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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
चतुर्थ अध्याय
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चतुर्थ अध्याय
प्रथम ब्राह्मण
जनक-याज्ञवल्क्य-संवाद
| संस्कृत | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| जनको ह वैदेह आसाञ्चक्रे ।<br><br>उपोद्घातः<br>अस्य सम्बन्धः—<br>शारीराद्यष्टौ पुरुषान्निरूह्य, प्रत्युह्य पुनर्हृदये, दिग्भेदेन च पुनः पञ्चधा व्यूह्य, हृदये प्रत्युह्य, हृदयं शरीरं च पुनरन्योन्यप्रतिष्ठं प्राणादिपञ्चवृत्त्यात्मके समानाख्ये जगदात्मनि सूत्र उपसंहृत्य, जगदात्मानं शरीरहृदयसूत्रावस्थमतिक्रान्तवान् य औपनिषदः पुरुषो नेति नेतीति व्यपदिष्टः, स साक्षाच्चोपादानकारणस्वरूपेण च निर्दिष्टः 'विज्ञानमानन्दम्' इति । तस्यैव वागादिदेवताद्वारेण पुनरधिगमः कर्तव्य इत्यधि- | ‘जनको ह वैदेह आसाञ्चक्रे’ इसका पहले अध्यायसे इस प्रकार सम्बन्ध है—शारीरादि आठ पुरुषोंका निरूपण करके पुनः उनका हृदयमें उपसंहार कर तथा फिर दिशाओंके भेदसे उन्हें पाँच भागोंमें विभक्त करके पुनः उनका हृदयमें उपसंहार कर तथा एक दूसरेमें प्रतिष्ठित हृदय और शरीरका प्राणादि पाँच वृत्तियोंवाले समानसंज्ञक जगदात्मा सूत्रमें उपसंहार कर जो ‘नेति-नेति’ इस प्रकार बतलाया हुआ औपनिषद पुरुष शरीर, हृदय और सूत्रमें स्थित जगदात्माको अतिक्रमण किये हुए है, उसीका ‘ब्रह्म विज्ञान और आनन्दरूप है’ इस प्रकार साक्षात् और उपादान कारणरूपसे निर्देश किया गया है। उसीका वागादि देवतारूप द्वारसे पुनः बोध कराना है, इसीलिये इन |
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जनक-याज्ञवल्क्य-संवाद