सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

३८८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

३८८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

| प्राणवाग्वात्मनोव्रतमभग्नमिति २२ | प्राणरूप और वायुरूप हुए उपासकोंका व्रत अभग्न रहता है ॥ २२ ॥ |

प्राणव्रतकी स्तुतिमें मन्त्र

अथैष श्लोको भवति यतश्चोदेति सूर्योऽस्तं यत्र च गच्छतीति प्राणाद्वा एष उदेति प्राणेऽस्तमेति तं देवाश्चक्रिरे धर्मँ॒ स एवाद्य स उ श्व इति यद्वा एतेऽमुर्ह्यध्रियन्त तदेवाप्यद्य कुर्वन्ति । तस्मादेकमेव व्रतं चरेत्प्राण्याच्चैवापान्याच्च नेन्मा पाप्मा मृत्युराप्नुवदिति यद्यु॑ चरेत्समापिपयिषेत्तेनो एतस्यै देवतायै सायुज्यँ॒ सलोकतां जयति ॥ २३ ॥

इसी अर्थका प्रतिपादक यह मन्त्र है—'जिस ( वायुदेवता ) से सूर्य उदय होता है और जिसमें वह अस्त होता है' इत्यादि । यह प्राणसे ही उदित होता है और प्राणमें ही अस्त हो जाता है । उस धर्मको देवताओंने किया है । वही आज है और वही कल भी रहेगा । देवताओंने जो व्रत उस समय धारण किया था वही आज भी करते हैं । अतः एक ही व्रतका आचरण करे । प्राण और अपानव्यापार करे । मुझे कहीं पापी मृत्यु व्याप्त न कर ले—इस भयसे [ इस व्रतका आचरण करे ] । और यदि इसका आचरण करे तो इसे समाप्त करनेकी भी इच्छा रखे । इससे वह इस देवतासे सायुज्य और सालोक्य प्राप्त करता है ॥ २३ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
अथैतस्यैवार्थस्य प्रकाशक एष श्लोको मन्त्रो भवति । यतश्च यस्माद्वायोरुदेत्युद्गच्छति सूर्यः, अध्यात्मं च चक्षुरात्मना प्राणाद् अस्तं च यत्र वायौ प्राणे च गच्छत्यपरसंध्यासमये स्वापसमये चइसी अर्थका प्रकाशक यह श्लोक यानी मन्त्र है—जहाँसे अर्थात् जिस वायुसे सूर्य उदित होता है तथा अध्यात्मपक्षमें जिस प्राणसे वह चक्षुरूपसे उदित होता है और जहाँ—वायु और प्राणमें सायंकाल एवं पुरुषकी सुषुप्तिके समय वह अस्त हो