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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

ब्राह्मण ७ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७४५

ब्राह्मण ७ ]शाङ्करभाष्यार्थ७४५

| मिणं सूत्रान्तर्गतं तस्यैव सूत्रस्य नियन्तारं विद्यात् यः—इत्येवमुक्तेन प्रकारेण, स हि ब्रह्मवित् परमात्मवित् स लोकांश्च भूरादीनन्तर्यामिणा नियम्यमानाँल्लोकान् वेत्ति, स देवांश्चाग्न्यादीँल्लोकस्थो जानाति, वेदांश्च सर्वप्रमाणभूतान् वेत्ति, भूतानि च ब्रह्मादीनि सूत्रेण ध्रियमाणानि तदन्तर्गतेनान्तर्यामिणा नियम्यमानानि वेत्ति, स आत्मानं च कर्तृत्वभोक्तृत्वविशिष्टं तेनैवान्तर्यामिणा नियम्यमानं वेत्ति, सर्वं च जगत् तथाभूतं वेत्तीति। | उक्त प्रकारसे जान ले वही ब्रह्मवित्—परमात्माको जाननेवाला है; वही अन्तर्यामीसे नियम्यमान भूरादि लोकोंको जानता है, सबके प्रमाणभूत वेदोंको जानता है तथा सूत्रसे धारण किये हुए और उसके अन्तर्वर्ती अन्तर्यामीसे नियमित होते हुए ब्रह्मादि भूतोंको जानता है। वह उस अन्तर्यामीसे ही नियमित होते हुए कर्तृत्व-भोक्तृत्वविशिष्ट आत्माको जानता है तथा सम्पूर्ण जगत्‌को भी ऐसा ही जानता है।' |
| एवं स्तुते सूत्रान्तर्यामिविज्ञाने प्रलुब्धः काप्योऽभिमुखीभूतः, वयं च; तेभ्यश्चास्मभ्यमभिमुखीभूतेभ्योऽब्रवीद् गन्धर्वः सूत्रमन्तर्यामिणं च; तदहं सूत्रान्तर्यामिविज्ञानं वेद गन्धर्वाल्लब्धागमः सन्। तच्चेद् याज्ञवल्क्य सूत्रं तं चान्तर्यामिणमविद्वांश्चेदब्रह्मवित् सन् यदि ब्रह्मगवीरुदजसे ब्रह्मविदां स्वभूता गा उदजसे उन्नयसि त्वम् | 'सूत्र और अन्तर्यामीके विज्ञानकी इस प्रकार स्तुति होनेपर अत्यन्त लुब्ध होकर काप्य और हम उसके अभिमुख हुए; इस प्रकार अपने अभिमुख हुए हमलोगोंके प्रति उस गन्धर्वने सूत्र और अन्तर्यामीका वर्णन किया; सो मैं गन्धर्वसे आचार्योपदेश प्राप्त करके उस सूत्र और अन्तर्यामीके विज्ञानको जानता हूँ; अतः हे याज्ञवल्क्य ! यदि उस सूत्र और अन्तर्यामीको न जाननेवाले अर्थात् अब्रह्मवित् होकर तुम 'ब्रह्मगवी:'—ब्रह्मवेत्ताओंकी स्वभूता गोओंको अन्यायसे ले जाओगे तो |