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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

४४२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

४४२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| गृहीत एवं प्राणो भवति। प्राण इति घ्राणेन्द्रियम्, वागादिप्रकरणात्; वागादिसम्बन्धे हि सति तदुपाधित्वादस्य संसारधर्मित्वं लक्ष्यते। वागादयश्चोपसंहृता एव तदा तेन। कथम् ? गृहीता वाग्गृहीतं चक्षुर्गृहीतं श्रोत्रं गृहीतं मनः। तस्मादुपसंहृतेषु वागादिषु क्रियाकारकफलात्मताभावात्स्वात्मस्थ एवात्मा भवतीत्यवगम्यते॥१७॥ | गृहीत ही हो जाता है। यहाँ वागादिका प्रकरण होनेसे 'प्राण' शब्दसे घ्राणेन्द्रिय समझना चाहिये; क्योंकि वागादिका सम्बन्ध होनेपर ही उनकी उपाधिसे युक्त होनेके कारण इसका संसारधर्मयुक्त होना देखा जाता है। उस समय उन वागादिका वह उपसंहार ही कर लेता है। किस प्रकार ? उस समय वाक् गृहीत रहती है, चक्षु गृहीत रहता है, श्रोत्र गृहीत रहता है। और मन भी गृहीत रहता है अतः यह ज्ञात होता है कि वागादि इन्द्रियोंका उपसंहार हो जानेपर क्रिया, कारक और फल-रूपताका अभाव हो जानेसे आत्मा अपने स्वरूपमें ही स्थित हो जाता है॥१७॥ |

स्वप्नवृत्तिका स्वरूप

| ननु दर्शनलक्षणायां स्वप्नावस्थायां कार्यकारणवियोगेऽपि संसारधर्मित्वमस्य दृश्यते। यथा च जागरिते सुखी दुःखी बन्धुवियुक्तः शोचति मुह्यते च; तस्माच्छोकमोहधर्मवानेवायम्। | पूर्व०—किंतु दर्शनरूपा स्वप्नावस्थामें तो शरीर और इन्द्रियोंका अभाव होनेपर भी इसकी संसारधर्मता देखी जाती है। जिस प्रकार यह जागरित-अवस्था में होता है, उसी प्रकार स्वप्नमें भी सुखी, दुःखी और बन्धुओंसे वियुक्त होता है तथा शोक करता और मोहित होता है; इसलिये यह शोक-मोहरूप धर्मोंवाला ही है। |