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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
५९२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २
पृष्ठ 600स्थायी लिंक
५९२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २
इदँ सत्यँ सर्वेषां भूतानां मध्वस्य सत्यस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन् सत्ये तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मँ सात्यस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदँ सर्वम् ॥ १२ ॥
यह सत्य समस्त भूतोंका मधु है और समस्त भूत इस सत्यके मधु हैं। यह जो इस सत्यमें तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म सत्यसम्बन्धी तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे बतलाया गया है ]। यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है ॥ १२ ॥
| तथा दृष्टेनानुष्ठीयमानेन आचाररूपेण सत्याख्यो भवति स एव धर्मः। सोऽपि द्विप्रकार एव सामान्यविशेषात्मरूपेण। सामान्यरूपः पृथिव्यादिसमवेतः, विशेषरूपः कार्यकारणसङ्घातसमवेतः। तत्र पृथिव्यादिसमवेते वर्तमानक्रियारूपे सत्ये, तथाध्यात्मं कार्यकारणसङ्घातसमवेते सत्ये भवः सात्यः—"सत्येन वायुरावाति" (महाना० २२।१) इति श्रुत्यन्तरात् ॥ १२ ॥ | इसी प्रकार वही धर्म दृष्ट-अनुष्ठीयमान यानी आचाररूपसे सत्य संज्ञावाला होता है। वह भी सामान्य और विशेषरूपसे दो प्रकारका ही है। सामान्यरूप पृथिवी आदिसे सम्बन्ध रखनेवाला है और विशेषरूप देहेन्द्रियसंधातसे सम्बद्ध है। तहाँ पृथिवी आदिसे सम्बद्ध वर्तमान क्रियारूप सत्यमें तथा अध्यात्म यानी देहेन्द्रियसंधातसे सम्बद्ध सत्यमें जो होनेवाला है, उसे सात्य कहते हैं; यह बात "सत्यसे वायु चलता है" इस अन्य श्रुतिसे सिद्ध होती है ॥ १२ ॥ |
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| धर्मसत्याभ्यां प्रयुक्तोऽयं कार्यकारणसङ्घातविशेषः, स येन जातिविशेषेण संयुक्तो भवति, स | यह देहेन्द्रियसंधातविशेष धर्म और सत्यद्वारा प्रेरित है, यह जिस जातिविशेषसे संयुक्त होता है, वह |