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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

५१६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

५१६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २


संस्कृत-भाष्यम्हिन्दी-अनुवाद
एतन्मर्त्यम्--यदेतन्मूर्ताख्यं भूतत्रयमिदं मर्त्यं मरणधर्मि; कस्मात्? यस्मात्स्थितमेतत्; परिच्छिन्नं ह्यर्थान्तरेण सम्प्रयुज्यमानं विरुध्यते--यथा घटः स्तम्भकुड्यादिना; तथा मूर्तं स्थितं परिच्छिन्नम् अर्थान्तरसम्बन्धि ततोऽर्थान्तरविरोधान्मर्त्यम्; एतत्सद्विशेष्यमाणासाधारणधर्मवत्, तस्माद्धि परिच्छिन्नम्, परिच्छिन्नत्वान्मर्त्यम् अतो मूर्तम्; मूर्तत्वाद्वा मर्त्यम्, मर्त्यत्वात्स्थितम्, स्थितत्वात्सत् । अतोऽन्योन्याव्यभिचाराच्चतुर्णां धर्माणां यथेष्टं विशेषणविशेष्यभावो हेतुहेतुमद्भावश्च दर्शयितव्यः । सर्वथापि तु भूतत्रयं चतुष्टयविशेषणविशिष्टं मूर्तं रूपं ब्रह्मणः । तत्र चतुर्णामेकस्मिन्गृहीते विशेषणे इतरद्गृहीतमेव विशेषणमित्याह--तस्यैतस्य मूर्तस्य एतस्य मर्त्यस्य, एतस्य स्थितस्य, एतस्ययह मर्त्य है--यह जो मूर्तसंज्ञक तीन भूत हैं मर्त्य--मरणधर्मी हैं। क्यों ? क्योंकि ये स्थित हैं। परिच्छिन्न वस्तु ही किसी अन्य वस्तुसे संयोग किये जानेपर उससे विरुद्ध रहती है, जिस तरह स्तम्भ और भित्ति आदिसे घट। इस प्रकार मूर्त स्थित, परिच्छिन्न और अर्थान्तरसे सम्बन्ध रखनेवाला है, अतः अर्थान्तरसे विरोध होनेके कारण वह मर्त्य है। यह सत् अर्थात् विशेष्यमाण असाधारण धर्मोंवाला है, इसीसे परिच्छिन्न है, परिच्छिन्न होनेके कारण मर्त्य है और इसीसे मूर्त है। अथवा मूर्त होनेके कारण मर्त्य है, मर्त्य होनेके कारण स्थित है और स्थित होनेके कारण सत् है। अतः इन चारों धर्मोंका एक-दूसरेमें व्यभिचार न होनेके कारण इनका यथेष्ट विशेष्य-विशेषणभाव और कार्य-कारणभाव दिखलाना उचित है। यह चार विशेषणोंसे युक्त भूतत्रय सभी प्रकार ब्रह्मका मूर्तरूप है। इन चार विशेषणोंमेंसे किसी एकको ग्रहण करनेपर अन्य विशेषण भी गृहीत हो ही जाते हैं; इसीसे श्रुति कहती है--उस इस मूर्तका, इस मर्त्यका, इस स्थितका