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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७९७

ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७९७


| स एवं प्रक्षोभितोऽमर्षवशग आह—तोत्त्रार्दित इव गजः— तस्य देवस्य शारीरस्य का देवता ? यस्मान्निष्पद्यते यः सा तस्य देवतेत्यस्मिन् प्रकरणे विवक्षितः; अमृतमिति होवाच । अमृतमिति यो भुक्तस्यान्नस्य रसो मातृजस्य लोहितस्य निष्पत्तिहेतुः । तस्माद्ध्यन्नरसाल्लोहितं निष्पद्यते स्त्रियां श्रितम्, ततश्च लोहितमयं शरीरं बीजाश्रयम् । समानमन्यत् ॥ १० ॥ | इस प्रकार अत्यन्त क्षुभित किये जानेपर उसने अंकुशसे पीडित हुए हाथीके समान क्रोधके वशीभूत होकर पूछा, 'उस शरीरमें होनेवाले देवका देवता कौन है ?' जिसके द्वारा जो निष्पन्न होता है वही उसका देवता है-ऐसा इस प्रकरणमें बताना अभीष्ट है [ शाकल्यके किये हुए प्रश्नके उत्तरमें ] 'वह अमृत है' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा । खाये हुए अन्नका जो रस मातृजनित लोहितकी निष्पत्तिका कारण होता है, वही अमृत है । उस अन्नके रससे ही स्त्रीमें आश्रित लोहित निष्पन्न होता है । उसीसे बीजका आश्रयभूत लोहितमय शरीर बनता है । आगेके अन्य पर्यायोंका अर्थ भी इसीके समान है ॥ १० ॥ |


काम एव यस्यायतनँ हृदयं लोको मनो-ज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात् सर्वस्यात्मनः परायणँ स वै वेदिता स्यात् । याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषँ सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायं काममयः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेति स्त्रिय इति होवाच ॥ ११ ॥

[ शाकल्य—] 'काम ही जिसका आयतन है, हृदय लोक है और मन ज्योति है, उस पुरुषको जो भी सम्पूर्ण आध्यात्मिक कार्य-करण-