठहरनेके लिये प्रार्थना की। किंतु वह कुमार ठहरनेकी परवा न करके चल दिया। वह अपने पिताके पास आया और उनसे बोला, 'आपने यही कहा था न, कि मुझे सब विषयोंकी शिक्षा दे दी गयी है?' [ पिता- ] 'हे सुन्दर धारणाशक्तिवाले ! क्या हुआ?' [ पुत्र- ] 'मुझसे एक क्षत्रियबन्धुने पाँच प्रश्न पूछे थे, उनमेंसे मैं एकको भी नहीं जानता।' [ पिता— ] 'वे कौन-से थे?' [ पुत्र— ] 'ये थे' ऐसा कहकर उसने उन प्रश्नोंके प्रतीक बतलाये ॥ ३ ॥

अथानन्तरमपनीय विद्याभिमानगर्वमेनं प्रकृतं श्वेतकेतुं वसतया वसतिप्रयोजनेनोपमन्त्रयाञ्चक्रे-इह वसन्तु भवन्तः, पाद्यमर्घ्यं चानीयतामित्युपमन्त्रणं कृतवान् राजा। अनादृत्य तां वसतिं कुमारः श्वेतकेतुः प्रदुद्राव प्रतिगतवान् पितरं प्रति। स चाजगाम पितरमागत्य चोवाच तम्, कथमिति? वाव किलैवं किल नोऽस्मान् भवान् पुरा समावर्तनकालेऽनुशिष्टान् सर्वाभिर्विद्याभिरवोचोऽवोचदिति।इसके पश्चात् उसके विद्याभिमानको तोड़कर इस प्रकरणमें प्राप्त श्वेतकेतुसे राजाने 'वसति'-ठहरनेके प्रयोजनसे प्रार्थना की; अर्थात् [ श्वेतकेतुसे कहा— ] 'आप यहाँ ठहरिये' [और सेवकोंसे कहा—] 'अरे! पाद्य और अर्घ्य लाओ' इस प्रकार राजाने विनयपूर्वक निवेदन किया। किंतु वह कुमार उस निवासका निरादर कर 'प्रदुद्राव' अपने पिताके पास चल दिया। वह पिताके पास आया और वहाँ आकर उससे बोला, किस प्रकार बोला—'आपने पहले समावर्तन संस्कारके समय यही कहा था न, कि तुझे सब विद्याओंमें अनुशिक्षित कर दिया गया है?'