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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

२२८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

२२८बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १
त्वमिति, सत्यमेतत्, किन्तु नापूर्वविध्यर्थता; पक्षे प्राप्तस्य नियमार्थतैव ।तो ठीक है; किंतु यह अपूर्वविधि नहीं हो सकती, बल्कि एक पक्षमें प्राप्त होनेवाली उपासनाका नियम करनेके लिये ही है।
कथं पुनरुपासनस्य पक्षप्राप्तिः?पूर्व०—किंतु एक पक्षमें उपासनाकी प्राप्ति कैसे हो सकती है?
यावता पारिशेष्यादात्मविज्ञान-स्मृतिसन्ततिः नित्यैवेत्यभिहितम्।क्योंकि ऊपर यह कहा जा चुका है कि परिशेषतः आत्मविज्ञान-सम्बन्धिनी स्मृतिका प्रवाह नित्य प्राप्त ही है।
(आत्मोपासन-वाक्यानां नियम-विध्यर्थत्वसाधनम्)<br><br>बाढम्, यद्यप्येवम्; शरीरारम्भकस्य कर्मणो नियतफलत्वात्, सम्यग्ज्ञानप्राप्तावप्यवश्यम्भाविनी प्रवृत्तिर्वाङ्मनःकायानाम्, लब्धवृत्तेः कर्मणो बलीयस्त्वात् मुक्तेष्वादिप्रवृत्तिवत् । तेन पक्षे प्राप्तं ज्ञानप्रवृत्तिदौर्बल्यम्। तस्मात्त्यागवैराग्यादि-साधनबलावलम्बेन आत्मविज्ञान-स्मृतिसन्ततिर्नियन्तव्या भवति, न त्वपूर्वा कर्तव्या; प्राप्तत्वाद्सिद्धान्ती—ठीक है, यद्यपि ऐसा ही है; तथापि शरीरारम्भक कर्मका फल निश्चित होनेके कारण सम्यग्ज्ञानकी प्राप्ति हो जानेपर भी वाणी, मन और शरीरकी चेष्टा अवश्यम्भाविनी ही है, क्योंकि जो कर्म फलोन्मुख हो चुका है वह तो छूटे हुए बाण आदिकी प्रवृत्तिके समान अधिक बलवान् है ही। अतः एक पक्षमें ज्ञानप्रवृत्तिकी दुर्बलता प्राप्त होती है। अतः त्याग-वैराग्यादि साधनोंके बलका आश्रय लेकर आत्मविज्ञानस्मृतिके प्रवाहका नियमन ही करना होता है, उसे अपूर्व रूपसे नहीं करना पड़ता, क्योंकि

१. अर्थात् आत्मज्ञानसे अनात्मचिन्तनकी निवृत्ति हो जानेपर अन्तमें।