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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

७९८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३

७९८बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ३

समूहका परायण जानता है, वही ज्ञाता है। याज्ञवल्क्य ! [ तुम तो बिना जाने ही पण्डित होनेका अभिमान कर रहे हों !] ।' [याज्ञवल्क्य-] 'जिसे तुम सम्पूर्ण आध्यात्मिक कार्य-करणसंघातका परायण बतलाते हो, उस पुरुषको तो मैं जानता हूँ। जो भी यह काममय पुरुष है, वही यह है। हे शाकल्य ! और बोलो।' [ शाकल्य — ] 'उसका कौन देवता है ?' तब याज्ञवल्क्यने कहा—'स्त्रियां' ॥ ११ ॥

| काम एव यस्यायतनम्। स्त्रीव्यतिकराभिलाषः कामः कामशरीर इत्यर्थः। हृदयं लोको हृदयेन बुद्ध्या पश्यति । य एवायं काममयः पुरुषोऽध्यात्ममपि काममय एव । तस्य का देवतेति स्त्रिय इति होवाच; स्त्रीतो हि कामस्य दीप्तिर्जायते ॥ ११ ॥ | काम ही जिसका आयतन है। स्त्रीप्रसङ्गकी अभिलाषाका नाम काम है, अतः तात्पर्य यह है कि जो कामरूप शरीरवाला है। हृदय जिसका लोक है—जो हृदय यानी बुद्धिसे देखता है। जो भी यह काममय पुरुष है अर्थात् जो अध्यात्म भी काममय ही है । [ शाकल्य—] 'उसका देवता कौन है ?' याज्ञवल्क्यने 'स्त्रियां' ऐसा कहा, क्योंकि स्त्रीसे ही कामका उद्दीपन होता है ॥ ११ ॥ |

रूपाण्येव यस्यायतनं चक्षुर्लोको मनोज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात् सर्वस्यात्मनः परायणँ स वै वेदिता स्यात् । याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषँ सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवासावादित्ये पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेति सत्यमिति होवाच ॥ १२ ॥

[ शाकल्य—] 'रूप ही जिसका आयतन है, चक्षु लोक है और मन ज्योति है, जो भी उस पुरुषको सम्पूर्ण अध्यात्म कार्य-करणसमूहका परायण जानता है, वही ज्ञाता है। हे याज्ञवल्क्य ! [तुम तो बिना जाने ही